आँखों की रोशनी गई फिर भी चढ़ गए पहाड़, आज दिव्यांगजनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं दिव्यांशु

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19 साल की उम्र में ग्लूकोमा नाम की बीमारी ने दिव्यांशु गणात्रा की आँखों की रोशनी छीन ली, लेकिन बावजूद इसके दिव्यांशु के हौसलों पर कोई फर्क नहीं पड़ा। आज दिव्यांशु अपनी संस्था के दम पर अन्य दिव्यांगजनों के लिए बेहतरीन पहल कर रहे हैं।

दिव्यांशु गणात्रा


दिव्यांशु गणात्रा देश के पहले ब्लाइंड सोलो पैराग्लाइडर हैं। शारीरिक रूप से चाहे भले ही उन्हे चुनौतियों का सामना करना पड़ता हो, लेकिन दिव्यांशु मानसिक रूप से काफी मजबूत और सकारात्मक रवैय्या रखने वाले इंसान हैं। दिव्यांशु ने दिव्यांगजनों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए ‘एडवेंचर्स बियोंड बैरियर्स’ संस्था की भी स्थापना की है।

दिव्यांशु जब महज 19 साल के तब ग्लूकोमा नामक बीमारी के चलते उन्होने अपनी आँखों की रोशनी खो दी, लेकिन यह बीमारी दिव्यांशु के हौसलों को नहीं मार सकी, बल्कि उनके हौसले और भी मजबूत होकर उभरे।

ग्लूकोमा लोगों में आँखों की रोशनी को खत्म करने का दूसरा सबसे बड़ा कारक है। यह बीमारी आमतौर पर 40-45 की उम्र के बाद होती है, इस बीमारी के तहत दिमाग और आँखों के बीच का संबंध कट जाता है, जिसके चलते यह बीमारी लाइलाज हो जाती है।

हौसलों में है उड़ान

माउंटेन क्लाइम्बिंग, साइकलिंग और पैराग्लाइडिंग करने वाले दिव्यांशु कहते हैं,

“कोई साक्ष्य नहीं है कि ये सब करने के लिए आँखों की जरूरत होती है। मेरी सिर्फ आँखें ही गई हैं, लेकिन मेरे पास मेरे हाथ-पैर, मेरा दिमाग अभी भी है। इसके लिए सोच जरूरी है, मुझे नहीं पता कि ऐसी क्या चीज़ है जो मैं आँखों के बिना नहीं कर सकता हूँ।”


दिव्यांशु का मानना है कि हौसले के दम पर दिव्यांग तो आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन समाज से उन्हे अभी भी बेहतर सहयोग हासिल नहीं होता है। वो कहते हैं,

“दुनिया में आज हमें अंतर नज़र आते हैं, लोगों के बीच, धर्मों के बीच, समाज के बीच और जब तक हम संवाद नहीं करेंगे, हम इसे मिटा नहीं पाएंगे।”

आँखों की रोशनी न होने के बावजूद दिव्यांशु इसे सकारात्मक रूप से लेते हुए कहते हैं कि अब उनके पास किसी भी चीज़ की कल्पना करने की अपार शक्ति है।

अन्य दिव्यांगजनों के साथ दिव्यांशु


19 साल की उम्र में आँखों की रोशनी खोने के बाद दिव्यांशु को शुरुआती दौर में कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिसमें मानसिक रूप से भी तनाव शामिल था, लेकिन दिव्यांशु ने उस परेशानी से बाहर निकलने के लिए अपने मन में एक दृन संकल्प कर लिया था। वो कहते हैं,

“मैं उस दौरान मेरे दोस्तों और परिवार वालों से लगातार मिलता था, लेकिन मैं एक बार एक महिला से मिला जिनकी आँखों की रोशनी चली गई थी, उन्होने मुझसे कहा, दृष्टि गई तो क्या हुआ, दृष्टिकोण तो है। इसी सोच ने मेरी दुनिया बदल दी।”

‘एडवेंचर्स बियोंड बैरियर्स’ की शुरुआत

‘एडवेंचर्स बियोंड बैरियर्स’ संस्था दृष्टिहीन लोगों को समाज की मुख्यधारा से मिलाने का काम करती है। संस्था सामान्य लोगों और दृष्टिहीन लोगों को एक साथ एडवेंचर स्पोर्ट में शामिल करने का काम करती है।

साइकलिंग करते दिव्यांशु (पीछे)


संस्था के बारे में बात करते हुए दिव्यांशु कहते हैं,

“संस्था के तहत हम दृष्टिहीन लोगों को समाज के साथ खड़ा करने का काम कर रहे हैं। संस्था इन सभी को एडवेंचर स्पोर्ट में शामिल करने की अपील करती है।”


दिव्यांशु समाज में दिव्यांगजनों के लिए एक समान माहौल की वकालत भी करते हैं, उनके अनुसार अब नीतियों में कुछ जरूरी बदलाव किए की भी आवश्यकता है, जिससे दिव्यांग समाज की मुख्यधारा में आसानी से घुल मिल सकें और वो भी खुद को सामान्य व्यक्ति के तौर पर महसूस कर सकें।

हम संस्था के तहत स्कूबा डाईविन्ग, मैराथन, साइकलिंग का भी आयोजन करते हैं। दिव्यांग लोगों के लिए हम टेंडम साइकलिंग का आयोजन करते हैं।

भविष्य के लिए योजना

दिव्यांशु दिव्यांगजनों के लिए इकोसिस्टम का निर्माण करना चाहते हैं, इसके साथ ही वे टेंडम साइकलिंग को बढ़ावा देने के संबंध में भी काम कर रहे हैं। दिव्यांशु दिव्यांगजनों के लिए इकोसिस्टम का निर्माण करना चाहते हैं, इसके साथ ही वे टेंडम साइकलिंग को बढ़ावा देने के संबंध में भी काम कर रहे हैं। इस दिशा में दिव्यांशु कॉर्पोरेट के साथ बात कर रहे हैं, ताकि दिव्यांगजन मुख्यधारा में आसानी से जुड़ सकें।


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