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बेटियों को क्यों मिलता है शिक्षा की पहली दहलीज़ पर ही अंधेरा?

'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' के नारों से रंगी दीवारें अब तक देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश को अपने रंग में नहीं रंग पायी हैं।

प्रणय विक्रम सिंह
31st Mar 2017
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"उत्तर प्रदेश में लड़कों की प्राथमिक शिक्षा पूरी करने की दर जहां 50 प्रतिशत है वहीं लड़कियों की दर सिर्फ 27 फीसदी ही है जिसमे वंचित समूह की केवल 10.4 प्रतिशत बालिकाएं ही अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर पाती हैं। सवाल यह है कि जब यूनिफार्म से लेकर भोजन तक और वजीफे से लेकर किताबों तक की सुविधा सरकार दे रही है, तो फिर बालिका शिक्षा का प्रतिनिधित्व इतना कम क्यों हैं?"

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लड़कों की तुलना में लड़कियों का जल्दी विवाह, घर से स्कूल की दूरी व उचित परिवहन का अभाव, घरेलू कामकाज में हाथ बंटाना, अलग शौचालय का अभाव, शिक्षिका का न होना, सुरक्षा का अभाव, छोटे-भाई-बहनों की देखभाल जैसी कई वजहें जो उनकी पढ़ाई जारी रखने में बाधक बनती हैं।

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में शिक्षा की पहली दहलीज पर ही बेटियों के हिस्से पर छाया अंधेरा खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के नारों से रंगी दीवारें अभी भी यूपी के मन को अपने रंग में नहीं रंग पायी हैं। सरकारी प्राथमिक विद्यालयों मे लगातार कम होती बालिकाओ की संख्या इस बात की तस्दीक करती है, कि परिषदीय स्कूलों में वजीफा, मिड-डे मील के साथ फल और पौष्टिक आहार देने के नुस्खे भी कारगर साबित नहीं हुए। उत्तर प्रदेश में लड़कों की प्राथमिक शिक्षा पूरी करने की दर जहां 50 प्रतिशत है वहीं लड़कियों की दर सिर्फ 27 प्रतिशत ही है, जिसमे वंचित समूह की केवल 10.4 प्रतिशत बालिकाएं ही अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर पाती हैं। 

सवाल ये है, कि जब यूनिफार्म से लेकर भोजन तक और वजीफे से लेकर किताबों तक की सुविधा सरकार दे रही है, तो फिर बालिका शिक्षा का प्रतिनिधित्व इतना कम क्यों हैं?

दीगर है, कि यूपी के पांच मंडलों (लखनऊ, कानपुर, देवीपाटन, फैजाबाद, गोरखपुर) में न्यूज़ टाइम्स पोस्ट के सर्वेक्षण के अनुसार अभिभावकों ने स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय के न होने या उसके दुरुस्त न होने को एक बड़ी चिंता बताया। सर्वेक्षण से मालूम हुआ, कि केवल 44 प्रतिशत स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग दुरुस्त शौचालय की व्यवस्था है। अन्य स्थानों पर लड़कियों को या तो सामान्य शौचालयों में जाना पड़ता है या नज़दीकी खेतों में अथवा घर जाना पड़ता है। लड़कियों की शिक्षा के मार्ग में उनके साथ होने वाला दुर्व्यवहार भी एक बड़ा कारण है।

सामाजिक कार्यकर्त्ता प्रशांत सिंह के अनुसार, लड़कों की तुलना में लड़कियों का जल्दी विवाह, घर से स्कूल की दूरी व उचित परिवहन का अभाव, घरेलू कामकाज में हाथ बंटाना, अलग शौचालय का अभाव, शिक्षिका का न होना, सुरक्षा का अभाव, छोटे-भाई-बहनों की देखभाल कुछ ऐसे कारण हैं, जो उनकी पढ़ाई जारी रखने में बाधक बनते हैं।

हालांकि, यहां एक काबिल-ए-फक्र बात ये सामने आई है कि पहले की अपेक्षा अब नये अभिभावकों में बालिका शिक्षा की तरफ सकारात्मक रुझान दिखाई पड़ने लगा है। यद्यपि यह अनुपात बहुत कम है, लेकिन फिर भी यह बदलाव बालिका शिक्षा के क्षेत्र में बड़े बदलाव की आधारभूमि तैयार कर रहा है।

ये जानना भी अपने आप में काफी दिलचस्प होगा, कि निम्न मध्य वर्ग के ऐसे जागरूक अभिभावक गुणवत्ता विहीन सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की अपेक्षा स्थानीय मान्टेसरी या प्राइवेट स्कूलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा की गिरती साख का ही परिणाम है कि शिक्षा का निजीकरण हो रहा है, जिसके फलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में जो असहाय एवं वंचित-गरीब वर्ग है वह इससे बेदखल होने को मजबूर है। और यह अमीर और गरीब के मध्य की विभाजक रेखा बन गई है। 

फिलहाल संख्या के बुनियादी सवाल से कॉन्वेंट या प्राइवेट स्कूलों को नहीं जूझना पड़ रहा है, लेकिन गुणवत्ता के स्तर पर वह भी अभिभावकों को संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं।

यूपी में निम्न मध्य वर्ग के नागरिक की आमदनी के बराबर फीस वसूलने वाले प्राइवेट स्कूलों का व्यवहार सुपर मार्केट जैसा हो गया है।

एक आंकड़े के अनुसार उत्तर प्रदेश में 1 लाख 40 हजार प्राथमिक व अपर प्राथमिक विद्यालय हैं तथा कागज पर 1.75 करोड़ विद्यार्थी हैं अर्थात औसतन एक विद्यालय में 125 बच्चे होने चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं है। कागज पर यह भी दर्शाया जाता है कि उत्तर प्रदेश के इन विद्यालयों में 3.79 लाख अध्यापक हैं तथा 2.07 लाख अध्यापकों की और जरूरत है, लेकिन सच्चाई इससे इतर है।

किसी-किसी स्कूल में तो 10-15 बच्चे हैं और 4-5 अध्यापक हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में अध्यापकों की भारी किल्लत है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में कोई अध्यापक जाना नहीं चाहता। जहां बच्चे हैं वहां अध्यापक नहीं हैं और जहां अध्यापक हैं वहां बच्चे नहीं हैं।

कई स्कूलों में तो ये तक देखने को आया है, कि नियुक्त शिक्षक दलित बालिकाओं के साथ दोहरा व्यवहार करते हैं। वे इन बालिकाओं से स्कूल की सफाई आदि के काम करवाते हैं। उन्हें कक्षा में सबसे पीछे बिठाया जाता है और छुआछूत का व्यवहार किया जाता है। अतः ऐसे में यदि कोई परिवार अपने बच्चे को स्कूल भेजता भी है, तो उसके ठहराव की संभावना काफी कम हो जाती है। लेकिन यह व्यवहार अत्यंत न्यून प्रतिशत में ही व्यवहार परिलक्षित हुआ।

यहां यह भी गौरतलब है, कि ग्रामीण क्षेत्रों में दलित बस्तियों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। दलित बालिकाओं के परिवारों के पास पूंजी एवं परिसंपत्तियों के अभाव के चलते दलित बालिकायें बाल श्रम करने को मजबूर हैं। शैक्षिक विकास के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बाल्य अवस्था एवं किशोर वय श्रम के बोझ के नीचे दबकर रह जाती है।

अनेक अभिभावकों और जागरूक लोगो से बात करने पर बालिका शिक्षा में अपेक्षित सुधार के लिए अनेक सुझाव प्रकाश में आये हैं, जैसे- कई लोगों ने इस बात पर भी बल दिया है, कि ग्राम सभा और विद्यालय में ऐसा माहौल बनाया जाये जहां लड़कियां डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना देख सकें। एक अन्य सरल समाधान यह था, कि एकल विद्यालय खोला जाये जहां शिक्षित ग्रामीण अपने घरों के आसपास के क्षेत्र में छात्राओं को शिक्षा प्रदान कर सकें।

एक बहुत ही नवाचारी समाधान यह निकाला गया, कि प्रत्येक ग्राम सभा स्तर पर ग्राम पंचायत, विद्यालय प्रशासन और अभिभावकों की सयुंक्त समिति का निर्माण किया जाये, जिसे स्कूल जाने वाली लड़कियों की संख्या और उनकी परेशानियों से संबंधित सभी विवरण रखने के लिए जिम्मेदार बनाया जाये।

ये सयुंक्त समिति छात्राओं की परेशानियों को हल करेगी और साथ ही ये सुनिश्चित करेगी कि बीच में विद्यालय छोड़ने वाले छात्रों की दर में कमी लाई जाये।

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