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कैसे एक-एक मुट्ठी चावल से महिलाओं ने बना डाला सेंट्रल इंडिया का सबसे बड़ा बैंक

घर के राशन से रोजाना एक एक मुट्ठी चावल बचाकर की गई बचत तब्दील हुई मध्य भारत के सबसे बड़े महिला बैंक के रूप में...

18th Dec 2017
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छत्तीसगढ़, जिला बिलासपुर में मस्तूरी प्रशासनिक ब्लॉक के 68 गांवों में रह रही महिलाओं ने अपनी लगन और मेहनत से कमाल कर दिखाया है। 

साभार: जगदीश यादव

साभार: जगदीश यादव


घर के राशन से रोजाना एक एक मुट्ठी चावल बचाकर की गई बचत आज मध्य भारत के सबसे बड़े महिला बैंक के रूप में तब्दील हो गई है। सखी क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी जून, 2003 में सरल नियमों के साथ बनाई गई थी। ये नियम थे- बचत करो, जमा करो और उधार दो। 

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में मस्तूरी प्रशासनिक ब्लॉक के 68 गांवों में रह रही महिलाओं ने अपनी लगन और मेहनत से कमाल कर दिखाया है। घर के राशन से रोजाना एक एक मुट्ठी चावल बचाकर की गई बचत आज मध्य भारत के सबसे बड़े महिला बैंक के रूप में तब्दील हो गई है। सखी क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी जून, 2003 में सरल नियमों के साथ बनाई गई थी। ये नियम थे- बचत करो, जमा करो और उधार दो। ये अनूठा बैंक लोगों के बीच में सखी महिला बैंक के नाम से लोकप्रिय है। ये बैंक ग्रामीण महिलाओं को ऋण प्रदान करता है, जो कि बहुत गरीब हैं। ये औरतें, पारंपरिक बैंक ऋण के लिए अर्हता प्राप्त नहीं कर सकती हैं क्योंकि उनके पास गारंटी जैसी पेशकश करने के लिए कोई संपत्ति नहीं है।

वो महिलाएं, जिनकी बैंकिंग दुनिया तक पहुंच नहीं है, ने पाया कि गरीबी उन्मूलन के लिए माइक्रोफाइनेंस एक शक्तिशाली उपकरण है। महिलाएं बैंक में संचित बचत से उधार लेती हैं और खेती के औजार खरीदने के लिए इस धन का इस्तेमाल करती हैं, पशुधन जोड़ती हैं। इसी तरह यह उनकी आय में वृद्धि करता है और समय पर ऋण चुकाने में उन्हें सक्षम बनाता है। बैंक ने केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने में मदद नहीं की है, बल्कि उन्हें पंचायत चुनाव लड़ने और उनके समुदाय की सेवा करने के लिए अधिकार दिया है।

हेमलता साहू

हेमलता साहू


सखी महिला बैंक की फाउंडर चीफ एक्जीक्यूटिव और एनजीओ महिला शिक्षा कल्याण एवम परीक्षा परिषद (एमएसकेपीपी) की मुख्य कार्यवाहक हेमलता साहू के मुताबिक, इस बैंक के साथ बचत संस्कृति एक नए प्रयोग के रूप में शुरू हुई। ग्रामीण छत्तीसगढ़ पितृसत्तात्मक समाज है लेकिन महिलाओं का घरों के अनाज पर नियंत्रण है। हमने महिलाओं से कहा कि उनके रोजाना इस्तेमाल में से एक मुट्ठी चावल बचा लिया करें। गांव की महिलाओं में हम बचत की नई संस्कृति पैदा कर रह रहे हैं।

23 गांवों में शुरू हुई इस पहल के परिणाम उत्साहजनक थे। हर दिन एक मुट्ठी के चावल को सहेजना जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण प्रक्रिया का प्रारंभिक बिंदु था और इससे विभिन्न प्रकार के शोषण से महिलाओं को मुक्त करना था। यह गरीब महिलाओं के बीच बचत के महत्व के बारे में एक समझ पैदा करता है। महिलाओं ने प्रति माह 5 रुपये या 10 रुपये की बचत की और स्वयं स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) की मासिक बैठकों के दौरान जमा करने शुरू कर दिए। जब वे अपनी बचत बैंक में जमा करना चाहते थीं तो उन्हें बैंक के प्रतिनिधियों के निराशाजनक रुख का सामना करना पड़ता था।

इस तरह से एसएचजी महिलाओं ने अपना खुद का बैंक शुरू करने का फैसला किया। हेमलता बताती हैं, हमने सखी महिला बैंक शुरू किया क्योंकि महिलाओं ने इसकी मांग की थी। वे अपनी बचत जमा करने की जगह चाहते थींं। आज, बिलासपुर जिले में सखी महिला बैंक दूसरों के लिए दोहराने के लिए एक मॉडल है। इसमें 64 एसएचजी और 9,088 महिलाओं के खाताधारकों से प्राप्त 29.80 मिलियन की जमा राशि है। यह मध्य भारत का सबसे बड़ा महिला बैंक है।

2,000 लोगों की आबादी वाले कोनी गांव में रोजगार के अवसर और आजीविका के स्थायी स्रोत नहीं हैं। गांव में भूमि अधिग्रहण अत्यधिक खंडित है। कोनी की महिलाओं के सखी महिला बैंक ने आर्थिक अवसरों के एक स्थायी मॉडल के तेजी से विकास में योगदान दिया है। इसके अलावा, बैंक ग्रामीण विकास को अन्य विकास संबंधी मुद्दों पर काम करने के लिए जुटाता है। उदाहरण के लिए, पहाड़ों से मैदानी इलाकों की ओर बढ़ते पानी की वजह से मिट्टी की क्षरण से निपटने में एक व्यावहारिक समाधान लगाने में यह काफी सफल रहा है। हेमलता ने ग्रामस्वायर.इन को बताया, 14 वर्षों की अवधि में हमने गरीब महिलाओं को जुटाने के लिए एक उपकरण के रूप में माइक्रो-क्रेडिट सहायता का इस्तेमाल किया है।

कोनी की 52 वर्षीय कौशल्या साहू ने गांवस्क्वायर.इन को बताया, इससे पहले हम पैसे उधारदाताओं से उधार लेते थे और वे हमें ऊंची दरों के ब्याज लगाकर पैसे देते थे। मैंने 2007 में सखी महिला बैंक की सदस्यता ली और उसने मेरी जिंदगी को बदल दिया। उन्होंने 20 रुपये की मासिक बचत के साथ 10,000 रुपये उधार लिया था, इसका उपयोग अपने 2 एकड़ कृषि भूमि को रिडीम कर लिया। फिर से अपना पहला ऋण चुकाने के बाद एक बोर के लिए फिर से उधार लिया। छः वर्षों के अंतराल में मैंने पांच बार पशुधन, चक्कीदार मिलों आदि खरीदने के लिए सखी महिला बैंक से ऋण लिया और समय पर वापस चुकाया।

कौशल्या के ही तरह गांव की अन्य महिलाओं ने भी सखी महिला बैंक के जरिए अपनी जिंदगी संवारी है, सजाई है। अति सूक्ष्म बचत से इतना बड़ा बैंक खड़ा कर देना और इतनी बड़ी संख्या में लोगों को इससे फायदा मिलना, एक पुख्ता सबूत है इस बात का कि सोच लो तो कुछ भी मुश्किल नहीं।

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