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स्वास्थ्य सेवाओं को मिली नई पहचान, ‘जीवंती हेल्थकेयर’ कर रहा है कमाल

अप्रैल, 2011 में जीवंती हेल्थकेयर की स्थापनाअस्पताल के प्रबंधन का कामकाज संभालने में माहिर ‘जीवंती हेल्थकेयर’महाराष्ट्र और गुजरात में ‘जीवंती हेल्थकेयर’ की सेवाएं

13th Jul 2015
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बढ़ती आबादी के साथ देश को जरूरत है हेल्थकेयर सेवाओं के विस्तार की। इसी बात को ध्यान में रखते हुए पूर्व बैंक कर्मी अरूण डियाज ने जीवंती हेल्थकेयर की शुरूआत की। अप्रैल, 2011 में शुरू हुए जीवंती हेल्थकेयर की योजना 50 बिस्तरों वाले अस्पताल को महाराष्ट्र और गुजरात में खोलने की है। जीवंती फिलहाल मुंबई उपनगरीय में दो अस्पतालों में काम कर रहा है जहां पर ये स्त्री रोग और प्रसूति, बाल चिकित्सा, सामान्य चिकित्सा और जनरल सर्जरी के रोगियों को सलाह देने का काम करता है।

अरुण डियाज

अरुण डियाज


देश में हेल्थकेयर के क्षेत्र काफी बड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक साल 2017 तक ये 160 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा। जीवंती के मॉडल में कोई तामझान नहीं है इसमें लाभ का खास ध्यान रखा गया है। इन लोगों का मानना है कि बड़े अस्पताल, सरकारी अस्पताल और ऐसे क्लिनिक जो सिर्फ एक डॉक्टर के सहारे चल रहे हैं इनके बीच के हिस्से में जीवंती अपने काम को अंजाम दे रहा है।

अरुण और दीपा का काफी समय पहले से थाणे के नजदीक अपोलो क्लिनिक चल रहा है और जीवंती उनके सपनों का विस्तार देने की कोशिश भर है। जीवंती फिलहाल थाणे जिले के दो अस्पतालों जो अंबरनाथ और भिवंडी में मौजूद हैं यहां पर काम कर रहा है। ये इन अस्पतालों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जीवंती की टीम ने इन अस्पतालों में अपने मानकों के अनुसार बदलाव किये हैं।

इन अस्पतालों का मालिकाना हक इसके मूल स्वामियों के पास ही है जीवंती इस अस्पताल के प्रबंधन पर नियंत्रण के अलावा डॉक्टरों और कर्मचारियों को पुनः संगठित कर रहा है। इसके अलावा आधुनिक तकनीक और सुविधाएं भी ये लोग अस्पताल को दे रहे हैं। जीवंती के संस्थापक अरुण के मुताबिक वो लोग ऐसे अस्पतालों में काम करना ज्यादा पसंद करते हैं जो यूनानी या आयुर्वेदिक हों। इन लोगों की कोशिश इन अस्पतालों में योग्य तकनीशियनों की संख्या में वृद्धि करना और गुणवत्ता के नए मानक तैयार करना है। ताकि अस्पताल में मूल स्वामियों का लाभ बढ़े।

दीपा चंद्रशेखर

दीपा चंद्रशेखर


किसी भी अस्पताल को अपनी सुविधाएं देने से पहले जीवंती कुछ चीजों का खास ध्यान रखता है। जैसे कि अस्पताल किस शहर में है, उसकी क्षमता 50 बिस्तरों वाली है कि नहीं, अस्पताल अपने आप में आत्मनिर्भर है कि नहीं, जिस जगह पर अस्पताल है वहां की आबादी कम से कम दो लाख होनी चाहिए, जिस जगह अस्पताल काम कर रहा है वो उसकी जगह है या वो किराये पर चल रहा है। इसके बाद ही जीवंती अपनी सेवाएं देने के लिए तैयार होता है।

जीवंती के साथ जुड़े कुछ डॉक्टर अपना पूरा समय इसको देते हैं जबकि कुछ डॉक्टर यहां पर नियमित रूप से कुछ वक्त के लिए आते हैं। अरूण मानते हैं कि ऐसे डॉक्टरों को ज्यादा फीस देनी होती है लेकिन अरुण मानते है कि जब ज्यादा डॉक्टरों की अस्पताल में जरूरत ना हो तो इनको पूरे वक्त के लिए रखना ठीक नहीं होता। खास बात ये है कि जीवंती जब किसी अस्पताल के प्रबंधन का कामकाज संभालता है तो वो वहां पर पहले से काम कर रहे डॉक्टरों को बाहर नहीं निकालता बल्कि वो उनको भी अपने साथ जोड़ता है। किसी अस्पातल के साथ जुड़ने के बाद जीवंती उस इलाके के आसपास विभिन्न तरह के कार्यक्रम आयोजित करता है। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उस अस्पताल के बारे में परिचित हो सकें। इन कार्यक्रमों में स्थानीय कलाकारों और नेताओं को भी बुलाया जाता है। जबकि प्रचार के दूसरे साधनों के लिए ये लोग आउटडोर का सहारा लेते हैं।

किसी भी अस्पताल से जुड़ने के बाद जीवंती कई तरह के स्वास्थ्य कैंप आयोजित करता है जहां पर हड्डी रोग, स्त्री रोग और दूसरी बीमारियों की जांच और सलाह दी जाती है। ये लोग स्थानीय संस्थाओं, विभिन्न हाउसिंग सोसायटी में भी स्वास्थ्य जांच शिविर नियमित तौर पर आयोजित करते रहते हैं। जीवंती अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता बनाये रखने के साथ उनकी लागत पर भी खास ध्यान देता है। जीवंती के संस्थापकों का मानना है कि इसे अभी लंबी यात्रा करनी है। इन लोगों का मानना है कि छोटे शहरों में बढ़िया स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में ढेरों मौके हैं। फिलहाल जीवंती की टीम का ध्यान महाराष्ट्र और गुजरात में है। जिसके बाद ही वो दूसरे राज्यों की ओर रुख करेंगे।

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