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हिंदू कैंसर मरीज के लिए पैसे जुटाने के लिए नहीं निकाला बंगाल के मुस्लिमों ने मुहर्रम जुलूस

7th Oct 2017
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वैसे तो लाचार, असहाय और गरीबों का कोई धर्म नहीं होता है। लेकिन आज भी हमारा समाज धार्मिक और जातीय अस्मिता को लेकर इतना कट्टर है कि हर एक इंसान को जाति और धर्म से जोड़कर ही देखता है। 

फोटो साभार- इंडिया मार्क्स और इंपैक्ट गुरू

फोटो साभार- इंडिया मार्क्स और इंपैक्ट गुरू


पश्चिम बंगाल में तो आए दिन राजनीतिक दलों द्वारा आपस में लड़ने की खबरें आती हैं। इसके साथ ही वे धर्म का सहारा लेकर एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का काम करते हैं। 

भूनिया इस समय दक्षिणी कोलकाता में सरोज गुप्ता कैंसर रिसर्च सेंटर में भर्ती होकर अपना इलाज करवा रहे हैं। वक्त-वक्त पर उन्हें कीमोथेरेपी भी दी जाती है जिसमें काफी खर्च आता है। 

एक तरफ हमें रोज सुबह से उठने से लेकर शाम को सोने तक जातीय और धार्मिक हिंसा की खबरें सुनने को मिलती हैं वहीं बंगाल के खड़गपुर में मुस्लिमों ने मुहर्रम जुलूस के लिए इकट्ठे किए गए पैसों को एक कैंसर मरीज को दान कर कर मानवता की मिसाल पेश की है। खास बात यह है कि वह मरीज भी मुस्लिम नहीं बल्कि हिंदू था। वैसे तो लाचार, असहाय और गरीबों का कोई धर्म नहीं होता है। लेकिन आज भी हमारा समाज धार्मिक और जातीय अस्मिता को लेकर इतना कट्टर है कि हर एक इंसान को जाति और धर्म से जोड़कर ही देखता है। बंगाल में हर साल भव्य दुर्गा पूजा का आयोजन होता है। दुर्गा पूजा के कुछ दिन बाद ही मुहर्रम का जुलूस निकलता है और मातम भी मनाया जाता है।

पश्चिम बंगाल में तो आए दिन राजनीतिक दलों द्वारा आपस में लड़ने की खबरें आती हैं। इसके साथ ही वे धर्म का सहारा लेकर एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का काम करते हैं। लेकिन खड़गपुर के मुस्लिमों ने जो काम किया है उससे हमारे देश के राजनेताओं को काफी कुछ सीखने की जरूरत है। खड़गपुर के पुरातन बाजार में हर साल मुहर्रम के मौके पर मातम मनाया जाता है और धार्मिक जुलूस भी निकलता है। इसके लिए लोगों से चंदा भी वसूला जाता है। लेकिन इस बार ऐसा जुलूस नहीं निकला। वजह थी बाजार में मोबाइल की दुकान चलाने वाले अबीर भूनिया (35) की बीमारी। अबीर लिम्फोमा से पीड़ित हैं। यह एक प्रकार का कैंसर होता है जो पाचन प्रणाली को ध्वस्त कर देता है।

भूनिया इस समय दक्षिणी कोलकाता में सरोज गुप्ता कैंसर रिसर्च सेंटर में भर्ती होकर अपना इलाज करवा रहे हैं। वक्त-वक्त पर उन्हें कीमोथेरेपी भी दी जाती है जिसमें काफी खर्च आता है। उन्हें बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए 12 लाख रुपयों की जरूरत है। समाज संघ के सचिव अमजद खान ने बताया, 'मुहर्रम का जुलूस तो हर साल निकलता है, लेकिन इस वक्त अबीर की जिंदगी बचाना सबसे जरूरी काम है।' समाज संघ क्लब ने अबीर के लिए 50,000 रुपये इकट्ठे कर रहे हैं। साजिद ने बताया कि उन्होंने अबीर के इलाज के लिए पैसे भी इकट्ठे करने शुरू कर दिए हैं। शुक्रवार के दिन नमाज के बाद उन्होंने मस्जिद के इमाम से ऐलान भी करवाया कि अबीर के इलाज के लिए पैसे दान किया जाए।

साजिद ने बताया कि जितना पैसा जुलूस के लिए इकट्ठा होता है उससे कहीं अधिक पैसा अबीर के लिए इकट्ठा करेंगे। अबीर ने भी समाज संघ के लोगों की पहल की तारीफ की है। उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं पता कि मैं ठीक होऊंगा या नहीं लेकिन मेरी खातिर इन लोगों ने जो प्रयास किया है वह मेरे दिल को छू गया।' अबीर की दादी और उनके माता पिता का पिछले साल ही देहांत हो गया था। अब वह अपनी पत्नी के साथ रहते हैं। उनकी पत्नी एक बच्चे को जन्म देने वाली हैं। पिछले कुछ दिनों से पूरे राज्य में अशांति का माहौल था। क्योंकि प्रदेश सरकार ने दुर्गा पूजा विसर्जन को विजयदशमी के मौके पर आयोजित न करने का आदेश जारी किया था। सरकार का मानना था कि मुहर्रम और विजयशमी के आस-पास पड़ने की वजह से हिंसा और तनाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। हालांकि कोलकाता हाईकोर्ट ने सरकार के इस आदेश को रद्द कर दिया था।

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