संस्करणों
विविध

आंख से नहीं दिखता इन महिलाओं को, लेकिन फसल उगाकर कर रही हैं जीवन यापन

जबलपुर के ग्रामीण एलाकों की दृष्टिहीन महिलाएं किसानी करके पेश कर रही हैं बहादुरी की एक अनोखी मिसाल...

yourstory हिन्दी
7th Dec 2017
Add to
Shares
8
Comments
Share This
Add to
Shares
8
Comments
Share

कहने को तो दृष्टिहीनों के लिए तकनीक है जिसके सहारे वे अपनी पढ़ाई कर सकते हैं, लेकिन हमारे देश की हालत इतनी बेहतर तो है नहीं कि दूर दराज इलाकों में रहने वाले दृष्टिहीनों को पर्याप्त शिक्षा मुहैया करवा पाए।

दृष्टिहीन किसान तारादेवी (फोटो साभार- जागरण)

दृष्टिहीन किसान तारादेवी (फोटो साभार- जागरण)


 शायद यही वजह है कि अभी भी दृष्टिहीनों को छोटे काम के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन मध्यप्रदेश के जबलपुर की ग्रामीण महिलाओं की कहानी सुनकर आप गौरान्वित हो उठेंगे।

 इन महिलाओं की कहानी सुनकर आप भी शायद अब सोचना बंद कर दें कि दृष्टिहीन अपनी जिंदगी कैसे चलाते हैं। देखा जाए तो ये महिलाएं हमारे जीवन के लिए प्रेरणास्रोत होनी चाहिए।

हमें कई बार शरीर से पूरी तरह से स्वस्थ्य लोग बेरोजगारी का रोना रोते दिख जाते हैं। जिनके बारे में देखकर हमें दुख होता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था कितनी बदहाल है कि एक इंसान को इस काबिल नहीं बना सकती कि उसे ढंग की नौकरी या जीवनयापन का कोई साधन ही मिल जाए। फिर जब हम किसी विकलांग को शारीरिक अक्षमता से जूझते हुए काम करते देखते हैं तो हमें न केवल खुशी होती है बल्कि उन पर गर्व भी होता है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि दृष्टिहीनता जैसी अपंगता से मार खाया इंसान अपना जीवन यापन करते वक्त कितनी चुनौतियों से जूझता होगा।

कहने को तो दृष्टिहीनों के लिए तकनीक है जिसके सहारे वे अपनी पढ़ाई कर सकते हैं, लेकिन हमारे देश की हालत इतनी बेहतर तो है नहीं कि दूर दराज इलाकों में रहने वाले दृष्टिहीनों को पर्याप्त शिक्षा मुहैया करवा पाए। शायद यही वजह है कि अभी भी दृष्टिहीनों को छोटे काम के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन मध्यप्रदेश के जबलपुर की ग्रामीण महिलाओं की कहानी सुनकर आप गौरान्वित हो उठेंगे। दरअसल ये महिलाएं बचपन से ही दृष्टिहीन हैं, लेकिन ये अपना सारा काम करने के साथ ही खेती भी कर लेती हैं। ये खेतों में सब्जियां और फसलें उगाकर अपने जीवन का आर्थिक ढांचा दुरुस्त कर रही हैं।

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के मुताबिक सिहोरा ब्लॉक के गांव जॉली की तारा बाई। 50 की उम्र पार कर चुकीं तारा बाई बचपन से दृष्टिहीन हैं। छह महीने की उम्र में आंखों की रोशनी चली गई। दृष्टिहीनता के कारण शादी नहीं हुई। जैसे जैसे समय बीता, खुद को परिवार पर बोझ मानने लगीं। मजबूर थीं। क्या करतीं। लेकिन, कुछ करना जरूर चाह रही थीं। खेती के अलावा कुछ और कर भी नहीं सकती थीं। खेती करना मुश्किल था। बागवानी का विचार आया। इसके लिए घर के बगल ही पर्याप्त जमीन भी मुहैया थी। खुद ही सब्जियां उगाने की ठानी, लेकिन दृष्टिहीनता आड़े आई।

सच में इन ग्रामीण दृष्टिहीन महिलाओं की दाद देनी पड़ेगी, जो सब्जियां उगा कर आर्थिक निर्भरता हासिल कर रही हैं। बीज, पौधों, पत्तियों, फल-फूलों को छू कर पहचानने की कला इन्होंने बड़े जतन से विकसित कर ली है। यह सब संभव हुआ एक एनजीओ के कार्यकर्ता की बदौलत जो गांव में पहुंचे। वे दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रहे थे। तारा बाई ने उनसे अपने मन की बात बताई। एनजीओ ने इसके लिए जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क किया। बात बन गई। कृषि विश्वविद्यालय तारा बाई को बागवानी-सब्जी उत्पादन की विशेष ट्रेनिंग देने को तैयार हो गया। तारा की ट्रेनिंग शुरू हो गई।

तारा बताती हैं, पहले हम कहीं भी पौधे लगा देते थे, लेकिन ट्रेनिंग के बाद हमें पता चला कि क्यारी उत्तर-दक्षिण दिशा में बनाना चाहिए। इससे पौधों पर धूप सीधी नहीं पड़ती। इसके साथ ही सब्जी के अच्छे बीज भी हमें दिए गए। जॉली के साथ ही बुधुआ गांव में भी दिव्यांग महिलाएं सब्जियां उगा रही हैं। 65 वर्षीय रज्जो बाई भी नेत्रहीन हैं और अपनी जमीन पर सब्जियां उगा रही हैं। बुधुआ की दृष्टिहीन अनामिका आंगन में सब्जी के साथ ही गेंदे के फूल की भी खेती कर रही हैं। इन महिलाओं की कहानी सुनकर आप भी शायद अब सोचना बंद कर दें कि दृष्टिहीन अपनी जिंदगी कैसे चलाते हैं। देखा जाए तो ये महिलाएं हमारे जीवन के लिए प्रेरणास्रोत होनी चाहिए।

यह भी पढ़ें: जिसने मां से एक लाख रुपये उधार लेकर खोली कंपनी, वो आज है 1700 करोड़ की मालकिन

Add to
Shares
8
Comments
Share This
Add to
Shares
8
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest Stories

हमारे दैनिक समाचार पत्र के लिए साइन अप करें