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उच्च जाति की महिलाओं की तुलना में दलित महिलाओं की औसत उम्र 14.6 साल कम: यूएन रिपोर्ट

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23rd Feb 2018
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जहां एक ऊंची जाति की महिला की औसत उम्र 54.1 साल है, वहीं एक दलित महिला की औसत उम्र सिर्फ 39.5 होती है। इसका कारण दलित महिलाओं को उचित साफ-सफाई न मिलना, पानी की कमी और समुचित स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है। 

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर


 यूएन रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है कि दलित समुदाय से संबंध रखने वाली महिलाओं की औसत उम्र उच्च वर्ग की महिलाओं की तुलना में 14.6 साल कम होती है।इसका कारण दलित महिलाओं को उचित साफ-सफाई न मिलना, पानी की कमी और समुचित स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है। यूएन रिपोर्ट में 89 देशों को सम्मिलित किया गया है। 

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी रिपोर्ट में कई सारे खुलासे हुए हैं जिसमें भारत में महिलाओं की स्थिति चिंताजनक बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक मातृत्व मृत्यु दर के पीछे कम साफ-सफाई, स्वास्थ्य की अच्छी सुविधा न होना जैसी कई वजहें होती हैं। इस रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है कि दलित समुदाय से संबंध रखने वाली महिलाओं की औसत उम्र उच्च वर्ग की महिलाओं की तुलना में 14.6 साल कम होती है। इस रिपोर्ट को 'टर्निंग प्रॉमिसेस इन टू एक्शन- जेंडर इक्वॉलिटी इन द 2030 एजेंडा' के नाम से प्रकाशित किया गया है।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ दलित स्टडीज़ के 2013 के एक शोध के आधार पर इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां एक ऊंची जाति की महिला की औसत उम्र 54.1 साल है, वहीं एक दलित महिला की औसत उम्र सिर्फ 39.5 होती है। इसका कारण दलित महिलाओं को उचित साफ-सफाई न मिलना, पानी की कमी और समुचित स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है। यूएन रिपोर्ट में 89 देशों को सम्मिलित किया गया है। सभी 17 सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने और उन्हें लागू करने में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के सिए लैंगिक दृष्टि से अध्ययन कर रिपोर्ट को जारी किया गया है।

रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे पूरे देश का विकास करने के लिए महिलाओं का विकास होना बेहद जरूरी है। इसमें सभी महिलाओं को सभी योजनाओं का लाभ दिलाने की भी बात कही गई है। रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि कैसे ग्रामीण परिवारों में लड़कियों की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में कर दी जाती है। साथ ही उनकी पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान नहीं दिया जाता। वहीं शहरी इलाकों की लड़कियों को इससे बेहतर सुविधाएं मिलती हैं और उन्हें पढ़ने का भी मौका दिया जाता है।

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ दलित स्टडीज के शोधकर्ताओं ने पाया कि ऊंची जाति और दलित महिलाओं की साफ-सफाई और पीने के पानी जैसी सामाजिक दशाएं एक जैसी भी हैं, तब भी सवर्ण महिलाओं की तुलना में दलित महिलाओं के जीवन प्रत्याशा में लगभग 11 साल का फर्क दिखाई देता है। भारत में अगर कोई महिला भूमिहीन है और अनुसूचित जाति से है तो उसके गरीब होने की संभावना ज्यादा हो जाती है. रिपोर्ट के शब्दों में ‘किसी महिला की कमजोर शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था में उसकी हैसियत तय करती है कि काम की जगह पर उसके लिए परिस्थितियां शोषणकारी होंगी या नहीं।

रिपोर्ट के मुताबिक असमानता की बढ़ती खाई के लिए आर्थिक स्थिति औरपरिवेश जैसे पहलू भी जिम्मेदार हैं। उदाहरण के लिए अगर किसी ग्रामीण परिवार में लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में कर दी जाती है तो वहीं शहरों में लड़कियों की शादी 20 से 24 साल में की जाती है। इससे शहरी परिवेश की महिला की तुलना में ग्रामीण महिला के कम उम्र में मां बनने, अपने पैसे का उपयोग न कर सकने या खर्च के बारे में जानकारी न होने की संभावनाएं भी कम ही रहती हैं। यूएन द्वारा दो साल पहले अपनाए गए सतत विकास के इस एजेंडा में 'लीव नो वन बिहाइंड' का नारा दिया गया है, जिसकी प्राथमिकता समाज के सर्वाधिक वंचितों की समस्याओं को उठाना है।

यह भी पढ़ें: ऑक्सफोर्ड से पीएचडी कर BHU में नया डिपार्टमेंट शुरू करने वाली प्रोफेसर की कहानी

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