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दम तोड़ते तालाबों की चीख कौन सुनेगा?

वर्तमान में देश के अधिकांश तालाब खत्म होने की कगार पर हैं। या तो वे सूख चुके हैं या उन पर गगनचुम्बी इमारतें बन गई हैं। तालाबों की हत्या की जा रही है। तालाब चीख रहे हैं, लेकिन उनकी सुनने वाले जिम्मेदार विकास की बेतुकी इबारत पढ़ाने पर आमादा हैं।

28th Jun 2017
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राजस्व अभिलेखों के अनुसार प्रदेश में 659278 जलाशय दर्ज हैं, जिसका कुल क्षेत्रफल 336072 हेक्टेयर है। वर्तमान समय में लगभग 20,000 जलाशयों पर अभी भी अतिक्रमण बना हुआ है, जिसे हटाया जाना अवशेष है।

फोटो साभार: randread

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भू-माफियाओं की गुण्डई का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल पहले तक लखनऊ में 12653 तालाब, पोखर और कुएं थे लेकिन भू-माफियाओं और बिल्डरों ने करीब चार हजार तालाबों को पाट दिया है, जबकि 2034 तालाबों, पोखरों व झीलों पर अवैध कब्जे हैं। लखनऊ के जनाधिकार कार्यकर्ता अशोक शंकरम और जनाधिकार एक्टिविस्ट नीरज पाण्डेय ने तमाम दस्तावेजों और साक्ष्यों के साथ राजधानी लखनऊ के केवल एक हिस्से में ही एक दो नहीं बल्कि कुल 35 तालाबों पर अवैध कब्जों के मामले में साल 2013 में हाईकोर्ट में याचिका (MISC.BENCH / 9402 / 2013 ) दाखिल करके जो हालात सामने रखे वो बेहद चौंकाने वाले हैं।

पहले देश के छोटे-बड़े शहरों और गांवों में दर्जनों तालाब हुआ करते थे। वर्तमान में देश के अधिकांश तालाब खत्म होने की कगार पर हैं। या तो वो सूख चुके हैं या उन पर गगनचुम्बी इमारतें बन गई हैं। तालाबों की हत्या की जा रही है। तालाब चीख रहे हैं लेकिन उनकी सुनने वाले जिम्मेदार विकास की बेतुकी इबारत पढ़ाने पर आमादा हैं। भू-वैज्ञानिक तालाबों और छोटी-छोटी नदियों के संरक्षण का सुझाव देते रहे हैं। चिन्तित न्यायालय अलग-अलग प्रकरणों में सरकार को जल संरक्षण से सम्बन्धित कड़े दिशा-निर्देश देता रहा है। सरकार अपनी उपलब्धियां हर कार्यक्रम में गिनाने पर तुली रहती है, लेकिन समाप्त हो रहे तालाबों पर किसी का ध्यान नहीं जाता। 1950 में भारत के कुल सिंचित क्षेत्र की 17 प्रतिशत सिंचाई तालाबों से की जाती थी। 

तालाब सिंचाई के साथ-साथ भू-गर्भ के जलस्तर को भी बनाए रखते थे, इस बात के ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं। समय के साथ इन तालाबों का अस्तित्व खत्म होता गया है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भू-माफियाओं की गुण्डई का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल पहले तक लखनऊ में 12653 तालाब, पोखर और कुएं थे लेकिन भू-माफियाओं और बिल्डरों ने करीब चार हजार तालाबों को पाट दिया है, जबकि 2034 तालाबों, पोखरों व झीलों पर अवैध कब्जे हैं। लखनऊ के जनाधिकार कार्यकर्ता अशोक शंकरम और जनाधिकार एक्टिविस्ट नीरज पाण्डेय ने तमाम दस्तावेजों और साक्ष्यों के साथ राजधानी लखनऊ के केवल एक हिस्से में ही एक दो नहीं बल्कि कुल 35 तालाबों पर अवैध कब्जों के मामले में साल 2013 में हाईकोर्ट में याचिका (MISC.BENCH / 9402 / 2013 ) दाखिल करके जो हालात सामने रखे वो बेहद चौंकाने वाले हैं।

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दस्तावेज गवाही दे रहे हैं, कि इनमें से अधिकतर मामलों में सरकारी तन्त्र ने सर्वोच्च अदालत के आदेशों का खुलेआम मखौल उड़ाते हुए बाकायदा कागजों पर जलस्रोतों का आवण्टन तक किया और वो भी नक्शे के साथ सभी सरकारी अभिलेखों में जलस्रोत के रूप में दर्ज होने की जानकारी के बावजूद। शंकरम और नीरज पाण्डेय की याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए लखनऊ विकास प्राधाकिरण द्वारा गोमती नगर में आवण्टित जमीन का प्रकरण भी शामिल है जिसमें हाईकोर्ट से जुड़े प्रकरण होने के चलते दोनो याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से एनजीटी एक्ट का हवाला देते हुए पूरे प्रकरण को एनजीटी के पास भेजने की अपील की है। 

याचिकाओं में जिन जलस्रोतों का जिक्र किया गया है वो तो वास्तविकता की एक कड़ी भर हैं, सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के बाद ऐसे हजारों नहीं बल्कि लाखों तालाब, पोखर, भीटा और जल स्रोतों पर अवैध कब्जे हो चुके हैं और सरकारी तन्त्र महज खानापूर्ती करने में जुटा है।

अगर यूपी की बात करें तो इलाहाबाद में 137601 तालाब, गोरखपुर में 3971 तालाब, बस्ती में 3831 तालाब, कानपुर में 3771 तालाब, विंध्याचल में 3281 तालाब, आजमगढ़ में 105351 तालाब, सहारनपुर में 68581 तालाब, फैजाबाद में 52791 तालाब, लखनऊ में 12653 तालाब, मेरठ में 18531 तालाब, देवीपाटन में 11311 तालाब, चित्रकूट में 4591 तालाब, बरेली में 4561 तालाब, मुरादाबाद में 4051 तालाब, अलीगढ़ में 2011 तालाब, वाराणसी में 1611 तालाब और आगरा में 59 तालाब अवैध कब्जे के कारण मिट चुके हैं। यही तालाब शहर को बाढ़ से बचाते थे। बरसात के वक्त पानी इनमें जमा हो जाता था, जिससे सड़कों पर जलभराव नहीं होता था।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में तालाबों को बचाने पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। सरोवर धरोहर योजना सरकार संचालित कर रही है, ताकि पेयजल संकट से बचा जा सके। रायपुर को तालाबों की नगरी कहा जाता था। यहां 227 तालाब थे। शासन-प्रशासन ने इन्हें सहेजने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसका परिणाम यह हुआ कि रायपुर के 53 तालाब सूख गए या भूमाफियाओं की भेंट चढ़ गए। अब केवल 175 तालाब हैं। जिससे आज पेयजल व निस्तारी के लिए हाहाकार मचा है, आज भी सड़क चौड़ीकरण व सार्वजनिक उपयोग के नाम पर कई तालाबों को खत्म करने की साजिश रची जा रही है। ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है, तालाबों पर अतिक्रमण किसी भी स्थिति में नहीं होना चाहिए।

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झारखण्ड की राजधानी रांची समेत कई जिले में मौजूद तालाब अब सूखने लगे हैं। पूरे सूबे में 50 फीसदी से अधिक तालाब विलुप्त हो चुके हैं। करीब 30 फीसदी तालाब गायब होने की कगार पर हैं। तालाबों के विलुप्त होने से जलस्तर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। शहरों और कस्बों का हाल बुरा हो गया है। 

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का केवल अण्डरग्राउंड वॉटर ही प्रदूषित नहीं हुआ है बल्कि यहां का बड़ा तालाब भी इससे अछूता नहीं है। करबला के नजदीक अहमदाबाद पम्प हाउस परिसर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से होता हुआ सीवेज वॉटर बड़े तालाब में मिल रहा है। इस सम्बन्ध में एनजीटी के निर्देशों के बाद भी इसको सीवेज से मुक्त नहीं किया जा सका है। इसी तरह से शहर का छोटा तालाब, सारंगपाणी, शाहपुरा झील भी पूरी तरह से प्रदूषित हो चुकी है। ऐसे में यहां झील बर्बाद हो रही है। ये हालात तब हैं जब सर्वोच्च न्यायालय ने 25 जुलाई 2001 को हिंचलाल तिवारी बनाम कमला देवी और अन्य के केस के फैसले के साथ स्पष्ट रूप से आदेश दिये थे कि "प्राकृतिक जल स्रोत मानव जीवन के आधार हैं इसलिए इनके अस्तित्व की रक्षा जरूरी है और इनके साथ छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।"

उत्तर प्रदेश के कृषि उत्पादन आयुक्त चंद्र प्रकाश का कहना है, कि 'वर्तमान समय में अधिकतर तालाब काफी उथले हो गए हैं और वर्षा भी बहुत कम होती है, जिसके कारण तालाब पूरी तरह भर नहीं पाते एवं ग्रामवासियों की रोजमर्रा की आवश्यकताएं यथा-मनुष्यों, पशुओं के पीने का पानी, खेती हेतु सिंचाई पूरी नहीं हो पाती है। ग्राउण्ड वाटर रिचार्जिंग नहीं हो पा रही है। स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि प्रदेश में उपलब्ध सभी तालाबों को ग्रीष्मकाल में कम से कम 10 या 15 फीट तक गहरा कर दिया जाये। तालाबों के गहरीकरण से निकलने वाली मिट्टी से चकरोडो को ऊंचा किया जा सकता है।' 

चंद्र शेखर के अनुसार 'उन निचले क्षेत्रों को; जहां जलभराव होता है, उन्हें ऊंचा किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त खेतों की मेड़बन्दी भी की जा सकती है। तालाबों का गहरीकरण होने से वर्षा कम होने के बाद भी तालाबों में जल का संचयन हो सकेगा, जिससे कि सफलतापूर्वक ग्राउण्ड वॉटर रिचार्जिंग हो सकेगी व ग्रामीण क्षेत्र में, जो कुएं, हैण्डपम्प, बोरिंग सूख रहे हैं, उनमें पानी की उपलब्धता हो सकेगी। यद्यपि तालाबों के गहरीकरण का कार्य ग्राम्य विकास विभाग द्वारा किया जाता है, लेकिन यह गहरीकरण मात्र 04-05 फीट ही किया जाता है, जिससे कि आवश्यकता के अनुरूप तालाबों में पानी का संचयन सम्भव नहीं है।'

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