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बच्चों की सफाई का ध्यान रखने वाले हेडमास्टर, खुद साफ करते हैं स्कूल का टॉयलट

30th Nov 2018
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स्कूलों में गंदगी की वजह से ही बच्चों में न जाने कितनी बीमारियां फैलती हैं। स्कूल में गंदगी की समस्या से एक अध्यापक को इतना दुख हुआ कि उसने खुद से ही स्कूल के टॉयलट साफ करना शुरू कर दिया।

महादेश्वर (फोटो साभार- कर्नाटक सरकार)

महादेश्वर (फोटो साभार- कर्नाटक सरकार)


उनकी सोच और पहल ने स्कूल का नक्शा ही बदल दिया है। उनकी वजह से ही गांव के बच्चे और उनके अभिभावक पढ़ने के लिए जागरूक हो गए हैं।

हमारे देश में सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है। खासकर प्राइमरी स्कूलों की, जहां अध्यापकों की कमी तो होती ही है साथ ही नॉन टीचिंग स्टाफ की भी कोई खास व्यवस्था नहीं होती। ऐसे में स्कूल की साफ-सफाई का ध्यान रख पाना मुश्किल हो जाता है और फिर यह काम मजबूरन बच्चों को ही करना पड़ जाता है। स्कूलों में गंदगी की वजह से ही बच्चों में न जाने कितनी बीमारियां फैलती हैं। स्कूल में गंदगी की समस्या से एक अध्यापक को इतना दुख हुआ कि उसने खुद से ही स्कूल के टॉयलट साफ करना शुरू कर दिया। उस नेकदिल और अच्छी सोच वाले अध्यापक का नाम बी. महादेश्वर स्वामी है जो कि कर्नाटक के एक स्कूल में हेडमास्टर हैं।

कर्नाटक के चामराजानगर जिले के होंगाहल्ली गांव के प्राइमरी स्कूल में पोस्टेड महादेश्वर हर रोज सुबह स्कूल के शौचालयों को साफ करते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि बच्चों को किसी तरह की गंदगी का सामना न करना पड़े। इतना ही नहीं वे अपने पैसों से स्कूल के बगीचे की देखभाल करते हैं और उन्होंने खुद से ही स्कूल में एक लाइब्रेरी भी स्थापित की है। उनकी सोच और पहल ने स्कूल का नक्शा ही बदल दिया है। उनकी वजह से ही गांव के बच्चे और उनके अभिभावक पढ़ने के लिए जागरूक हो गए हैं।

गांव के एक व्यक्ति ने कहा, 'महादेश्वर की खासियत यह है कि वे हर एक बच्चे को साफ-सफाई का ध्यान रखने के लिए प्रेरित करते हैं। इसके साथ ही वे बच्चों को खेलकूद और अन्य गतिविधियों में हिस्सा लेने को प्रेरित करते हैं। हम लोग भी अपने बच्चों को रोज स्कूल भेजते हैं और उनकी पढ़ाई पर खास ध्यान देने लगे हैं।' महादेश्वर के काम का ही नतीजा है कि आज स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़कर 121 हो गई है।

महादेश्वर ने अपने करियर की शुरुआत आज से लगभग 30 साल पहले 1988 में की थी। तब भी वह पढ़ाने के साथ ही स्कूल के शौचालय साफ करते थे। वह स्कूल एक आदिवासी कार्यकर्ता द्वारा स्थापित किया गया था। महादेव बताते हैं, 'मैंने वहां आठ सालों तक काम किया। मुझे शुरू से लगता था कि साफ-सफाई हमारे जीवन का अभिन्न अंग है और इसके आभाव में कई सारी बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं। 1994 में मैंने सरकारी नौकरी शुरू की, लेकिन मेरा ये काम जारी ही रहा।'

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