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उस शख़्स ने दलितों और महिला अधिकारों के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी

डॉ. भीमराव अंबेडकर के जन्मदिन पर पढ़ें ये विशेष रिपोर्ट...

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14th Apr 2017
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"डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 'अछूतों' को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाया और समाज से छुआछूत खत्म करने के लिए जीवन भर लड़ते रहे। अंबेडकर शिक्षा पर बहुत जोर देते थे। उनका कहना था कि शिक्षा ही समाज में समानता ला सकती है। जब मनुष्य शिक्षित हो जाता है तब उसमें विवेक और सोचने की शक्ति पैदा हो जाती है। उनकी अपनी खुद की एक निजी लाइब्रेरी भी, थी जिसमें 50,000 से ज्यादा किताबें थीं।"

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आज 14 अप्रैल है और इस दिन को देश के संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के जन्मदिन के रूप में जाना जाता है। संविधान की रचना करने के अलावा सामाज में बराबरी लाने के लिए उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया।

डॉ. भीमराव अंबेडकर को पढ़ने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन पढ़ लिखकर वे एक ऐसे मुकाम पर पहुंचे जहां पहुंचना आज लोगों के लिए सपना सा लगता है। उन्हें कानून विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री, इतिहास विवेचक, और धर्म और दर्शन के विद्वान के रूप में जाना जाता है। उन्होंने अपने समाज के लोगों से कहा था, 'हजारों साल से मेरा समाज दूसरों के पांव छूकर जिंदगी जीता आया है। मैं उन्हे इतना काबिल बनाना चाहता हूं कि वे अपनी जिंन्दगी किसी के सहारे पर नहीं बल्की अपनी मेहनत पर जियें। लेकिन मेरे लोग मेरे पैर छूकर अपनी जिम्मेदारी भूलना चाहते है।'

अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू के एक छोटे से गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का भीमाबाई था। वे अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान थे। उनका जन्म जिस जाति में हुआ था उसे महार जाति कहा जाता था और समाज में उसे अछूत और बेहद निचला वर्ग माना जाता था। इसलिए उनके साथ समाज में काफी भेदभाव किया जाता था। खाने-पीने, उठने-बैठने, काम करने और यहां तक कि पढ़ने लिखने की सुवधा से भी उन्हें वंचित रखने की कोशिश की जाती थी। इस माहौल में पैदा होने वाले आंबेडकर को शुरू से ही काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उन्हें पढ़ने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। लेकिन पढ़-लिखकर वे एक ऐसे मुकाम पर पहुंचे, जहां पहुंचना आज लोगों के लिए सपना सा लगता है।

भीमराव अंबेडकर की शादी 1906 में हुई थी। उनकी पत्नी का नाम रमाबाई था। अपनी स्कूली पढ़ाई करने के बाद आंबेडकर कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गये, जहां उन्होंने अर्थशास्त्र व राजनीति विज्ञान में अध्ययन किया और कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की।

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शिक्षित होने के बावजूद भीमराव अंबेडकर को सिर्फ अपनी जाति को लेकर कई बार अपमानित होना पड़ता था और ये बात उन्हें अंदर तक चोट पहुंचाती थी।

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे समाज को बदलने का सपना लेकर भारत लौटे। लेकिन उनकी राह इतनी आसान नहीं थी। उस दौरान देश में आजादी का आंदोलन अपने चरम पर था और बाबा साहब देश के दबे-कुचले लोगों के अधिकारों को लेकर संघर्ष कर रहे थे। इतने शिक्षित होने के बाद भी सिर्फ उनकी जाति को लेकर उन्हें कई बार अपमानित होना पड़ता था और ये बात उन्हें अंदर तक चोट पहुंचाती थी। शायद यही बात थी, जिसकी वजह से उन्हें हिंदू धर्म से मोहभंग होने लगा था। 

भीमराव अंबेडकर ने आंदोलनों के दम पर दलितों को इकट्ठा किया और उन्हें हक के लिए लड़ना सिखाया। उस वक्त दलितों को कुएं और तालाबों में पानी तक नहीं लेने दिया जाता था। आंबेडकर ने पानी के सार्वजनिक संसाधनों को समाज के सभी तबकों के लिए सुलभ कराने की लड़ाई लड़ी।

दलितों को मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं था। उन्होंने 'अछूतों' को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाया और समाज से छुआछूत खत्म करने के लिए जीवन भर लड़ते रहे। अंबेडकर शिक्षा पर बहुत जोर देते थे। उनका कहना था कि शिक्षा ही समाज में समानता ला सकती है। जब मनुष्य शिक्षित हो जाता है तब उसमें विवेक और सोचने की शक्ति पैदा हो जाती है। तब वह न खुद अत्याचार सहन कर सकता है और न ही दुसरों पर अत्याचार होते देख सकता है। आंबेडकर की निजी लाइब्रेरी भी, थी जिसमें 50,000 से ज्यादा किताबें थीं।

आम्बेडकर को कानून विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री, इतिहास विवेचक, और धर्म और दर्शन के विद्वान के रूप में जाना जाता है। उन्होंने अपने समाज के लोगों से कहा था, 'हजारों साल से मेरा समाज दूसरों के पांव छूकर जिंदगी जीता आया है। मैं उन्हेx इतना काबिल बनाना चाहता हूं कि वे अपनी जिंन्दगी किसी के सहारे पर नहीं बल्की अपनी मेहनत पर जियें। लेकिन मेरे लोग मेरे पैर छूकर अपनी जिम्मेदारी भूलना चाहते है।' वs मानते थे कि जब तक आप अपनी सामजिक व्यवस्था नही बदलेंगे, तब तक कोई प्रगति नही होगी। शुरू से ही जाति व्यवस्था के खिलाफ मुखर रहने वाले आंबेडकर के मुताबिक जाति व्यवस्था की नींव पर होने वाला कोई भी निर्माण चटक जायेगा।

15 अगस्त, 1947 को जब देश आजाद हुआ तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार बनी और आंबेडकर को देश का पहले कानून मंत्री की जिम्मेदारी मिली। उस वक्त उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें संविधान निर्माण का कार्य मिला। 29 अगस्त 1947 को आंबेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। संविधान में उन्होंने देश के मजदूर, दलित और महिलाओं के अधिकार पर विशेष ध्यान दिया। 

डॉ. भीमराव अंबेडकर: "सही मायने में असली प्रजातंत्र तब आयेगा, जब महिलाओं को संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलेगा और उन्हें घर परिवार में पुरुषों के बराबर अधिकार दिये जायेंगे।"

महिलाओं के लिए ही आंबेडकर संसद में 'हिन्दू कोड बिल' लेकर आए थे। उनका मकसद हिन्दू महिलाओं को पारिवारिक और सामाजिक शोषणों से मुक्ति दिलाना था। हालांकि काफी विरोध के चलते यह बिल संसद में पेश नहीं हो पाया और इसी वजह से उन्होंने मंत्रिपद से इस्तीफा दे दिया।

जब संविधान बन गया था, तब इसकी एक-एक कॉपी तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को दी गई। उन्होंने डॉ. अंबेडकर की तारीफ की। इसके बाद एक सभा बुलाई गई थी, जिसमें डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद ने कहा कि डॉ. भीमराव अम्‍बेडकर ने बीमार होने के बावजूद बड़ी लगन, मन व मेहनत से काम किया। वे सचमुच बधाई के पात्र हैं। ऐसा संविधान कोई भी दूसरा नहीं बना पाता।

डॉ. अंबेडकर धार्मिक रीति रिवाज के विरोधी और ईश्वर को न मानने वाले थे। वे कहते थे, 'मुझे उस भगवान, ईश्वर, अल्लाह की कतई आवश्कता नहीं है, जो अभी एक भूखे को रोटी तक नहीं दिला सकता और भविष्य मे जन्नत, स्वर्ग की सैर के सपने दिखाता है। मुझे उस धर्म की भी आवश्यकता नहीं है, जो एक भारतीय को दूसरे भारतीय से लड़वाता हो।' इसी वजह से उन्होंने 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में अपने पांच लाख साथियों के साथ बौद्धधर्म अपना लिया था। इस दौरान उनकी तबियत काफी खराब रहने लगी थी। वे डायबिटीज की बीमारी से जूझ रहे थे। ज्यादा दिन तक वे इससे नहीं लड़ सके और 6 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु हो गई।

अंबेडकर ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन सामाजिक बराबरी का उनका सपना आज भी अधूरा है। आज भी देश में कहीं-कहीं दलितों को शादियों में घोड़ी चढ़ने से रोक दिया जाता है और कहीं दलित को इंटरव्यू से रोकने के लिए उसके मुंह में रेत भर दी जाती है। हमारे पास आंबेडकर की कही बातें हैं। अगर हम उनके बताये रास्ते पर चलें तो शायद उनका सपना पूरा हो सकता है और ये जिम्मेदारी हम सब की है।


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