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जापानी गुड़िया जैसी खूबसूरत और अलौकिक आशा पारेख

14th Oct 2017
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'जुबली गर्ल' आशा पारेख किसी भी परिचय की मोहताज नहीं हैं। उन्होंने एक अभिनेत्री के तौर पर अपने कैरियर शुरू किया था। अभिनेत्री ने हिंदी फिल्मों के शुरुआती 50 के दशक से लेकर आखिर 70 के दशक तक पूरे फिल्म परिदृश्य में बदलाव कर डाला और वो गोल्डन युग की एक उल्लेखनीय अभिनेत्री बन गईं।

साभार: यूट्यूब

साभार: यूट्यूब


आशा पारेख ने 50 के दशक से लेकर आखिर 70 के दशक तक पूरे फिल्म परिदृश्य में बदलाव कर डाला और वो गोल्डन युग की एक उल्लेखनीय अभिनेत्री बन गईं। उनके ट्विस्ट एंड टर्न डांस के लाखों दीवाने हैं। लगातार दो दशकों तक वो हिट पे हिट फिल्म देती रहीं। सिल्वर स्क्रीन पर राज करने के बाद अनुभवी अभिनेत्री आशा पारेख ने एक बड़ा ब्रेक लिया। हाल के वर्षों में उन्हेोंने कई नृत्यों में हिस्सा लिया।

अपनी नृत्यकला को आशा ने जन-जन तक फैलाने के लिए हेमा मालिनी एवं वैजयंती माला की तरह नृत्य-नाटिकाएं चोलादेवी एवं अनारकली तैयार की और उनके स्टेज शो पूरी दुनिया में प्रस्तुत किए। उन्हें इस बात का गर्व है कि अमेरिका के लिंकन-थिएटर में भारत की ओर से पहली बार नृत्य की प्रस्तुति दी थी।

'जुबली गर्ल' आशा पारेख किसी भी परिचय की मोहताज नहीं हैं। उन्होंने एक अभिनेत्री के तौर पर अपने कैरियर शुरू किया था। अभिनेत्री ने हिंदी फिल्मों के शुरुआती 50 के दशक से लेकर आखिर 70 के दशक तक पूरे फिल्म परिदृश्य में बदलाव कर डाला और वो गोल्डन युग की एक उल्लेखनीय अभिनेत्री बन गईं। उनके ट्विस्ट एंड टर्न डांस के लाखों दीवाने हैं। लगातार दो दशकों तक वो हिट पे हिट फिल्म देती रहीं। सिल्वर स्क्रीन पर राज करने के बाद अनुभवी अभिनेत्री आशा पारेख ने एक बड़ा ब्रेक लिया। हाल के वर्षों में उन्हेोंने कई नृत्यों में हिस्सा लिया। आशा जी अभी भी बहुत सक्रिय हैं। वो बताती हैं, 'मुझे भ्रमण करना बहुत प्रिय है। मैं आज भी वहीदा जी (रहमान), सायरा जी (बानो) और हेलेन के संपर्क में हूं। हम दोपहर के भोजन के लिए जाते हैं, फिल्में देखते हैं और एक साथ यात्रा करते हैं। मैंने अपना जीवन पूरी तरह से आनंद लिया है। अगर यहां पुनर्जन्म हुआ है, तो मैं आशा पारेख के रूप में फिर से पैदा होना चाहूंगी और जो भी गलती करनी है उसे ठीक करूंगी।

आशा जी का जन्म दो अक्टूबर, 1942 को बेंगलुरू में एक गुजराती परिवार में हुआ था। इनकी मां मुस्लिम और पिता हिंदू थे। आशा का परिवार साई बाबा का भक्त था, जिसका प्रभाव उन पर भी पड़ा। आशा की मां छोटी उम्र से ही उन्हें शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा दिलाने लगीं थीं। बचपन से आशा को डांस का शौक था। पड़ोस के घर में संगीत बजता, तो घर में उसके पैर थिरकने लगते थे। बाद में मां ने कथक नर्तक मोहनलाल पाण्डे से प्रशिक्षण दिलवाया। बड़ी होने पर पण्डित गोपीकृष्ण तथा पंडित बिरजू महाराज से भरत नाट्यम में कुशलता प्राप्त की। अपनी नृत्यकला को आशा ने जन-जन तक फैलाने के लिए हेमा मालिनी एवं वैजयंती माला की तरह नृत्य-नाटिकाएं चोलादेवी एवं अनारकली तैयार की और उनके स्टेज शो पूरी दुनिया में प्रस्तुत किए। उन्हें इस बात का गर्व है कि अमेरिका के लिंकन-थिएटर में भारत की ओर से पहली बार नृत्य की प्रस्तुति दी थी।

साभार: डीएनए

साभार: डीएनए


धुन की पक्की आशा जी-

बचपन में आशा डॉक्टर बनना चाहती थीं, फिर उन्होंने आईएस अधिकारी बनने की सोची, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। पारेख ने अपने करियर की शुरुआत बतौर बाल कलाकार फिल्म ‘आसमान’ (1952) से की। एक कार्यक्रम में मशहूर फिल्म निर्देशक बिमल रॉय की नजर नृत्य करती आशा पर पड़ी और उन्होंने फिल्म ‘बाप-बेटी’ (1954) में आशा को पेश किया। फिल्म विफल रही और वह निराश भी हुईं, फिर भी उन्होंने कई फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम किया। बाद में अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कुछ समय के लिए उन्होंने फिल्मों से विराम ले लिया। आशा पारेख ने अपनी प्रतिभा के बलबूते अपना अलग मुकाम बनाया। उन्होंने 16 साल की उम्र में फिर से फिल्मी दुनिया में कदम रखना चाहा।

विजय भट्ट ने उन्हें ‘गूंज उठी शहनाई’ (1959) से यह कहकर निकाल दिया कि वह अभिनेत्री बनने लायक नहीं हैं। इसके आठ दिनों बाद निर्माता सुबोध मुखर्जी और निर्देशक नासिर हुसैन ने आशा को शम्मी कपूर के साथ ‘दिल देके देखो’ (1959) में काम करने का मौका दिया। यह फिल्म सफल रही और आशा रातोंरात मशहूर हो गईं। नासिर के साथ आशा के सबंध अच्छे बने रहे। आशा ने अपनी मातृभाषा गुजराती में भी फिल्में की। उनकी पहली गुजराती फिल्म ‘अखंड सौभाग्यवती’ बेहद सफल हुई थी। इसके अलावा पंजाबी ‘कंकण दे ओले’ (1971) और कन्नड़ ‘शरावेगदा सरदारा’ (1989) फिल्मों में भी उन्होंने काम किया। आशा के बारे में मीडिया में कभी अभद्र गॉसिप या स्केण्डल नहीं छपे। अलबत्ता आशा का साथ पाकर उनके नायकों की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सिल्वर तथा गोल्डन जुबिली मनाती रहीं। फिल्मी करियर जब ढलान पर आया तो आशा ने नासिर हुसैन के कहने पर कई टीवी सीरियलों का निर्माण किया, जिनमें ‘पलाश के फूल’, ‘बाजे पायल’, ‘कोरा कागज’, व कॉमेडी सीरियल ‘दाल में काला’ उल्लेखनीय हैं।

साभार: सोशल मीडया

साभार: सोशल मीडया


बहुमुखी प्रतिभा की धनी आशा जी-

आशा को 1992 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्हें 2001 में फिल्म फेयर लाइफटाइम पुरस्कार और 2006 में अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फिल्म अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। वह 1998 से 2001 तक सेंसर बोर्ड की पहली महिला अध्यक्ष रहीं। आशा पारेख ने वेतन तो नहीं लिया, लेकिन सख्त रवैये के कारण उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने कई फिल्मों को पास नहीं होने दिया, जिसमें शेखर कपूर की फिल्म एलिजाबेथ भी शामिल है। आशा सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन की अध्यक्ष भी रही हैं। अभिनेत्री के सम्मान में आशा पारेख अस्पताल भी खोला गया है। फिलहाल वह डांस एकेडमी कारा भवन पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, जिसमें बच्चों को नृत्य प्रशिक्षण दिया जाता है।

फिल्मी दुनिया के कामगारों के कल्याण के लिए लंबी लड़ाइयां भी उन्होंने लड़ी है। सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन की छः साल तक वे अध्यक्ष रहीं। केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन्‌ मण्डल (मुंबई) की चेयर पर्सन बनने वाली वह प्रथम महिला हैं। इस कांटों के ताज वाली कुर्सी पर बैठकर जब उन्होंने निष्ठापूर्वक काम किया, तो तरह-तरह के लोगों से उनका सामना हुआ। आशा के मुताबिक,‘तकनीकी रूप से हम बेहतर हुए हैं और किसी भी हॉलीवुड फिल्म से टक्कर ले सकते हैं लेकिन दुख की बात है कि हमारा काफी पश्चिमीकरण हो गया है। हिंदी फिल्में भारतीय संस्कृति से कट गयी हैं। यहां तक कि बॉलीवुड के नृत्य में भी हमारे भारतीय नृत्य की छाप नहीं है। यह खत्म होता जा रहा है जो दुखद है। आज के संगीत और बोल काफी अलग हैं। कुछ गाने हैं जो अच्छे हैं लेकिन बाकी का संगीत ऐसा नहीं है जिसे याद रखा जाए। मुझे रीमिक्स की यह पूरी संस्कृति पसंद नहीं है। मेरा गाना कांटा लगा बर्बाद कर दिया गया। मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं है।'

साभार: सोशल मीडया

साभार: सोशल मीडया


जब गहरे डिप्रेशन से जीती जंग-

लेकिन इन सब व्यस्तताओं, ग्लैमर और प्रसिद्धि के बीच आशा जी को डिप्रेशन में घिर गई थीं। अपनी मां की मौत के बाद आशा के जीवन में एक शून्यता आ गई। उसे समाज सेवा के जरिये भरने की उन्होंने सफल कोशिश की है। मुंबई के एक अस्पताल का पूरा वार्ड उन्होंने गोद ले लिया। उसमें भर्ती तमाम मरीजों की सेवा का काम किया। जरूरतमंदों की मदद की। वो बताती हैं, मैंने अपने माता-पिता को खो दिया और अचानक मैं अकेली हो गई थी। मुझे नहीं पता था कि क्या हो रहा था। मुझे नहीं पता था कि कैसे चीजों का प्रबंधन किया जाए और सामान्य स्तर पर वापस आ जाए। मैं अवसाद में पूरी तरह चली गई थी। मेरे सभी दोस्त मेरे पास थे और इस वजह से धीरे-धीरे मुझे इससे बाहर निकलने में मदद मिली। मुझे लगता है कि माता-पिता को अपने बच्चों के बारे में सावधान रहना चाहिए कि वे निराशा में फिसल रहे हैं और उन्हें ये न बोलें कि वे वास्तव में उदास नहीं हैं। अगर मैं अवसाद से बाहर आ सकती हूं, तो ये काम कोई भी कर सकता है।

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