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प्रेरणा

दो विश्वविद्यालय स्थापित करने वाले गुरविंदर सिंह बाहरा कभी टीवी बेचा करते थे और जब कभी उन्होंने घर पर कारोबार करने की बात कही थी उनका विरोध हुआ, बवाल मचा

बैंक कर्मचारी के बेटे ने अपने ‘बिज़नेसमाइंड’ से शिक्षा के क्षेत्र में कायम की नयी मिसाल ... सीए बनने निकले थे लेकिन सफलता की कहानियों से प्रेरित होकर कामयाब उद्यमी बने गुरविंदर सिंह ... समाज में बड़ा नाम कमाने के जुनून, मेहनत और ईमानदारी ने गुरविंदर सिंह को बनाया कामयाब उद्यमी 

2nd Aug 2016
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चार्टर्ड एकाउंटेंट की पढ़ाई कर रहे गुरविंदर सिंह बाहरा ने जब अपने माता-पिता को ये बताया कि वे कारोबार करना चाहते हैं तो घर में बवाल बच गया। माता-पिता और भाई-बहनों के होश उड़ गए। सबका सिर चकरा गया। माता-पिता को लगा कि उनका बेटा बिगड़ गया है, बुरी संगत में पड़ गया है। माता-पिता ने गुरविंदर सिंह को समझाने की हर मुमकिन कोशिश की। गुरविंदर सिंह से कहा गया कि कारोबार करना उनके जैसे छोटे लोगों के बस की बात नहीं है, कारोबार सिर्फ बड़े लोग ही कर सकते हैं। फिर भी कारोबार करने का जुनून गुरविंदर सिंह से नहीं उतरा। वो किसी की भी सुनने को राज़ी नहीं थे। युवा और जोशीले गुरविंदर सिंह को अपनी सूझ-बूझ और ताकत पर इतना भरोसा था कि उन्होंने कारोबार की दुनिया में ही अपने आप को पूरी तरह से समा और रमा लेने का मन बना लिया था। गुरविंदर सिंह के अपने फैसले पर अडिग होने पर सारे परिवारवाले उनसे नाराज़ हो गए। मान-मनुहार की गयी, बहलाने-फुसलाने की भी कोशिश हुई, ज़ज़्बाती होकर भविष्य के खतरे के बारे में चेताया गया, लेकिन गुरविंदर सिंह टस से मस नहीं हुए। जब सारी कोशिशें नाकाम हुईं तब परिवारवालों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। सभी गुरविंदर सिंह को टेढ़ी नज़रों से देखने लगे। अनबन इतनी बढ़ गयी कि घर के लोगों ने उनसे बात करना भी बंद कर दिया।

उन दिनों की यादें ताज़ा करते हुए गुरविंदर ने बताया, “घर पर मातम-सा छा गया था। सभी ने मेरा विरोध किया था। कोई भी मुझपर विश्वास करने को तैयार नहीं था। घरवालों को लगता था कि मैं बुरी संगत में पड़ गया हूँ, इसी वजह से बड़ी-बड़ी बातें करने लगा हूँ। वो दिन कुछ ऐसे ही थे कि हमारे घर में कोई कारोबार करने बारे में सोच भी नहीं सकता था।”

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गुरविंदर सिंह के पिता पंजाब नेशनल बैंक में काम करते थे और उनकी कमाई से ही घर-परिवार की ज़रूरतें पूरी होती थीं। माता-पिता की कुल छह संतानें थी और उनका नंबर तीसरा था। वे घर के बड़े बेटे थे और उनसे बड़ी दो बहनें थी। उनकी एक छोटी बहन और एक छोटा भाई भी है। पिता चाहते थे कि गुरविंदर सिंह भी उन्हीं की तरह पढ़ाई करें और अच्छी नौकरी पर लग जाएँ।

मध्यम-वर्गीय परिवार में जन्मे और पले-बढ़े गुरविंदर के मन में कारोबार करने का ख्याल आने के पीछे कुछ दिलचस्प घटनाएँ थीं। गुरविंदर सिंह जिस सीए फर्म में चार्टर्ड एकाउंटेंट बनने की तैयारी कर रहे थे, वहां उन्होंने कई बड़े कारोबारियों के बही-खाते देखे थे। लेखा-शास्त्र की बारीकियों को सीखने-समझने के दौरान गुरविंदर सिंह ने कई छोटे-बड़े कारोबारियों के बारे में जाना-समझा भी था। उन्होंने कई ऐसे लोगों को देखा था, जिन्होंने शून्य से अपना सफ़र शुरू किया था, लेकिन अपनी मेहनत से करोड़पति कारोबारी बने थे। संघर्ष से कामयाबी हासिल करने वाली शख्सियतों से अक्सर उनका मिलना-जुलना होता रहता था। गुरविंदर सिंह को यकीन हो गया था कि आम आदमी भी कारोबार कर सकता है। सीए फर्म में आने-जाने वाले बड़े-बड़े कारोबारियों से वे रू-ब-रू होते थे। इन कारोबारियों की चकाचौंध भरी ज़िंदगी ने गुरविंदर सिंह के मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ी थी। कारोबारियों के सूट-बूट, उनकी महंगी कारों का भी काफी असर उन पर पड़ा था। गुरविंदर को अहसास हो गया था कि वे अपने पिता की तरह नौकरी करते हुए महंगी कार, बड़ा बंगला नहीं हासिल कर सकते हैं। उन्हें लगा कि पिता की तरह नौकरी करते हुए उनकी भी ज़िंदगी सामान्य ही रह जाएगी और वे ज्यादा कुछ हासिल नहीं कर पायेंगे। कामयाब लोगों से परिचय ने गुरविंदर सिंह के मन में कारोबारी बनने के ख्याल को जन्म दिया था। मेहनत और संघर्ष के ज़रिए कामयाबी की बुलंदियों तक पहुँचने वाले लोगों के जीवंत उदहारण उनके सामने मौजूद थे। इन्हीं से प्रेरणा लेकर गुरविंदर सिंह ने भी कारोबारी बनने और खूब धन-दौलत और शोहरत कमाने के सपने देखने शुरू किये थे।

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कारोबार करते हुए बड़ा आदमी बनने के इन्हीं सपनों ने गुरविंदर सिंह के घरवालों की नींद उड़ा दी थी। परिवारवालों को लगता था कि कारोबार करने का जोखिम उनके जैसे मामूली लोग नहीं उठा सकते हैं, लेकिन गुरविंदर सिंह की ज़िद ऐसी थी कि किसी की नहीं चली। कारोबार करने के उनके जुनून के सामने सभी ने अपने घुटने टेक दिए। जब पिता को भी यकीन हो गया कि उनका बेटा अपनी ज़िद पूरी करने के बाद ही चैन की सांस लेगा, तब उन्होंने गुरविंदर की मदद करने का फैसला लिया।

गुरविंदर ने जब कारोबार करने की सोची तब उनके पास कोई पूंजी नहीं थी, इसी वजह से उन्होंने अपने पिता से मदद माँगी थी। पिता ने अपने बेटे के सपने को पूरा करने के लिए ज़मीन बेच दी। गुरविंदर सिंह ने बताया, “ मेरे पिता ने मेरे लिए प्लाट बेच दिया था। ये प्लाट ही उनकी सारी कमाई थी। प्लाट बेचने पर उन्हें 32 हज़ार रुपये मिले थे, जो उन्होंने मुझे दे दिए। इसी रकम से मैंने अपना कारोबार शुरू किया था।”

प्लाट बेचने से मिली रकम अपने बेटे को सौंपते हुए गुरविंदर सिंह ने पिता ने उन्हें एक सलाह दी थी। पिता की सलाह थी कि‘ ‘कारोबार ऐसा करो जिससे किसी की भी जान को खतरा न हो और किसी की ज़िंदगी पर बुरा असर न पड़े’।

पिता की इस सलाह को अमल में लाने के लिए गुरविंदर सिंह को काफी सोच-विचार करना पड़ा। काफी माथा-पच्ची के बाद उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का कारोबार करने का मन बनाया। उन दिनों मर्फी टीवी काफी लोकप्रिय था। ब्रांड काफी मशहूर था और उसके टीवी बाज़ार में खूब बिकते थे। गुरविंदर सिंह ने मर्फी के एक डीलर से करार किया और इस करार के तरत वे डीलर से टीवी खरीदकर लोगों में बेचने लगे। इस तरह से गुरविंदर सिंह ने अपने कारोबारी सफ़र की शुरुआत की थी। ये सफ़र काफी आगे बढ़ा और उन्होंने काफी तरक्की की। इस सफ़र की शुरुआत में घरवालों और बाहरवालों को विश्वास ही नहीं हुआ कि नौकरीपेशा और मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले युवा गुरविंदर सिंह ने न सिर्फ कारोबार करना शुरू किया है बल्कि मुनाफ़ा कमाना भी शुरू कर दिया है।

गुरविंदर सिंह बताते हैं,“कई लोग ऐसे भी थे जो बहुत ख़राब बातें करते थे। लोग कहते थे इतनी पढ़ाई करने के बाद देखो ये लड़का बल्ब और टीवी बेच रहा है। घरवालों को भी यकीन नहीं हुआ कि मुझे कारोबार से मुनाफ़ा होने लगा है, लेकिन जब दूसरे लोगों ने उन्हें बताया कि कारोबार चल पड़ा है और मैं मुनाफ़ा कमा रहा हूँ तब जाकर उन्हें मेरी कामयाबी पर यकीन हुआ।”

लोगों की हतोत्साहित करने वाली बातों से गुरविंदर सिंह पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा। बड़ा नाम और शोहरत कमाने की धुन उन पर कुछ इस तरह से सवार थी कि वे इन सब की परवाह किये बिना अपने सपनों को साकार करते चले गये।

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एलेक्ट्रोनिक वस्तुओं के कारोबार में अपने पाँव जमा लेने के बाद गुरविंदर सिंह का ध्यान शिक्षा क्षेत्र की ओर गया। उन्हें लगा कि शिक्षा-क्षेत्र में काम करते हुए वे समाज में बढ़िया नाम कमा सकते हैं और समाज की सेवा भी कर सकते हैं। उन दिनों लोग अपने बच्चों को या तो डाक्टर बनाना चाहते थे या फिर इंजीनियर। चूँकि मेडिकल कॉलेज कम थे और डाक्टरी की सीटें भी काफी कम थीं, कम ही विद्यार्थी डॉक्टर बनने के अपने सपने को पूरा कर पाते थे। इंजीनियरिंग कोर्स की सीटें ज्यादा थीं और उस समय पंजाब में सरकार निजी-क्षेत्र में भी इंजीनियरिंग कालेजों को बढ़ावा देने के पक्ष में थी। ऐसे हालात में गुरविंदर सिंह को लगा कि प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने से कई सारे बच्चों को फायदा होगा। उन्होंने फैसला कर लिया कि वे अपना खुद का इंजीनियरिंग कॉलेज खोलेंगे। इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने के इरादे के बारे में गुरविंदर सिंह ने जब अपने माता-पिता और दूसरे घरवालों को बताया तब उनका वही हाल हुआ जी पिछली बार हुआ था। घर में फिर से बवाल बच गया। पिता, भाई-बहन एक बार फिर से गुरविंदर सिंह का विरोध करने लगे। इस बार भी वही बातें कही जा रही थीं। गुरविंदर से लोग ये कह रहे थे कि इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने और चलाने का काम बड़े लोगों का है और हम जैसे छोटे लोग ये काम नहीं कर सकते हैं। परिवारवालों को लगा कि गुरविंदर ने कारोबार में कुछ रुपये क्या कमा लिए हैं कि उनके पाँव अब ज़मीन पर ही नहीं टिक रहे हैं।

पिछली बार की तरह ही इस बार भी गुरविंदर सिंह का इरादा पक्का था। इस बार भी वे अपने पिता को मदद करने के लिए मनाने में कामयाब हो गए। इस बार उनका साथ देने के लिए उनकी पत्नी के भाई निर्मल सिंह रयात भी आगे आये। निर्मल सिंह रयात यूनाइटेड किंगडम में रहते थे और उनकी दिली ख्वाहिश थी कि वे भारत में कुछ बड़ा और अच्छा काम करें। जब गुरविंदर सिंह ने उन्हें इंजीनियरिंग कॉलेज के अपने ख्याल के बारे में बताया तो उन्हें भी बहुत अच्छा लगा और वे तन-मन-धन से मदद करने को आगे आ गए।

इसके बावजूद राह आसान नहीं थी। कई सारी मुसीबतें थी, चुनौतियाँ थी। सरकारी नियमों के मुताबिक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने के लिए 25 एकड़ ज़मीन का होना ज़रूरी था। ज़मीन खरीदने के लिए भी गुरविंदर सिंह ने अपने पिता से मदद माँगी थी। एक बार फिर परिवार को ज़मीन बेचनी पड़ी। इंजीनियरिंग कॉलेज की ज़मीन खरीदने के लिए परिवार ने 35 एकड़ के खेत बेच दिए। गुरविंदर सिंह कहते हैं, “मैंने पहली बार कारोबार करने की सोची थी जब और इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करने का फैसला लिया था तब हालात लगभग एक जैसे ही थे। उस समय भी घरवालों ने विरोध किया था और इस बार भी विरोध हुआ था। उस बार भी ज़मीन बेची थी और इस बार भी ज़मीन बेचनी पड़ी थी।”

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25 एकड़ ज़मीन खरीद लेने से ही गुरविंदर सिंह की मुश्किलें दूर नहीं हुईं। चंडीगढ़ से कुछ दूर पंजाब के रोपड़ में इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करवाने के लिए उन्हें काफी मेहनत-मशक्कत करनी पड़ी। चूँकि उनके परिवार में शिक्षा के क्षेत्र में किसी ने कभी कोई काम नहीं किया था, फॅमिली की बैकग्राउंड भी तगड़ी नहीं थी, इंजीनियरिंग कॉलेज की परमिशन के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। बिल्डिंग बनवाने और इक्विपमेंट खरीदने के लिए बैंक से कर्ज़ लेना पड़ा। सारे नियमों और कायदों का पालन कर जब गुरविंदर सिंह ने कॉलेज के लिए परमिशन हासिल कर ली तब उनके सामने लोगों और विद्यार्थियों का विश्वास जीतने की चुनौती सामने आयी।

गुरविंदर सिंह बताते हैं, “हमें अपनी मेहनत और काबिलियत पर भरोसा था। हम बच्चों को अच्छी शिक्षा और सुविधायें भी देने को तैयार थें, लेकिन ये बात लोगों तक पहुंचाना और उनका विश्वास जीतना आसान नहीं था। हमने पहले कोई स्कूल या कॉलेज भी नहीं चलाया था, लेकिन जब हमने काम करना शुरू किया तो जी-जान लगाकर काम किया। कुछ ही दिनों में लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि हम अच्छा काम करते हैं।”

गुरविंदर सिंह को वे दिन आज भी अच्छी तरह से याद हैं जब वे खुद अपने हाथों से टिफ़िन बॉक्स ले जाकर इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों को देते थे। कॉलेज के शुरुआती दिनों में हॉस्टल नहीं बना था और विद्यार्थियों के रहने के लिए मकान किराये पर लिए गए थे। इन्हीं मकानों में विद्यार्थियों को भोजन देने के लिए खुद गुरविंदर सिंह टिफ़िन बॉक्स ले जाया करते थे।

गुरविंदर सिंह की इसी मेहनत और ईमानदारी की वजह से उनके कॉलेज की लोकप्रियता लगातार बढ़ती चली गयी। जैसे-जैसे लोकप्रियता बढ़ी वैसे-वैसे गुरविंदर सिंह का विश्वास बढ़ा और वे नए-नए कॉलेज खोलने की योजना बनाने लगे। एक के बाद एक करते हुए उन्होंने कई कॉलेज शुरू किये। आगे चलकर इन्हीं कालेजों के समूह ने विश्वविद्यालय को रूप इख्तियार कर लिया। गुरविंदर सिंह अब रयात-बाहरा विश्वविद्यालय के चांसलर हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनका काफी नाम है। वे काफी मशहूर हस्ती हैं। उनकी कामयाबी की कहानी एक बड़ी मिसाल के तौर पर दुनिया के लोगों के सामने प्रेरणा का स्रोत बनकर खड़ी है।

बड़ी बात ये भी है कि गुरविंदर सिंह ने इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी, मेडिकल साइंस, फार्मा, डेंटल साइंसेज़, टूरिज़्म, हॉस्पिटैलिटी, होटल मैनेजमेंट, बिज़नेस मैनेजमेंट जैसे कई क्षेत्रों में अपने शिक्षा संस्थान शुरू किये हैं। गुरविंदर सिंह ने उन्नत स्तरीय शिक्षा सुविधाओं से भरे इंटरनेशनल स्कूल भी बनवाये हैं।

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रयात-बाहरा विश्वविद्यालय के कॉलेज पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में फैले हुए हैं। गुरविंदर सिंह ने हिमाचल प्रदेश में भी एक विश्वविद्यालय खड़ा किया है। बाहरा विश्वविद्यालय के नाम से हिमाचल प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में भी गुरविंदर सिंह कई शिक्षा संस्थान चला रहे हैं। साल 2001 में 180 विद्यार्थियों के साथ इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करने वाले गुरविंदर सिंह के खड़े किये दो विश्वविद्यालयों में इन दिनों 30 हज़ार से ज्यादा विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। 2001 में 14 कर्मचारियों के साथ शिक्षा–क्षेत्र में अपने सफ़र की शुरुआत करने वाले गुरविंदर सिंह के साथ आज 6 हज़ार से ज्यादा कर्मचारियों का दल-बल है।

एक सवाल के जवाब में गुरविंदर सिंह ने कहा, “ मेरे लिए चुनौतियां अभी ख़त्म नहीं हुई हैं। मेरे लिए हर दिन एक नई चुनौती है। शिक्षा के क्षेत्र में लगातार बदलाव होते रहते हैं। दुनिया-भर में टेक्नोलॉजी लगातार डेवलप हो रही है। हमें भी समय के साथ टेक्नोलॉजी अपग्रेड करनी पड़ती है। समय के साथ चलना पड़ता है। ज़माने के साथ बदलना पड़ता है। दूसरे से आगे रहना एक बहुत बड़ी चुनौती है।” विश्वास भरी आवाज़ में गुरविंदर सिंह ने कहा, “जिस तरह से हम आगे बढ़े हैं, उससे ये तय है कि हम और भी आगे बढ़ेंगे। हमारा लक्ष्य रयात बाहरा विश्वविद्यालय को दुनिया की बेस्ट यूनिवर्सिटीज़ में एक बनाना है। हमारे पास अच्छे लोग हैं और हमें पूरा भरोसा है कि हम इस मकसद में कामयाब होंगे।”

कामयाबी की एक बड़ी कहानी के नायक बन चुके गुरविंदर सिंह ये कहने से भी नहीं चूके कि वे आज भी उतनी ही मेहनत करते हैं, जितनी वे इंजीनियरिंग कॉलेज की शुरुआत के समय किया करते थे। ईमानदारी और मेहनत की वजह से ही वे अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ पाएँ हैं। वे कहते हैं, “ मुझमें विश्वास की कमी कभी नहीं रही। मैंने अपनी ज़िंदगी में मेहनत की और मेहनत ही करता रहूँगा।” गुरविंदर सिंह को जानने वाले ये बताते हैं कि उनकी सबसे बड़ी खूबी अपनी काबिलियत और ताकत पर उनका विश्वास है। इसी विश्वास की वजह से वे बड़ी से बड़ी मुसीबत के वक़्त में भी नहीं घबराते हैं। जोखिम भी उठाते हैं तो काफी सोच-समझकर उठाते हैं। एक अच्छे उद्यमी के सारे गुण उनमें मौजूद हैं। जोखिम उठाने की अपनी आदतों के बारे में वे कहते हैं, “कहाँ जोखिम नहीं है? घर से बाहर निकलते ही रिस्क ही रिस्क है। आप बस में बैठते समय ये नहीं देखते कि ड्राइवर के पास लाइसेंस है या नहीं। आप ये नहीं जानते कि जिस बस पर आप सवार हुए हैं उसका ब्रेक सही तरह से काम कर रहा है या नहीं। रिस्क हर जगह है, लकिन ये ज़रूरी है कि आप जो जोखिम उठाना चाहते हैं, उसके बारे में सही तरह से आकलन कर लेना चाहिए, वरना चीज़ें बेकाबू हो जाती हैं।”

लोगों को सलाह देते हुए गुरविंदर सिंह कहते हैं, “ कारोबार शुरू करने के लिए रुपयों और डिग्री की ज़रुरत नहीं होती। पैसा बहुत बड़ी चीज़ नहीं हैं और ना ही क्वालिफिकेशन। बिज़नेस में पैसा अड़चन नहीं हो सकता। पैसे से जो लोग काम करते हैं वे लोग बिज़नेसमैन होते हैं और जो बिना पैसे के काम करते हैं वे बिज़नेसमाइंड होते हैं। मैं लोगों से यही कहूँगा कि वे भी बिज़नेसमाइंड बनें। बिज़नेस में कुछ भी नामुमकिन नहीं है। आम आदमी भी कारोबार कर सकता है।” गुरविंदर सिंह को जब कभी मौका मिलता हैं वे अपने विद्यार्थियों को उद्यमी बनने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करते हैं। दो विश्वविद्यालयों को स्थापित करने और उनका सफल संचालन करने वाले गुरविंदर सिंह ने पाँचवीं तक अपने गाँव पुर्खोवाल के सरकारी स्कूल में पढ़ाई की थी। पाँचवीं तक उन्होंने पंजाबी मीडियम में ही पढ़ाई की। पाँचवीं के बाद उनका दाख़िला गढ़शंकर के सरकरी हाई स्कूल में करवा दिया गया था। यहीं से उन्होंने अंग्रेज़ी सीखनी शुरू की। ग्यारहवीं तक उन्होंने इसी सरकारी स्कूल में शिक्षा ली और फिर वे आगे की पढ़ाई के लिए राधे कृष्णा आर्य हाई स्कूल गए। बीकॉम की पढ़ाई उन्होंने नवां शहर से की। बीकॉम की डिग्री लेने के बाद ही गुरविंदर सिंह ने चार्टर्ड एकाउंटेंट बनने की तैयारी शुरू की और इसी तैयारी में उन्होंने एक सीए फर्म के लिए काम करना शुरू किया था। इस फर्म के दफ्तर लुधियाना और चंडीगढ़ में थे। इन्हीं दफ्तरों में देखने-समझने को मिलीं कामयाब कारोबारियों की कहानियों से प्रेरणा लेकर गुरविंदर सिंह उद्यमी और कारोबारी बने थे। 

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