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आंसू निकाले कभी प्याज दर, कभी ब्याज दर

किसान चाहते हैं कि प्याज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करने की बरसों पुरानी मांग पूरी करने के साथ ही प्याज की भंडारण सुविधाओं में इजाफा हो...

जय प्रकाश जय
7th Jun 2017
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अब किसान को कौन समझाए कि प्याज भी कोई बिकने वाली उपज है, उसमें छिलके के सिवा और होता क्या है! वह लोगों को खाने में लाजवाब, लिज्जतदार लगती है तो उसमें खाने वाले का क्या दोष! प्याज दर और ब्याज दर में अंतर की वजहें अलग-अलग होती हैं किसान प्यारे, जरा मसले की नजाकत भी समझना सीखो। लेकिन वह तो गांव-गंवार मानुस ठहरा, कहता है, हर बात में प्याज दर पर बौछारें, जैसे मुफ्त में उग आती हो, और मुफ्त में बिके...

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फोटो साभार: http:kisanhelp.ina12bc34de56fgmedium"/>

बाजार में सब कुछ बिकता है। किसान चाहता है उसका अन्न भी जायज दाम पर बिके। जैसे सरकारें अन्यों को सरकारी कोष से सहूलियतें बांटती हैं, उन्हें भी बांटें। वह एक सवाल बार-बार पूछता है, कारखाने से जो आता है, उसका रेट मनमाना क्यों होता है और खेत-खलिहानों से जो आता है, उसे हर कोई मुफ्त का माल क्यों समझता है?

कमजोर को कभी मौसम मारे, कभी अभाव। सरकार क्या करे, मौसम को कौन रोके भला। जब हम नहीं सोचना चाहते तो सरकार क्यों सोचे? सचमुच हम कितने संवेदनशून्य, आत्मजीवी हो चुके हैं?

मौसम की मार, बार-बार, कभी गर्मी मार जाए हजार-दो-हजार लोगों को, कभी सर्दी उठा ले जाए, कभी बाढ़-बारिश बहा ले जाए घर-गृहस्थी समेत, कभी हादसे में सामूहिक मौतें, कभी गोलियों की बौछार, शवों का हिसाब-किताब, मुआवजे की चीख-पुकार, आश्रितों के निवाले दरकार, जीवन के दर्द से दोहरे हो रहे लोग। गरमी कम हो जायेगी, लोगों का मरना थम जायेगा, फिर बरसात से मौतें, कहीं बाढ़, कहीं सूखा। फिर मुआवज़े की चीख-पुकार। फिर सर्दी आयेगी और ठंड से मौतें। कमजोर को कभी मौसम मारे, कभी अभाव। सरकार क्या करे, मौसम को कौन रोके भला। जब हम नहीं सोचना चाहते तो सरकार क्यों सोचे? सचमुच हम कितने संवेदनशून्य, आत्मजीवी हो चुके हैं। सवारियों से लदी-फदी पूरी की पूरी बस अक्सर उत्तराखंड, हिमाचल की घाटियों में समा जाती है। मुआवजे का शोर मचता है। मध्य प्रदेश के किसानों पर गोली चली है, किसने चलाई है, सरकारी एजेंसियों को नहीं पता। किसान क्यों मारे जाते हैं, उन्हें तो प्रकृति और जीवन के अभाव वैसे ही मारते रहते हैं।

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हरियाणा हो या उत्तर प्रदेश, सवाल ये भी है कि किसान आंदोलन अक्सर हिंसक क्यों हो जाते हैं। उनके आंदोलनों को सही दिशा में ले जाने की बजाए उकसाने वाले कोई और नहीं, यही सफेदपोश होते हैं, नेताओं के बाने में और उन्हें पहुंचा देते हैं मौत के दहाने तक। क्योंकि किसान जन्मना स्वभाव से सीधे होते हैं। मिट्टी और दाने से उनका जनम का रिश्ता होता है। इसीलिए उन्हें अन्नदाता भी कहा जाता है।

जब कोई अन्नदाता गोली से मरता है, उसका परिवार अनाथ होता है, उसकी मौत पर सियासत की रोटियां सेंकना कितनी बेशर्मी की बात होती है, इस मार्मिक सवाल का उत्तर वही जाने, जो किसान का बेटा हो या गांव-घर में जिसकी पैदाइश रही हो। जन्मना सहज-सीधे होने के नाते किसान को कोई भी फुसला लेता है।

बाजार में सब कुछ बिकता है। किसान चाहता है उसका अन्न भी जायज दाम पर बिके। जैसे सरकारें अन्यों को सरकारी कोष से सहूलियतें बांटती हैं, उन्हें भी बांटें। वह एक सवाल बार पूछता है, कारखाने से जो आता है, उसका रेट मनमाना क्यों होता है और खेत-खलिहानों से जो आता है, उसे हर कोई मुफ्त का माल क्यों समझता है। अब उसे कौन समझाए कि प्याज भी कोई बिकने वाली उपज है, उसमें छिलके के सिवा और होता क्या है। अब वह लोगों को खाने में लाजवाब लगती है तो उसमें खाने वाले का क्या दोष। प्याज दर और ब्याज दर में अंतर की वजहें अलग-अलग होती हैं। हर बात में प्याज दर पर बौछारें। जैसे मुफ्त में उग आती हो तो मुफ्त में बिके।

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अब देखिए न, पिछले दिनो उसी मध्य प्रदेश से प्याज दर पर चौंकाने वाली खबर मिली, जहां कल किसान मारे गए, कि थोक मंडी में अपनी उपज का सही मोल नहीं मिलने पर एक युवा किसान ने गुस्से में प्याज की खड़ी फसल को खेत में ही नष्ट करा दिया। बाद में इसे भेड़ों के रेवड़ को चरवा दिया। खेती की लागत निकलना तो दूर, उसे प्याज की बुआई से प्रति बीघा करीब 20,000 रुपये का नुकसान हो गया था। थोक मंडी में उसे प्याज का 2.5 रुपये प्रति किलोग्राम मिल रहा था। वह अपनी फसल को गांव से शहर की मंडी लाकर इस कीमत पर बेचता तो प्रति बीघा करीब 15,000 रुपये का उसका अतिरिक्त नुकसान हो जाता, क्योंकि प्याज को खेत से निकलवाने, छंटवाने, बोरों में भरवाकर पैक कराने, माल ढुलाई और परिवहन का खर्च भी भुगतना पड़ता न उसे! किसान चाहते हैं कि प्याज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करने की बरसों पुरानी मांग पूरी करने के साथ ही प्याज की भंडारण सुविधाओं में इजाफा हो।

रही ब्याज दर की बात तो, रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल की अगुवाई वाली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक में आज रुख साफ होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि बैंकिंग प्रणाली में 60 अरब डॉलर से भी अधिक की अधिशेष नकदी को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय बैंक द्वारा नीतिगत ब्याज दर में किसी तरह का बदलाव अपेक्षित नहीं है। मुद्रास्फीति के रुख और बाजार में पर्याप्त तरलता की स्थिति को देखते हुए इस बात की संभावना कम है कि ब्याज दरों में कटौती होगी।

गौर फरमाने पर कहीं न कहीं ब्याज दर की एक संगत-असंगत प्याज दर के भी आसपास जा बैठती है। वित्तमंत्री अरुण जेटली भी कहते हैं कि रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दर में कटौती की गुंजाइश बनी है। सरकार ने प्याज और आलू को एपीएमसी सूची से हटाकर प्याज निर्यात को कम करने के लिए इसका न्यूनतम निर्यात मूल्य तय कर दिया है। प्याज के निर्यात को हतोत्साहित कर घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाने के लिए इस पर न्यूनतम निर्यात मूल्य 300 डॉलर प्रति टन लगाया गया है।

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