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दिव्या और हर्षा ने किया फुटवेयर डिज़ाइन में नया कमाल

11th Jul 2015
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आज जब फुटवेयर के बाजार में कई बड़े ब्रांड पैर जमा चुके हों तो देसी चप्पलों को कौन पूछता है। नहीं जनाब ऐसा नहीं है आज भी कोल्हापुरी चप्पल और दूसरी तरह के देसी फुटवेयर की खूब डिमांड है। इसी बात को देखते और समझते हुए दो महिला दोस्तों ने इस क्षेत्र में कदम रखने का फैसला लिया। दिव्या और हर्षा ने चेन्नई के एक कॉलेज से बीकॉम ग्रेजुएशन की पढ़ाई की और अपनी पढ़ाई का इस्तेमाल अपने कारोबार में किया। पढ़ाई के दौरान ही दोनों ने तय कर लिया था कि वो फुटवेयर डिजाइन के क्षेत्र में कुछ काम करेंगे।

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कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होने एक मोची ढूंढा। जिसकी मदद से इन्होने फुटवेयर डिज़ाइन के क्षेत्र में अपना कदम रखा और अपने काम को नाम दिया MINK । इससे पहले कॉलेज के दिनों में ये लोग अपने दोस्तों के सेडिंल को डिज़ाइन करते थे। 2010 में जब इन लोगों ने अपने काम की शुरूआत की तो दोनों को फुटवेयर का काफी शौक था। दिव्या को फुटवेयर में जहां स्टाइल पसंद था वहीं हर्षा को आरामदायक चीज़े चाहिए होती थी। बस यहीं इन्होंने फैसला लिया कि ये दोनों इस क्षेत्र में कुछ रचनात्मक काम करेंगे। दिव्या अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि जब वो कॉलेज के दिनों में बोर होते थे तो अपने सर पर लगी क्लिप को निकाल कर अपनी चप्पलों में लगाते थे ये देखने के लिए कि वो उन पर कैसी दिखती है।

दिव्या और हर्षा का दावा है कि वो दोनों अकस्मात ही उद्यमी बने। क्योंकि उन दोनों ने वही किया जो उनको अच्छा लगा। जब इन्होने अपने विचारों के साथ खेलाना शुरू किया तो ये देखने की कोशिश की कि बाजार किस तरह कि प्रतिक्रियाएं देता है। ये लोग सिर्फ अपने ग्राहकों को अच्छी सेवाएं देने की कोशिश करते थे। हालांकि शुरूआत में इन दोनों के लिए ग्राहकों की तलाश करना मुश्किल था बावजूद इसके कि ये दोनों कॉलेज में काफी प्रसिद्ध भी थे। इसलिए इन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया। दिव्या के मुताबिक जब उन्होने अपने घरवालों को फुटवेयर डिज़ाइन के बारे में में जानकारी दी तो उन्होने इस काम को बकवास बताया लेकिन जैसे जैसे MINK का कारोबार बढ़ता गया वैसे वैसे दोनों के घरवाले ना सिर्फ खुश हुए बल्कि उनको गर्व भी होने लगा।

दिव्या का मानना है कि उद्यमी बनना कोई खेल नहीं है। बहुत सारे लोग खासतौर से बड़े ग्राहक या उत्पादक आपको गंभीरता से नहीं लेते। बावजूद इसके कि आप पैसा लगाने को तैयार हों लेकिन कोई भी उत्पादक कुछ नया करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। विशेषकर युवा उद्यमियों के साथ ऐसा ज्यादा देखने को मिलता है। दिव्या का कहना है कि उत्पादक ज्यादा बदलाव के पक्ष में नहीं होते हैं लेकिन उनको उम्मीद है कि बड़े उत्पादक और ग्राहक युवा उद्यमियों को गंभीरता से लेंगे।

उद्यमियता के क्षेत्र में दिव्या का मानना है कि महिलाएं पुरूषों से कहीं कम नहीं हैं। महिलाएं भी रचनात्मक काम कर सकती है। उनका कहना है कि पुरूष व्यावहारिकता के साथ चिपके रहते हैं, जबकि महिलाओं के साथ ऐसा नहीं है। उनके पास अगर कोई आइडिया होता है भले ही वो अव्यवहारिक लगता हो, लेकिन उसको करने की कोशिश जरूर करती हैं। उनका कहना है कि ज्यादा से ज्यादा महिलाएं उनको देख कर इस क्षेत्र में कदम रख सकती हैं।

दिव्या और हर्षा अपने काम के साथ साथ अभी और पढ़ना चाहती है। वो चाहती है कि अब वो एमबीए करें। लेकिन उनका सारा समय MINK के कारोबार को फैलाने में निकल जाता है। दिव्या का कहना है कि कोई भी कारोबार काफी वक्त मांगता है। इसलिए सफल उद्यमी बनने के लिए अपने काम को वक्त देना बहुत जरूरी है इसके अलावा कई लोग अपना उद्यम शुरू करने के बाद ज्यादा पढ़ाई करने के लिए अपने पांव पीछे खींच लेते हैं, जो गलत है क्योंकि जब कोई दोबारा अपने क्षेत्र में प्रवेश करता है तो बाजार उसे भुला देता है। दिव्या के मुताबिक कोई उद्यम काफी तनावपूर्ण होता है क्योंकि हर कोई आपसे उम्मीद करता है कि आप उसे कुछ नया पेश करोगे।

मूल -नीनू मुथु

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