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विकास से कोसों दूर एक गांव की अनपढ़ महिलाओं का स्टार्टअप, बढ़ाई शहरों की मिठास

Sachin Sharma
17th Feb 2016
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पहाड़ियों से घिरे कालाकुंड गांव को महिलाओं ने कर दिया अपनी मेहनत से प्रसिद्ध...

गरीब महिलाओं ने मिठाई कलाकंद को बना दिया ब्रांड...


ज़िंदगी में ज़रूरी है कुछ कर गुज़रने की चाहत। अगर यह विचार मन में है तो फिर दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती। ऐसे में बरसों से बंधी बेड़ियों को तोडने में भी देर नहीं लगती। यही हुआ इंदौर के पास पहाड़ियों से घिरे कालाकुंड गांव में। इस गांव के मर्दों ने भी साधनों के अभाव में हथियार डाल दिये थे वहां महिलाओं नें एक मिसाल कायम कर दी। मजबूरी में शुरु किये गये रोजगार को शहरों तक पहुंचाकर ब्रांड बना दिया। आज इंदौर के पास कालाकुंड गांव अपनी खूबसूरती से ज्यादा वहां के कलाकंद की वजह से प्रसिद्ध हो चुका है। जिसको बनाने से लेकर बेचने तक की सारी कमान महिलाओं के हाथ में है।

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सिर्फ 175 लोगों की आबादी वाला गांव है कालाकुंड। इस गांव में पहुंचने के लिये एक ही साधन है, मीटर गेज ट्रेन। इंदौर से 53 किलोमीटर दूर इस गांव तक पहुंचने के लिए ट्रेन का सफर आंखों और मन को बहुत ही सुकून देने वाला है। धुंआ छोड़ता डीजल इंजन, अंग्रेजों की बनाई हुई सुरंगों में से गुजरती छुक-छुक करती रेलगाड़ी। छोटे से सफर में बरसात के दिनों में ट्रेन के एक और पहाड़ से गिरते 40 से ज्यादा झरने तो दूसरी तरफ कल-कल बहती चोरल नदी। ट्रेन से कालाकुंड पहुंचते ही यहां की प्राकृतिक खूबसूरती में आप खो जाते हैं। छोटे से स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही प्लेटफॉर्म पर दो-तीन हाथ ठेले में पलास के पत्तों के ऊपर सफेद रंग की खानें की चीज बेचते दिख जाते हैं। यही हैं यहां के गिने चुने रोजगार में से एक कालाकुंड का प्रसिद्ध कलाकंद।

मिठाई काी बॉक्स पैकिंग

मिठाई काी बॉक्स पैकिंग


कालाकुंड में आजीविका के नाम पर अगर कुछ है तो लकड़ी काटकर बेचना और कुछ दुधारु पशु। दूध बाहर भेजने के लिये ट्रेन पर ही निर्भर रहना पड़ता था। तो गांव के पशुपालक परिवारों ने दूध का कलाकंद बनाकर स्टेशन पर बेचना शुरु किया। कई पीढ़ियों से कलाकंद बनाकर स्टेशन पर बेचना जारी है। चुनिंदा ट्रेन गुजरने की वजह से ये रोजगार भी सिर्फ पेट भरने तक ही सीमित रहा। इनके कलाकंद की कीमत जो मिलती थी वो महज मजदूरी से ज्यादा कुछ नहीं थी। मगर पिछले दो साल में जो हुआ वो चौंकानें वाला था। गले तक घूंघट करके झाड़ू बुहारी और घर का चूल्हा चौका करने वाली गांव की कुछ महिलाओं ने अपने मर्दों के पुश्तैनी व्यवसाय की कमान को अपने हाथों में ले लिया। 10 महिलाओं का समूह बनाया गया और इसे संगठित व्यवसाय की शक्ल दे दी गई। गांव की महिलाओं ने कालाकुंड के कलाकंद को एक ब्रांड बनाया। अच्छी पैकेजिंग की, पलास के पत्तों की जगह सुंदर से बॉक्स ने ले ली। महिला समूह ने अब ये बॉक्स बंद कलाकंद इंदौर खंडवा रोड के कुछ खास ढाबों और होटलों पर बिक्री के लिये रखा। महिला समूह जितना भी कलाकंद बनाता सब हाथों हाथ बिक जाता।

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महिलाओं को ये राह दिखाई इलाके में जल संग्रहण का काम कर रही एक संस्था नागरथ चेरीटेबल ट्रस्ट ने। ट्रस्ट के प्रोजेक्ट प्रभारी सुरेश एमजी ने जब कलाकंद का स्वाद चखा तो महिलाओं को सलाह दी कि वे अपने इस हुनर को बडे व्यवसाय में तब्दील करें। ट्रस्ट की मदद के बाद जब महिलाओं का व्यवसाय चलने लगा और डिमांड बढनें लगी तो इंदौर जिला प्रशासन महिलाओं की मदद के लिये इस व्यवसाय को आगे बढाने की रुपरेखा तैयार की। समूह को तत्काल डेढ लाख रुपये का लोन दिया गया। लोन की रकम हाथ आते ही मानों समूह की उडान को पंख लग गये। कलाकंद बनानें के लिये बडे बर्तन, रसोई गैस आ गई। पैकेजिंग मटेरियल में सुधार होने लगी। विज्ञापन और प्रचार के लिये बडे-बडे होर्डिंग लग गये। अब महिलाएं आसपास के इलाके से भी अच्छी गुणवत्ता का दूध खरीदनें लगीं। जिला प्रशासन नें महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिये गाय, भैंस दीं। जिससे वो खुद दूध का उत्पादन करने लगीं। अब पहाडों के बीच छोटे से स्टेशन पर बिकने वाला कलाकंद हाईवे पर आ चुका था। महिलाओं की बढ़ती रुचि को देखते हुऐ जिला प्रशासन ने हाईवे पर दो साल में एक के बाद एक तीन स्टोर खोल दिये। जहां यात्री बस रुकवाकर कलाकंद खरीदते हैं। इन स्टोर्स को पहले तो महिलाऐं चलाती थीं। मगर व्यवसाय बढने पर समूह ने यहां कर्मचारी नियुक्त कर दिये गये। हाल ही में इंदौर के दो प्रसिद्ध पुराने मंदिर खजराना गणेश और रणजीत हनुमान पर कलाकंद स्टोर्स खोले जा चुके हैं।

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समूह की अध्यक्षा प्रवीणा दुबे और सचिव लीलाबाई ने बताया, 

"हमें तो एक समय यकीन करना ही मुश्किल हो रहा था कि गांव का कलाकंद चौरल के मुख्य मार्ग की दुकान पर बिक रहा है। मगर आज जब इंदौर जाकर हमारे स्टोर पर लोगों को कलाकंद खरीदते देखते हैं तो खुशी की कोई सीमा नहीं रहती।" 

नागरथ चेरीटेबल ट्रस्ट के प्रोजेक्ट प्रभारी सुरेश एमजी का कहना है, 

"महिलाओं की मेहनत और मेहनत के बाद उनके प्रोडक्ट का स्वाद देखकर अचरज हुआ, मगर दुख इस बात का था कि स्टेशन पर इनके स्वाद का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा था। तब हमनें अपनें प्रोजेक्ट से समय निकालकर महिलाओं को उत्पाद का निर्माण, पैकेजिंग और मार्केटिंग के लिये ट्रेंड करना शुरु किया। जिला प्रशासन भी रुचि लेकर महिलाओं के लिये काम करता रहा। अब रिजल्ट सबके सामनें है।"

समूह के स्वादिष्ट मिठाई की मांग देखते हुऐ अभी और उत्पादन बढाने की तैयारी चल रही है। एक क्विंटल मिठाई हर दिन बनकर यहां से अलग-अलग स्टोर्स पर बेची जा रही है। डिमांड लगातार बनी हुई है। समूह की योजना है कि कुछ और महिलाओं के साथ गांव के बेरोजगार पुरुषों को इस व्यवसाय से जोडकर उत्पादन कई गुना बढाया जाये। इंदौर कलेक्टर पी. नरहरी ने बताया कि महिलाओं के कुछ करने की लगन को देखकर हमनें इन्हें आगे बढाने का बीडा उठाया है। अगर उस वक्त कुछ नहीं किया जाता तो इनके सपने मर जाते। आज इलाके की पहचान दूर-दूर तक होने लगी है। हम लगातार इनके स्टोर्स बढाते जा रहा हैं। ये एक सफल मॉडल बना है, जिसकी अब मिसाल दी जानें लगी है।


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