धन्नो कैसे बन गई कथक क्वीन!

By जय प्रकाश जय
November 08, 2017, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:15:18 GMT+0000
धन्नो कैसे बन गई कथक क्वीन!
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कबीर चौरा, वाराणसी की रहने वाली सितारा देवी कथक नर्तक पं. सुखदेव महाराज की सबसे छोटी बेटी बचपन में 'धन्नो' के नाम से जानी जाती थीं। 

कैटरीना कैफ के साथ सितारा देवी

कैटरीना कैफ के साथ सितारा देवी


बताते हैं कि जिन दिनो उनके पिता उनको कथक नृत्य सिखाते थे, उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया था। धन्नो को लोग प्रॉस्टिट्यूट कहने लगे। 

उस जमाने में कोई भी यह नहीं सोचता था कि एक शरीफ़ घराने की लड़की नाच-गाना सीखे। धार्मिक और परंपरावादी ब्राह्मण परिवार में सितारा देवी के पिता और दादा-परदादा सभी संगीतकार हुआ करते थे, लेकिन परिवार में लड़कियों को नृत्य और संगीत की शिक्षा देने की परंपरा नहीं थी। 

शांति निकेतन (कोलकाता) में मात्र सोलह साल की उम्र में अपना नृत्य प्रस्तुत कर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से 'कथक क्वीन' की उपाधि पाने वाली पद्मश्री सितारा देवी का आज ही के दिन (8 नवम्बर को) जन्म हुआ था। यह उनकी 97वीं जयंती है। सितारा देवी देश की ऐसी ख्यात नृत्यांगना रही हैं, जो आजीवन संघर्ष करते हुए शीर्ष तक पहुंचीं। उन्होंने मुंबई में लगातार साढ़े 11 घंटे तक डांस करते रहने का रिकॉर्ड बनाया। उन्हें 1970 में 'पद्मश्री', 1987 में 'संगीत नाटक अकादमी सम्मान', 1991 में 'शिखर सम्मान' और 1994 में 'राष्ट्रीय कालिदास सम्मान' से समादृत किया गया था। भारतीय सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्रियों मधुबाला, रेखा, माला सिन्हा और काजोल आदि ने सितारा देवी से ही कथक नृत्य की शिक्षा ली थी।

वर्ष 1935 में फिल्म 'वसंत सेना' से उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। उन्होंने एक दर्जन से अधिक फिल्मों में काम किया। कबीर चौरा, वाराणसी की रहने वाली सितारा देवी कथक नर्तक पं. सुखदेव महाराज की सबसे छोटी बेटी 'धन्नो' के नाम से बचपन में जानी जाती थीं। जब मात्र तेरह वर्ष की उम्र में वह अपने शहर काशी से मुंबई की दुनिया में शूटिंग के लिए रवाना हुईं, मोहल्ले के लोग उनको स्टेशन तक छोड़ने गए।

बताते हैं कि जिन दिनो उनके पिता उनको कथक नृत्य सिखाते थे, उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया था। धन्नो को लोग प्रॉस्टिट्यूट कहने लगे। आचार्य सुखदेव ने बहिष्कार के बाद बेटी को आगे बढ़ाने का मकसद नहीं छोड़ा, बल्कि घर ही बदल दिया था। यहां आकर उन्होंने एक डांसिंग स्कूल शुरू किया, जहां वारांगनाओं के बच्चों को वह पढ़ाने लगे। दीपावली की पूर्वसंध्या पर 'कलकत्ता' (कोलकाता) में जन्म लेने के कारण सितारा देवी का घर का नाम 'धनलक्ष्मी' पड़ा था।

बाद में लोग उनको धन्नो कहने लगे। बाल्यकाल में वह माता-पिता के प्यार से वंचित हो गईं। मुँह टेढ़ा होने के कारण अभिभावकों ने उन्हें दाई को सौंप दिया। उसी ने आठ साल तक उनका पालन-पोषण किया। उस समय की परम्परा के अनुसार सितारा देवी आठ वर्ष की आयु में ही उनका विवाह कर दिया गया था। उनके ससुराल वाले चाहते थे कि वह घरबार संभालें। उन्होंने स्कूल जाने की जिद ठान ली। इससे उनका विवाह टूट गया। उन्हें स्कूल में दाखिला दिला दिया गया। वहां नृत्य प्रदर्शन से उनकी प्रतिभा का आदर होने लगा।

उस जमाने में कोई भी यह नहीं सोचता था कि एक शरीफ़ घराने की लड़की नाच-गाना सीखे। धार्मिक और परंपरावादी ब्राह्मण परिवार में सितारा देवी के पिता और दादा-परदादा सभी संगीतकार हुआ करते थे, लेकिन परिवार में लड़कियों को नृत्य और संगीत की शिक्षा देने की परंपरा नहीं थी। सितारा देवी के पिता आचार्य सुखदेव ने यह क्रांतिकारी कदम उठाया और पहली बार परिवार की परंपरा को तोड़ा। सुखदेव जी नृत्य कला के साथ-साथ गायन से भी ज़ुडे हुए थे। वे नृत्य नाटिकाएँ लिखा करते थे।

उन्हें हमेशा एक ही परेशानी होती थी कि नृत्य किससे करवाएँ, क्योंकि इस तरह के नृत्य उस समय पुरुष ही करते थे। इसलिए अपनी नृत्य नाटिकाओं में वास्तविकता लाने के लिए उन्होंने घर की बेटियों को नृत्य सिखाना शुरू किया। उनके इस फैसले पर पूरे परिवार ने कड़ा विरोध प्रदर्शित किया था, किंतु वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। इस तरह सितारा देवी और उनकी बहनें अलकनंदा, तारा और उनका भाई भी नृत्य सीख गए थे।

दिलीप कुमार के साथ सितारा देवी

दिलीप कुमार के साथ सितारा देवी


सितारा देवी ने भी पिता की तरह जीवन भर अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया। जब भी मान को ठेस लगी, उसका बेबाक जवाब दिया। देर से पद्म अलंकरण देने से खफा होकर वर्ष 2003 में उन्होंने पद्मविभूषण ठुकरा दिया था। उन्होंने दो शादियां की थीं। पहली शादी उन्होंने फिल्म मुगले आजम के निर्देशक आसिफ से की लेकिन यह रिश्ता कम ही समय में टूट गया और उन्होंने तलाक ले लिया। दूसरी शादी उन्होंने 'डॉन' फिल्म के निर्माता कमल बरोट के भाई प्रताप बरोट से की। प्रताप के साथ मुंबई के नेपेंसी रोड इलाके में घर बसाने के बाद उन्होंने एक पुत्र रंजीत बरोट को जन्म दिया। बहू माया और पोती मल्लिका बरोट भी उनके साथ ही रहते थे।

उनकी बहनों में सबसे बड़ी अलकनंदा और उनके बाद तारा देवी भी उस दौर की मशहूर नृत्यांगनाओं में शुमार थीं। उनके दोनों भाई दुर्गा प्रसाद मिश्र और चतुर्भुज मिश्र भी नृत्य साधना से जुड़े रहे। सितारा देवी ने देश-विदेश में अपने नृत्य प्रदर्शनों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। उन्होंने लंदन में प्रतिष्ठित 'रॉयल अल्बर्ट' और 'विक्टोरिया हॉल' तथा न्यूयार्क के 'कार्नेगी हॉल' में अपने नृत्य का जादू बिखेरा। वह न सिर्फ़ कथक, बल्कि भरतनाट्यम सहित कई भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों और लोक नृत्यों में पारंगत थीं। उन्होंने रूसी बैले और पश्चिम के कुछ और नृत्य भी सीख लिए थे।

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