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MBBS की पढ़ाई बीच में छोड़कर पर्यावरण के डॉक्टर बन कई जन-आन्दोलनों के प्रणेता बने पुरुषोत्तम रेड्डी

प्रयोगात्मक और व्यावहारिक सुझावों से की है आंदोलकारियों की मदद ... इन दिनों पर्यावरण-संरक्षण के लिए युवाओं की फौज बनाने में जुटे हैं पुरुषोत्तम रेड्डी ...  

8th May 2016
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घटना 1996 की है। अविभाजित आँध्रप्रदेश के नलगोंडा जिले के एक गाँव में किसानों की बैठक चल रही थी। किसान और दूसरे गाँववाले फ्लोरोसिस की समस्या से निजात पाने के उपाय ढूँढ़ने में जुटे थे। उन दिनों नलगोंडा जिले के कई गाँवों में फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा होने की वजह से पानी पीने लायक नहीं रह गया था। एक मायने में पानी ज़हर बन गया था। चूँकि लोगों के पास पानी को पाने का कोई और ज़रिया नहीं था, वे यही पानी पीने पर मजबूर थे। नतीजा ये हुआ कि नलगोंडा जिले में कई लोग फ्लोरोसिस का शिकार हो गए। फ्लोरोसिस ने कइयों को अपनी चपेट में ले लिया था। क्या बच्चे, क्या बूढ़े ,कई युवा और महिलाएं भी इससे ग्रस्त थे । पीडितों के दांत पीले पड़ गए। हाथों और पैरों की हड्डियाँ मुड़ गयीं और वे विकलांग हो गए। कई लोगों को जोड़ों का दर्द इतना सताने लगा कि वे कोई काम करने के लायक ही नहीं रहे। फ्लोराइड युक्त पानी पीने की वजह से हज़ारों लोग हड्डियों, मांसपेशियों, कलेजे और पेट से जुडी तरह-तरह की बीमारियों का शिकार हो गए थे। गर्भवती महिलाओं पर भी इस बीमारी का काफी बुरा असर पड़ा। दूषित पानी पीने की वजह से कई महिलाओं का गर्भपात हो गया। सिंचाई के लिए उपयुक्त पानी न मिलने की वजह से लाखों एकड़ भूमि भी बेकार पड़ गयी थी।

फ्लोरोसिस से ग्रसित मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी। लोगों में दहशत थी, अजीब-सा डर उन्हें सताने लगा था। राज्य सरकार से कई बार गुहार लगाए जाने के बावजूद कोई मदद नहीं मिली थी। ज़िला प्रसाशन मौन था। लगभग सारा नलगोंडा ज़िला सरकारी उपेक्षा का शिकार था। जिले में कई लोग विकलांग हो रहे थे तो कई नपुंसक। सरकार, गांववाले, अधिकारी सभी समस्या के बारे में जानते थे। समस्या का समाधान भी जानते थे। समाधान बस इतना था कि इन गाँवों में पीने के लिए सुरक्षित पानी मुहैया कराया जाये, लेकिन राज्य सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाये। गांववालों ने सरकार पर दबाव डालने के मकसद से कई आंदोलन भी किये । इन आंदोलनों का सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा। सरकार अनदेखी करती रही।

अब किसानों और दूसरे गांववालों ने ठान ली थी कि सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया जाएगा। इस बड़े आंदोलन की रूप-रेखा तय करने के मकसद से ही गाँव में बैठक बुलाई गयी । इस बैठक में किसानों की मदद के लिए राजनीति-विज्ञान के एक प्रचण्ड विद्वान् भी पहुंचे हुए थे। बैठक में अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग राय दी। इतना तय था कि सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया जाएगा। कैसे और कब - इस पर फैसला होना बाकी था। ज्यादातर किसान प्रभावित लोगों को भारी संख्या में जुटाकर धरना-प्रदर्शन करने के पक्ष में थे।

लेकिन, बैठक में एक शख्स की सोच कुछ अलग थी। इनका नजरिया कुछ और था। बैठक में मौजूद राजनीति-विज्ञान के इस विद्वान ने किसानों को एक ऐसी सलाह दी जिसे सुनकर सारे आश्चर्यचकित हो गए। उन्हें इस तरह के आंदोलन का एहसास और आभास भी नहीं था।राजनीति-विज्ञान के इस विद्वान ने किसानों को बताया कि लोकसभा भंग की जा चुकी है। चुनाव फिर होने वाले हैं। ऐसी स्थिति में सिर्फ राज्य ही नहीं बल्कि पूरे देश का ध्यान नलगोंडा जिले की समस्या की ओर आकर्षित करने का एक बढ़िया उपाय उनके पास है। विद्वान ने सुझाव दिया कि इस बार नलगोंडा लोकसभा सीट के लिए होने वाले चुनाव में फ्लोरोसिस से प्रभावित कई सारे किसान चुनाव लड़ेंगे। ज्यादा से ज्यादा लोगों के चुनाव लड़ने पर खबर देश-भर में फैलेगी।

किसानों ने विद्वान की सलाह मान ली। कई नामांकन डाले गए। नामांकन-पत्रों की जांच के बाद 540 नामांकन सही पाये गए। ये 1996 के लोकसभा चुनाव में एक निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज्यादा नामांकन थे। इससे पहले कभी भी किसी भी लोकसभा सीट के लिए इतने नामांकन नहीं दर्ज़ हुए थे। स्वाभाविक था सारे देश का ध्यान नलगोंडा की और आकर्षित हुआ। देश-भर ने जान लिया कि नलगोंडा के किसान फ्लोरोसिस से प्रभावित हैं और किसानों ने देश-दुनिया का ध्यान सरकार की नाकामी की ओर आकर्षित करने के मसकद से ही इतने नामांकन दाखिल किये हैं। इसका नतीजा ये भी हुआ कि चुनाव आयोग के पास सारे उम्मीदवारों को देने के लिए चुनाव-चिह्न भी नहीं थे और चुनाव को स्थगित करना पड़ा। सारा देश जान गया कि नलगोंडा में चुनाव स्थगित होने की क्या वजह है। कई सारे लोग जान गए कि नलगोंडा के लोग फ्लोरोसिस से बहुत ज्यादा परेशान हैं। राज्य सरकार की भी खूब फजीहत हुई। बदनामी से तिलमिला गयी राज्य सरकार को 3 लाख एकड़ ज़मीन को सिंचाई-जल और 500 गाँवों को सुरक्षित पेय-जल मुहैया कराने के इंतज़ाम करने पड़े।

किसानों ने कई सालों तक आंदोलन किया था, लेकिन नतीजा नहीं निकला, समस्या का समाधान नहीं हुआ और कोई फायदा भी नहीं मिला था । लेकिन, राजनीति-विज्ञान के एक विद्वान की सलाह से कुछ ही दिनों में सालों पुरानी समस्या का निदान हो गया। किसान सारे राजनीति-विज्ञान के इस विद्वान के मुरीद हो गए।


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राजनीति-विज्ञान के ये विद्वान कोई और नहीं बल्कि जाने-माने शिक्षाविद्, पर्यावरणविद्, समाज-शास्त्री प्रोफेसर पुरुषोत्तम रेड्डी हैं।

वही प्रोफेसर पुरुषोत्तम रेड्डी, जिन्होंने एक नहीं बल्कि कई जन-आंदोलनों का नेतृत्व किया और उन्हें सफल बनाया। पुरुषोत्तम रेड्डी ने कई बार आंदोलनों में सीधे हिस्सा न लिया हो, लेकिन उन्होंने अपने प्रयोगात्मक और व्यावहारिक सुझावों से उन्हें सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पुरुषोत्तम रेड्डी कई जन-आन्दोलनों के प्रणेता हैं। उन्होंने अपनी सूझ-बूझ,राजनीतिक-ज्ञान, विवेक और अनुभव की मदद से कई जन-आन्दोलनों को सफल बनाया।

एक ख़ास मुलाकात में पुरुषोत्तम रेड्डी ने फ्लोरोसिस से पीड़ित नलगोंडा के किसानों के आंदोलन की यादें ताज़ा करते हुए बताया कि उन दिनों अविभाजित आँध्रप्रदेश के मुख्य्मंत्री चंद्रबाबू नायडू और तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन खुद को बहुत ही ज्यादा आंकते थे। उन्हें लगता था कि कोई भी उनके आगे टिक नहीं सकता, लेकिन जनता और लोकतंत्र की ताकत के सामने उन्हें झुकना पड़ा। शेषन चुनाव नहीं करवा पाए और मुख्य्मंत्री चंद्रबाबू नायुडू को शर्मशार होकर मजबूरन नलगोंडा की जनता को सुरक्षित पेय-जल उपलब्ध करवाना पड़ा। पुरुषोत्तम रेड्डी ने कहा,

"नलगोंडा के लोगों का विश्वास राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं पर से उठ चुका था। और जब मैंने उन्हें लोकसभा चुनाव में बड़ी संख्या में नामांकन दाखिल कर देश और दुनिया का ध्यान आकर्षित करने का सुझाव दिया तब उन्हें आश्चर्य तो हुआ,लेकिन वे हर तरह के पारम्परिक आंदोलन कर चुके थे इस वजह से किसान भाइयों ने नए तरह से विरोध जताने और आंदोलन करने का मेरा सुझाव मान लिया। मुझे खुशी हुई लेकिन मेरे मन में एक शंका थी। क्या किसान भाई, 500 रुपये खर्च कर नामांकन डालेंगे। सभी जानते थे कि चुनाव जीतेंगे तो नहीं और उलटे ज़मानत ज़ब्त हो जाएगी। लेकिन उस समय मेरी खुशी और बढ़ गयी जब किसान भाइयों ने कहा कि 500 रुपये देकर लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन भरने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। किसानों ने कहा कि कई बार वे खाद का इस्तेमाल भी करते हैं तब भी फसल बर्बाद हो जाती है। इस बार अगर नतीजा नहीं निकला तो यही समझेंगे कि खाद बेकार चली गयी।"


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पुरुषोत्तम रेड्डी उस आंदोलन की कामयाबी को याद कर फूले नहीं समाते। लेकिन, इस कामयाबी को वे अपने आंदोलनकारी-जीवन की सबसे बड़ी कामयाबी नहीं मानते। एक सवाल के जवाब में प्रोफेसर रेड्डी ने बताया कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में नागार्जुन सागर बाँध के पास प्रस्तावित परमाणु भट्टी (न्यूक्लियर रिएक्टर) को बनने से रुकवाना ही उनकी अब तक की सबसे बड़ी कामयाबी है। पुरुषोत्तम रेड्डी के अनुसार,

"कृष्णा नदी पर बना नागार्जुन सागर बाँध काफी बड़ी और महत्वपूर्ण परियोजना है । केंद्र सरकार ने इसी बाँध के पास एक परमाणु भट्टी लगाने का फैसला लिया था। प्लांट के लिए ज़मीन भी आवंटित कर दी गयी थी। काम भी शुरू हो गया। जब मुझे इस बात का पता चला तब मैंने स्वतः ही फैसला किया कि मैं पूरी ताकत लगाकर इस परमाणु भट्टी का विरोध करूंगा। मुझे किसी ने नहीं कहा था कि मुझे परमाणु भट्टी का विरोध करना चाहिए। मुझे लगा कि पर्यावरण और जन-हित की दृष्टि से ये काफी हानिकारक है और मैंने इसका पुरज़ोर विरोध करने का निर्णय लिया था। मैं परमाणु भट्टी की प्रस्तावित साइट पर गया और वहां मुआयना किया। यकीन हो गया कि अगर बाँध के करीब परमाणु भट्टी बनी तो कई लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है।"

पुरुषोत्तम रेड्डी जानते थे कि वे अकेले इस बड़ी परियोजना को लेकर केंद्र सरकार से लड़ नहीं सकते थे। वे अपनी ताकत को अच्छी तरह से समझते थे। पुरुषोत्तम रेड्डी परमाणु भट्टी से प्रभावित होने वाले गाँव गये और वहां लोगों को परमाणु भट्टी से होने वाले आशंकित नुकसान की जानकारी दी। लोगों में जागरूकता लाई। ग्रामीण लोगों, किसानों को सचेत किया। ऐसा करने के लिए पुरुषोत्तम रेड्डी को कई लोगों से मिलना पड़ा। कई गाँव घूमने पड़े। कई छोटी-बड़ी सभाएं करनी पड़ीं । ये सब इस लिए कि जनता खुशहाल रह सके। उनके सर पर मंडरा रहा परमाणु भट्टी का खतरा टल सके। पर्यावरण सुरक्षित रहे। जल-जमीन, जंगल-जानवर सुरक्षित रहें।


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निस्वार्थ भाव से जन-हित में पुरुषोत्तम रेड्डी ने परमाणु भट्टी के खिलाफ आंदोलन को खड़ा किया। पुरुषोत्तम रेड्डी की मेहनत रंग लाई। लोग जागरूक हुए। उन्हें खतरे का आभास हुआ। वे समझ गए कि परमाणु भट्टी उनकी ज़िंदगी तबाह कर सकती है। पुरुषोत्तम रेड्डी से प्रेरणा लेकर लोगों ने अपने-अपने स्तर पर परमाणु भट्टी का विरोध करना शुरू कर दिया। लोगों ने ठान ली कि जब तक परमाणु भट्टी का प्रस्ताव वापस नहीं लिया जाता वे चैन की सांस नहीं लेंगे। पुरुषोत्तम रेड्डी के संकल्प की वजह से शुरू हुआ ये जन-आंदोलन लगातार बढ़ता चला गया। प्रोफेसर शिवजी राव, गोवर्धन रेड्डी और डॉ के. बालगोपाल जैसे बड़े जन-आंदोलकारी भी इस लड़ाई में कूद पड़े। आखिरकार सरकार को जन-आंदोलन के सामने झुकना पड़ा। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गोवर्धन रेड्डी को चिट्टी लिखकर सूचना दी कि नागार्जुन सागर के पास नूक्लीअर रिएक्टर का प्रस्ताव रद्द कर दिया गया है। चेहरे पर मुस्कान के साथ पुरुषोत्तम रेड्डी ने कहा ,"एक बार जब हमने शुरू किया था तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। ये बड़ा-आंदोलन था। कामयाबी भी उतनी ही बड़ी थी। " प्रोफेसर रेड्डी के मुताबिक, दूसरे राज्यों में लोग नूक्लीअर रिएक्टर को रोक नहीं पाये। कोटा , कैगा, कुडनकुलम जैसे स्थानों पर लोगों ने आंदोलन तो किये लेकिन वे कामयाब नहीं हुए। "नागार्जुन सागर वाले आंदोलन की कामयाबी का राज़ बताते हुए पुरुषोत्तम रेड्डी ने कहा,

"मैं गाँव-गाँव जाता और ;लोगों को समझाता कि परमाणु भट्टी से किस तरह से उन्हें नुकसान पहुँच सकता है। मैंने लोगों को समझाया कि अगर परमाणु भट्टी में कोई दुर्घटना हो जाती है और विकिरणों और प्राणघातक तरंगों का रिसाव होता है तो पचास से सौ किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए सिर्फ चौबीस घंटे का ही समय रहेगा। लाखों लोग प्रभावित होंगे। अगर लोगों को समय के अंदर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा लिया भी जायेगा तब मवेशियों का क्या होगा ? नागार्जुन सागर बाँध पर काम करने वाले कर्मचारियों का क्या होगा ? रिसाव से हर हाल में बांध परियोजना में जमा पानी प्रदूषित हो जाएगा। और पानी के प्रदूषित होने का मतलब फिर बर्बादी ही होगा। मैंने लोगों को उनकी भाषा में परमाणु भट्टी के खतरों से अवगत कराया था। यही वजह थी कि मैं उनमें जागरूकता लाने में जल्द ही कामयाब हो गया।"

महत्वपूर्ण बात ये है कि पिछले कई सालों से, बल्कि करीब पांच दशकों से प्रोफेसर पुरुषोत्तम रेड्डी पर्यावरण-संरक्षण के प्रति जन-चेतना जगाने और सरकारों का ध्यान आकर्षित करने का काम कर रहे हैं। समाज-सेवा उनका धर्म है। जन-हित और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा कोई भी काम हो वे उसमें अपना योगदान देने में कभी पीछे नहीं हठते। पुरुषोत्तम रेड्डी बताते हैं कि बचपन में जो संस्कार उन्हें अपने माता-पिता से मिले उन्हीं की वजह से उन्होंने अपना जीवन समाज और पर्यावरण को समर्पित करने का फैसला ले लिया था। 

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पुरुषोत्तम रेड्डी का जन्म 14 फरवरी, 1943 को तेलंगाना के एक संपन्न और धनवान किसान परिवार में हुआ। उनके माता-पिता कौसल्या देवी और राजा रेड्डी -दयालु थे और लोगों की सेवा में समर्पित। माता-पिता आर्य-समाजी थे। उनपर दयानन्द सरस्वती, आचार्य अरविन्द और रविंद्रनाथ ठाकुर का प्रभाव बहुत ज्यादा था। परिवार आध्यात्मिक था। घर का माहौल भी आध्यात्म, भारतीय संस्कृति, और रीति-रिवाजों से भरा था। आचार्य विनोभा भावे से प्रभावित होकर राजा रेड्डी ने एक हज़ार एकड़ भूमि को भूदान आंदोलन में दान दे दिया था। इस बाद उन्होंने लोगों की मदद के लिए और तीन हज़ार एकड़ भूमि दान दे दी।

बचपन की यादें ताज़ा करते हुए पुरुषोत्तम रेड्डी ने बताया कि, "माता-पिता और घर के माहौल का मुझपर गहरा प्रभाव पड़ा। मेरे माता-पिता ने बहुत बढ़िया आध्यात्मिक जीवन जिया। उनका मिलनसार स्वभाव, उनका दया-गुण, उनकी समाज-सेवा वाकई गज़ब की थी। उनका निजी जीवन समाज के लिए एक बहित बढ़िया सन्देश है।" उन्होंने आगे कहा, " मेरे पिता ने मुझसे एक बार कहा था कि ज़मीन और जायजाद की कोई कीमत नहीं रहने वाली है। पढ़ाई करो और इसी का फायदा मिलेगा।" अपने पिता की सलाह मानते हुए पुरुषोत्तम रेड्डी ने पढ़ाई पर खूब ध्यान देना शुरू किया। वे हमेशा उत्कृष्ट और होनहार विद्यार्थी रहे। हमेशा अव्वल नंबर लाते। गुरुओं को अपने गुणों और प्रतिभा से हमेशा प्रभावित करते। अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर पुरुषोत्तम रेड्डी ने मेडिकल कॉलेज में भी दाखिला हासिल कर लिया। उन्हें "मेरिट" के आधार पर उन दिनों के प्रतिष्ठित उस्मानिया मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस कोर्स में सीट मिल गयी। दो साल तक उन्होंने खूब पढ़ाई की। परीक्षा में अच्छे नंबर लाये। वो डॉक्टर बनने से महज़ दो साल दूर थे।

दो साल तक डाक्टरी की पढ़ाई करने के बाद अचानक पुरुषोत्तम रेड्डी ने बड़ा फैसला लिया। उन्होंने डाक्टरी की पढ़ाई छोड़ने और समाज-सेवा करने का मन बनाया। चूँकि पढ़ाई भी ज़रूरी थी उन्होंने डाक्टरी की पढ़ाई बीच में छोड़कर सामाजिक-विज्ञान को अपनी पढ़ाई का मुख्य विषय बनाया।

सभी को हैरानी में डालने वाले उस फैसले के बारे में सवाल पूछे जाने पर पुरुषोत्तम रेड्डी ने कहा,

"न जाने क्यों मुझे लगा कि मैं डॉक्टर बनकर लोगों की सही तरह से सेवा नहीं कर पाऊंगा। मुझे लगा कि समाज-विज्ञान और राजनीति-विज्ञान का पंडित बनकर मैं लोगों की ज्यादा मदद कर सकता हूँ। डॉक्टरी की पढ़ाई अच्छी थी। एमबीबीएस का कोर्स भी शानदार था। लेकिन मेरा मन राजनीति-विज्ञान पर आ गया था, इसी वजह से मैंने बी ए ज्वाइन किया और समाज-विज्ञान को अपनी पढ़ाई का मुख्य विषय बनाया।"

पुरुषोत्तम रेड्डी ने आगे चलकर उस्मानिया विश्वविद्यालय में करीब तीन दशक से ज्यादा समय तक हज़ारों छात्रों को राजनति-शास्त्र के पाठ पढ़ाए । इससे पहले बी ए, एम ए , एम फिल और पीएचडी की पढ़ाई में उनका मुख्य विषय समाज-विज्ञान और राजनीति-विज्ञान ही रहा। वे कई सालों तक उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति-शास्त्र विभाग के अध्यक्ष और बोर्ड ऑफ़ स्टडीज़ के चेयरमैन भी रहे। दो टर्म के लिए वे उस्मानिया विश्वविद्यालय टीचर्स यूनियन के अध्यक्ष भी रहे।

उस्मानिया विश्वविद्यालय में लेक्चरर और प्रोफेसर रहते हुए भी पुरुषोत्तम रेड्डी ने समाज की भलाई के लिए जन-आन्दोलनों में अनवरत हिस्सा लिया। वे किसानों की आवाज़ और जन-मानस के आंदोलनकारी के रूप में पहचाने जाने लगे। दूर-दूर से लोग समस्याएँ लेकर समाधान के लिए उनके पास पहुँचने लगे। विषय की गंभीरता को देखकर पुरुषोत्तम रेड्डी ये फैसला करते कि उन्हें समस्या के निदान के लिए किये जाने वाले आंदोलन में किस तरह की भूमिका अदा करनी है। वे कभी नायक बन जाते तो कभी परामर्शदाता। पुरुषोत्तम रेड्डी ने जन-हित के लिए कानूनी लड़ाईयाँ भी की हैं। पर्यावरण संरक्षण और मानव कल्याण के लिए पुरुषोत्तम रेड्डी ने कई बार खुद अलग-अलग कोर्ट में अपनी आवाज़ पुर-ज़ोर तरीके से उठाई ।


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ख़ास मुलाकात के दौरान हमने पुरुषोत्तम रेड्डी से ये सवाल भी किया कि उन्होंने सालों तक राजनीति-विज्ञान पढ़ा और पढ़ाया,फिर आखिर वे कैसे एक शिक्षाविद और राजनीति-शास्त्री से पर्यावरणविद और जन-आन्दोलनों के प्रणेता बन गए ? जवाब में पुरुषोत्तम रेड्डी ने बताया कि दो घटनाओं ने उनके जीवन को बदल दिया था। ये घटनाएं ऐसी थीं जिनके वे काफी हिल गए था। उन्हें बहुत दुःख और पीड़ा हुई थी।

पहली घटना भोपाल गैस त्रासदी थी, जिसमें कई लोगों की जान गयी। दूसरी घटना उनके घर-परिवार से जुड़ी थी। पुरुषोत्तम रेड्डी के भाई भी किसान थे और जैविक खेती (आर्गेनिक फार्मिंग) करते थे। उनके खेतों को सरूरनगर झील से पानी मिलता था। लेकिन आसपास बन गयी औद्योगिक इकाइयों और फैक्ट्रियों ने झील को "वेस्ट मटेरियल" डंप करने की जगह बना दी। रासायनिक द्रव्य झील में छोड़े जाने लगे। सरूरनगर झील प्रदूषित हो गयी। झील के प्रदूशित पानी की वजह से पुरुषोत्तम रेड्डी के भाई की फसल भी बर्बाद हो गयी। खेत-ज़मीन खराब होने लगे। फसल और ज़मीन ख़राब होने का सीधा असर आमदनी पर पड़ा। परिवार को बहुत नुकसान हुआ। सभी इस नुक्सान से दहल गए। इस पारिवारिक संकट के समय ही पुरुषोत्तम रेड्डी ने संकल्प के लिए वे पर्यावरण संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित कर देंगे। उन्होंने ऐसा ही किया है। उनका पहला आंदोलन सरूरनगर झील का पुनरुद्धार था। उन्होंने सरूरनगर झील को बचाने के लिए आंदोलन किया। उनके एक रिश्तेदार और पेशे से रेडियोलाजिस्ट गोवर्धन रेड्डी ने उनकी इस आंदोलन में मदद की। पुरुषोत्तम रेड्डी पर कुछ इस तरह का जूनून सवार था कि उन्होंने सरूरनगर झील को बचाने के लिए हर एक सम्बंधित अधिकारी को काम करने पर मजबूर कर दिया। एक दिन भी वे चुप नहीं बैठे। निरन्तर काम में लगे रहे। उनकी मेहनत का ही नतीजा था कि आंदोलन जल्द कामयाब हो गया और सरूरनगर झील मरने से बच गयी।

अपने पहले आंदोलन में ही बड़ी कामयाबी ने पुरुषोत्तम रेड्डी के हौसले बुलंद कर दिये। अब उन्होंने पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे उद्योगों और कारखानों के खिलाफ जंग छेड़ थी। वे आँध्रप्रदेश और तेलंगाना में कई झीलों को हमेशा के लिए ख़त्म होने से बचाने और कईयों का पुनरुद्धार करने में कामयाब रहे। वायु और जल को प्रदूषित कर रही औद्योगिक इकाइयों और कारखानों के खिलाफ उन्होंने जंग छेड़ दी।

पुरुषोत्तम रेड्डी ने जनता की मदद करने के मकसद से पर्यावरण से जुडी किताबें और शोध-ग्रन्थ पढ़ने शुरू कर दिए। उन्होंने एमफिल में आचार्य अरविन्द के दर्शन-शास्त्र पर शोध किया था और अपनी पीएचडी के लिए शोध का विषय आचार्य अरविन्द के दर्शन-शास्त्र को ही बनाना चाहते थे, लेकिन सरूरनगर झील के प्रदूषित होने की वजह से उनके परिवार पर आये संकट को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने शोध का विषय "पर्यावरण नीति " को बना डाला। पर्यावरण और उससे जुड़े मुद्दों पर अध्ययन और शोध करते-करते पुरुषोत्तम रेड्डी विषय के विद्वान और विशेषज्ञ हो गए। उन्होंने अर्जित ज्ञान को लोगों में बांटने और लोगों में पर्यावरण के प्रति चेतना और जागरूकता लाने का काम किया और 73 की उम्र में अब भी एक युवा की तरह ही कर रहे हैं।

पुरुषोत्तम रेड्डी इन दिनों युवाओं पर खास ध्यान दे रहे हैं। वे मानते हैं कि अगर देश का युवा पर्यावरण से जुडी समस्याओं को समझ जाए और पर्यावरण-संरक्षण के लिए काम करे तो नतीजे अच्छे भी आएंगे और जल्दी भी। यही वजह है कि पुरुषोत्तम अब भी गावों और स्कूल-कॉलेजों में जाकर लोगों खासकर विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजगता और जागरूकता लाने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। वे कहते हैं, 

"मेरी सारी उम्मीदें युवाओं पर ही टिकी हैं। अगर हम पर्यावरण को बचा लेंगे तो देश को बचा लेंगे। सूखा, बाढ़, जंगल में आग .. ये सब पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने का ही नतीजा है। पर्यावरण को बचाने के लिए आज़ादी की दूसरी लड़ाई की ज़रुरत है और ये लड़ाई युवा ही शुरू कर सकते हैं और उनकी ताकत ही इसे कामयाब बना सकती है।"

पुरुषोत्तम रेड्डी को इस बात की भी शिकायत है कि अभी तक देश में किसी भी सरकार ने विकास की परिभाषा को तय नहीं किया है। उनके मुताबिक सारी सरकारें खतरनाक उद्योगों, कारखानों, सड़कों और भवनों के निर्माण को ही विकास मान रही हैं ,जो कि गलत है । पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाला कोई भी काम विकास नहीं हो सकता।

पुरुषोत्तम रेड्डी से जब ये पूछा गया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई आंदोलन क्यों कामयाब नहीं हो रहे हैं, उन्होंने कहा, 

"समस्या आंदोलनकारियों ख़ास तौर पर नायकों से ही हैं। आंदोलनों का नेतृत्व करने वाले लोग समस्या और मुद्दों को जनता तक ले जाने में उतना ध्यान नहीं देते जितना अपना नाम कमाने में। मैंने कई लोगों को देखा है कि वे मुद्दे उठाते हैं और जैसे ही उनका नाम हो जाता है वे मुद्दे को भूल जाते हैं और ऐसे मुद्दे की तलाश में जुट जाते हैं जो उन्हें और ज्यादा पब्लिसिटी देगा। इसी चक्कर में आंदोलन नाकाम हो रहे हैं। आंदोलनकारियों को खुद को हाईलाइट करने के बजाय मुद्दों को जनता के बीच ले जाना होगा।"


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