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1,72000 शिक्षा मित्रों के समायोजन का फैसला तो हुआ, लेकिन इंसाफ कब होगा!

प्रणय विक्रम सिंह
26th Jul 2017
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 मा. उच्चतम न्यायालय के फैसले ने 25 जुलाई की रात न जाने कितने घरों के चूल्हों को आग से महरूम कर दिया। न जाने कितने बच्चों ने अपने अभिभावकों की आंखों में तैरते आंसुओं में अपने ख्वाबों की नाव को डूबते हुए देख लिया था। किसी की फीस अधर में लटक गई थी तो किसी बेटी की डोली पर ग्रहण लग गया। अम्मा के इलाज को शहर में कराने का सपना भी छप्पर से टपकते पानी की बूंदों की तरह धीरे-धीरे क्षीण होने लगा है। वाह रे कानून! एक झटके में सब खत्म कर दिया। और मुआ जमाना कहता है कि आजकल कानून की कोई हैसियत नहीं। आइये जरा देखें कि क्या कहा मा.उच्चतम न्यायालय ने। 

फोटो साभार: सोशल मीडिया

फोटो साभार: सोशल मीडिया


गेंद राज्य सरकार के पाले में है। लेकिन राज्य सरकार कर क्या सकती है? सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद यह तो तय है कि अब वह शिक्षा मित्रों को सहायक शिक्षक तो नहीं बनाये रख सकती है लेकिन अदालत के निर्देशानुसार आदेश आने के बाद से जब तक सरकार द्वारा दो भर्तियां नहीं निकाली जातीं तब तक सरकार शिक्षामित्रों को शिक्षामित्र के मूल पद और वेतन पर रख सकती है।

तू इधर-उधर की न बात कर

ये बता कि काफिला क्यों लुटा

मुझे रहजनों से गिला नहीं,

तेरी रहबरी पे सवाल है।।

आज यह सवाल उत्तर प्रदेश के प्रत्येक शिक्षा मित्र की आखों में तैर रहा है। एक दहाई (दशक) से भी ज्यादा वक्त से प्राथमिक शिक्षा की लौ को घोर अनियमितताओं के अंधेरों में भी रौशन रखने वाली यह जमात रातोंरात सरकार के रहमोकरम पर छोड़ दी गयी है। या यूं कहें की बेरोजगार हो गयी है। मा. उच्चतम न्यायालय के फैसले ने 25 जुलाई की रात न जाने कितने घरों के चूल्हों को आग से महरूम कर दिया। न जाने कितने बच्चों ने अपने अभिभावकों की आंखों में तैरते आंसुओं में अपने ख्वाबों की नाव को डूबते हुए देख लिया था। किसी की फीस अधर में लटक गई थी तो किसी बेटी की डोली पर ग्रहण लग गया। अम्मा के इलाज को शहर में कराने का सपना भी छप्पर से टपकते पानी की बूंदों की तरह धीरे-धीरे क्षीण होने लगा है। वाह रे कानून! एक झटके में सब खत्म कर दिया। और मुआ जमाना कहता है कि आजकल कानून की कोई हैसियत नहीं। आइये जरा देखें कि क्या कहा मा.उच्चतम न्यायालय ने। 

मा.उच्चतम न्यायालय ने शिक्षा मित्रों को सूबे में सहायक अध्यापक पदों पर समायोजित करने के राज्य सरकार के फैसले को रद्द कर करते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया और कहा है कि नियमों में ढील देने का राज्य सरकार को अधिकार नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक तरफ एक लाख 78 हजार टीचर के रेग्युलर करने का दावा कानून का उल्लंघन करता है।

अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है। लेकिन राज्य सरकार कर क्या सकती है? सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद यह तो तय है कि अब वह शिक्षा मित्रों को सहायक शिक्षक तो नहीं बनाये रख सकती है लेकिन अदालत के निर्देशानुसार आदेश आने के बाद से जब तक सरकार द्वारा दो भर्तियां नहीं निकाली जातीं तब तक सरकार शिक्षामित्रों को शिक्षामित्र के मूल पद और वेतन पर रख सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश नहीं दिया कि सरकार को 2 भर्तियां कितने समय में निकालनी है। अत: आगामी दो भर्ती निकालने तक सरकार के पास शिक्षामित्रों को शिक्षामित्र पद पर रखने का अधिकार है। यह संभव है कि अपेक्षित दो भर्तियों के मध्य में राज्य सरकार शिक्षा मित्रों को मानदेय के रूप में सम्मान जनक राशि तय कर दे। दीगर है कि शिक्षामित्रों को खुली भर्ती में रियायत जैसे आयु में छूट तथा अनुभव के आधार पर कुछ भारांक तो प्रदान करने की बात न्यायालय ने कही है किंतु भारांक इतने भी नहीं दिये जा सकते जिससे उन्हे कुछ विशेष राहत मिल सके। ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश की शिक्षक भर्ती सिर्फ इसलिए रद्द कर दी थी क्योंकि वहां शिक्षामित्रों को काफी अधिक भारांक दिए जा रहे थे। खैर, मा. अदालत के फैसले ने उ.प्र. सरकार की पूर्व सपा सरकार द्वारा किये गये समायोजन के निर्णय की धज्जियां उड़ा दी हैं। इससे प्रदेश में एक लाख 72 हजार से अधिक शिक्षा मित्र प्रभावित हो गये हैं। सवाल है कि यदि समायोजन असंवैधानिक था तो इस पाप का जिम्मेदारी कौन? कम से कम शिक्षा मित्र तो नहीं।

एक प्रश्न और है जो परेशान कर रहा है कि जब समायोजन करने वाली सपा सरकार की नीयत साफ थी तो नीति में गड़बड़ी कैसे हो गई? क्यों नहीं राज्य सरकार ने शिक्षा मित्रों के समायोजन को सफल करने के लिये एक नये संवर्ग का सृजन किया? ऐसा करने पर न तो कोर्ट का जंझट होता न ही कानून की पेचीदगियों से जूझना पड़ता। कुल घटनाक्रम से ज्ञात होता है कि कुछ तो है जिसकी पर्देदारी है।

सियासत के स्वर्ण मृग का छल

नियमों में ढील देने का राज्य सरकार को अधिकार नहीं, नियुक्ति अवैध, समायोजन अवैध। इन सबके लिये पूर्व सरकार जिम्मेदार और दण्ड भुगते शिक्षा मित्र। क्या लोकतंत्र में किसी चुनी हुई सरकार के गुनाह या अकर्मण्यता की सजा कोर्ट कर्मचारियों को दे,यह न्याय संगत है! क्यों नहीं नियमावली में संशोधन करने वाली भारतीय मेधा की प्रतीक आईएएस संवर्ग के उन अधिकारियों पर सरकार ने दण्डात्मक कार्यवाही की, जिनके कारण उ.प्र. सरकार को समूचे राष्ट्र के सम्मुख लज्जित होना पड़ा। जनपद उन्नाव में कथित जहरीली शराब प्रकरण में तत्काल पुलिस अधीक्षक बदल जाता है और यहां रातोंरात एक लाख से अधिक जमात सरकार की अकर्मण्यता के कारण बेरोजगार हो जाती है और कोर्ट समायोजन करने वाली सरकार और अधिकारियों पर कोई सवाल नहीं खड़ा करती। अब यह महसूस हो रहा है कि जैसे सियासत ने वादों का स्वर्ण मृग दौड़ा कर फिर एक बार भोली सीता का हरण कर लिया है। किंतु यह भी दीगर है कि जब सीता का हरण होता है तो रावण वध की पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी होती है। 2017 को विधान सभा चुनावों में जन मानस ने वादों का स्वर्ण मृग दौड़ा, भोली सीता का हरण करने वाली जमात को तो उसके अंजाम तक पहुंचा दिया लेकिन क्या त्रेता की भांति छली गई सीता (वर्तमान संदर्भ में शिक्षा मित्र)को पृथ्वी में समाना होगा।

अब जब एक योगी, राजयोगी बन उ.प्र. की सियासत की बागडोर संभाल रहा है तो आशा की जा सकती है कि व्यवस्था ने जो अन्याय त्रेता में किया था उसे एक योगी के रहते कलयुग में न दोहराया जाये। शिक्षा मित्रों के लंबे सहयोग और समर्पण को देखते हुये वर्तमान सरकार कौन सी सम्मानजनक नई संभावनाये सृजित करेगी यह तो समय ही बतायेगा किंतु इतना तो दिख रहा है कि सियासत के छल ने शिक्षा मित्रों के ख्वाबों को छलनी कर दिया गया है। मुझे कवि शिव ओम अंबर का एक शेर याद आ रहा है कि "ये सियासत की तवायफ का दुपट्टा है/ ये किसी के आंसुओ से तर नहीं होता..." चाहे 1 लाख बहत्तर हजार शिक्षा मित्र विलाप करें याकि टीईटी उत्तीर्ण चार लाख युवा जश्न मनायें लेकिन सियासत जारी रहेगी, छल होता रहेगा।

क्या पड़ेगा प्रभाव

शिक्षामित्र आंदोलन की भूमिका में आ गये हैं। और उनके काम पर रोक के बाद प्रदेश के हजारों स्कूलों में ताले लग जाएंगे। शिक्षकों की कमी के कारण बड़ी संख्या में शिक्षामित्र ही प्राथमिक विद्यालयों की कमान संभाल रहे हैं। प्राथमिक विद्यालयों में काम कर रहे शिक्षामित्रों के विद्यालय नहीं जाने की स्थिति में हर ब्लाक में औसतन 20 विद्यालयों में ताला बंद हो जाएगा। एक सत्य ये भी है कि उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में ऐसे विद्यालय हैं, जहां शिक्षामित्र ही थे, अब शिक्षामित्रों के समायोजन पर रोक एवं उनकी नियुक्ति प्रक्रिया को रद्द करने के बाद विद्यालयों की शिक्षकों की स्थिति खराब हो जाएगी। 

प्रदेश में कुल 1.13 लाख प्राथमिक और 46 हजार जूनियर स्तर के विद्यालय हैं। परिषदीय विद्यालयों में प्राथमिक में 5.33 लाख शिक्षक तथा जूनियर स्तर पर 2.69 लाख शिक्षक तैनात हैं। प्रदेश में आरटीई के मानक के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों के 2.60 करोड़ छात्रों के लिए 8.70 लाख शिक्षक चाहिए, जबकि तैनात 5.33 लाख ही हैं, इस प्रकार 3.37 लाख शिक्षक कम हैं। जूनियर स्तर के 92 लाख छात्रों के लिए 3.06 लाख शिक्षक चाहिए जबकि तैनाती 2.69 लाख की ही है, इस प्रकार 37 हजार शिक्षकों की कमी है।

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