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दूधनाथ सिंह की कविता में 'प्यार' एक थरथराता शब्द

17th Oct 2018
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्थायी अवकाश प्राप्त करने के बाद हिंदी के ख्यात कवि-कथाकार-आलोचक दूधनाथ सिंह जीवन के आखिरी क्षण तक कैंसर से लड़ते हुए शब्द-सागर में डुबकियां लगाते रहे। आज (17 अक्तूबर) दूधनाथ सिंह का जन्मदिन है। वह साठोत्तरी पीढ़ी के ऐसे रचनाकार थे, जिसने कहानी, कविता, नाटक, संस्मरण, उपन्यास, आलोचना विधाओं में जो भी लिखा, बेजोड़।

दूधनाथ सिंह

दूधनाथ सिंह


उन्होंने कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचना सहित सभी विधाओं में लेखन किया। उन्होंने नई कहानी आंदोलन को चुनौती दी और साठोत्तरी कहानी आंदोलन का सूत्रपात किया।

दूधनाथ सिंह, हिंदी के ऐसे कवि-कथाकार-आलोचक, जो सिर्फ शब्दों में ही डूबे रहना चाहते थे। उनका मानना था कि लिखते रहो, प्रसिद्धि स्वयं सर्जक को खोज लेती है। उनके शब्दों में जीवन की कितनी घनी संवेदना थी, उनकी इन पंक्तियों से स्वतः स्पष्ट हो जाता है - 'मैं तुम्हारी पीठ पर बैठा हुआ घाव हूँ / जो तुम्हें दिखेगा नहीं / मैं तुम्हारी कोमल कलाई पर उगी हुई धूप हूँ / अतिरिक्त उजाला - ज़रूरत नहीं जिसकी / मैं तुम्हारी ठोढ़ी के बिल्कुल पास / चुपचाप सोया हुआ भरम हूँ साँवला / मर्म हूँ दर्पण में अमूर्त हुआ / उपरला होंठ हूँ खुलता हँसी की पंखुरियों में / एक बरबस झाँकते मोती के दर्शन कराता / कानों में बजता हुआ चुम्बन हूँ / उँगलियों की आँच हूँ / लपट हूँ तुम्हारी / वज्रासन तुम्हारा हूँ पृथ्वी पर / तपता झनझनाता क्षतिग्रस्त / मातृत्व हूँ तुम्हारा / हिचकोले लेती हँसी हूँ तुम्हारी / पर्दा हूँ बँधा हुआ / हुक् हूँ पीठ पर / दुख हूँ सधा हुआ / अमृत-घट रहट हूँ / बाहर उलीच रहा सारा / सुख हूँ तुम्हारा / गौरव हूँ रौरव हूँ / करुण-कठिन दिनों का / गर्भ हूँ गिरा हुआ / देवता-दैत्य हूँ नाशवान / मत्र्य असंसारी धुन हूँ / अनसुनी। नींद हूँ / तुम्हारी / ओ, नारी!'

अपनी कविताओं से सामाजिक विद्रूपता की सरल अनुभूति कराते रहे दूधनाथ सिंह ने जब भी लिखा, जो भी लिखा, सार्थक और प्राणपण से! दूधनाथ सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक रहे। उन्होंने कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचना सहित सभी विधाओं में लेखन किया। उन्होंने नई कहानी आंदोलन को चुनौती दी और साठोत्तरी कहानी आंदोलन का सूत्रपात किया। 'हिन्दी के चार यार' के रूप में ख्यात ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह और रवीन्द्र कालिया ने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में हिन्दी लेखन को नई धार दी। लेखकों की पीढ़ी तैयार की और सांगठनिक मजबूती प्रदान की। चार यार में अब सिर्फ काशीनाथ सिंह और ज्ञानरंजन ही बचे रह गए हैं।

दूधनाथ सिंह का जन्म बलिया (उ.प्र.) के गाँव सोबंथा में 17 अक्टूबर, 1936 को हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम. ए. करने के पश्चात् कुछ दिनों तक वह कोलकाता में अध्यापक रहे। उसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापन करने लगे। सेवानिवृति के बाद पूरी तरह से लेखन के लिए समर्पित हो गए। उनका कैंसर से इसी वर्ष 11 जनवरी, 2018 को 81 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह बहुमुखी प्रतिभा के रचनाकार थे। साठोत्तरी पीढ़ी के ऐसे रचनाकार, जिसने कहानी, कविता, नाटक, संस्मरण, उपन्यास, आलोचना विधाओं में जो भी लिखा, अत्यंत महत्त्वपूर्ण। उन्होंने लेखन में प्रेम, दाम्पत्य और यौन-सम्बन्धों के छल-छद्म का उपहास किया।

उनके सृजन में नये जीवन-अनुभव, नये कथ्य, नयी भाषा, नये कथा-शिल्प से कहानी में अनूठा स्वाद उपस्थित हुआ। वह सिंह अपने निजी अनुभव, जीवन-परिवेश और भौगोलिक गंध की ईमानदार अभिव्यक्ति तथा ताजगी भरी अनूठी शैली-शिल्प के कारण अलग से पहचाने गए। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के प्रिय रहे दूधनाथ सिंह की प्रमुख कृतियाँ हैं - आखिरी कलाम, लौट आ ओ धार, निराला:आत्महंता आस्था, सपाट चेहरे वाला आदमी, यमगाथा, धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे आदि। उनके एक और भी आदमी है, अगली शताब्दी के नाम और युवा खुशबू तीन कविता संग्रह भी प्रकाशित हैं। इसके अलावा उन्होंने एक लंबी कविता- 'सुरंग से लौटते हुए' भी लिखी। आलोचना में उन्होंने 'निराला: आत्महंता आस्था', 'महादेवी', 'मुक्तिबोध: साहित्य में नई प्रवृत्तियां' जैसी रचनाएं दी हैं।

दूधनाथ सिंह की अपने जीवन में पहली प्रतिबद्धता साहित्य के प्रति रही। उनके तमाम जीवन अनुभव भी शायद उनके लिए साहित्य-लेखन के लिए आवश्यक कच्चा मसाला बन कर रहे। रचनात्मकता के क्षणों में उनकी स्मृति में संचित अनुभव ही उन्हें किसी साहित्यिक रचना के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध करवाते थे। कई बार अपने इस अनुभव-संसार को अधिक समृद्ध बनाने के लिए वे स्वयं प्रयत्न करते थे और इसके लिए आवश्यक जोखिम भी उठाते थे। उनकी कविता 'कृष्णकान्त की खोज में दिल्ली-यात्रा' हिंदी की श्रेष्ठ व्यंग्य काव्य–रचना मानी जाती है। उनकी एक कविता में 'प्यार' इस तरह थरथराता है -

स्तब्ध निःशब्दता में

कहीं एक पत्ता खड़कता है।

अंधेरे की खोह हलचल के प्रथम सीमान्त पर

चुप- मुस्कुराती है रोशनी की सहमी हुई फाँक

पहाड़ को ताज़ा और बुलन्द करती है,

एक निडर सन्नाटा अंगड़ाइयाँ लेता है।

हरियाली और बर्फ़ के बीच

इसी तरह शुरू करता है- वह

अपना कोमल और खूंखार अभियान

जैसे पूरे जंगल में हवा का पहला अहसास

सरसराता है।

तभी एक धमाके के साथ

सारा जंगल दुश्मन में बदल जाता है

और सब कुछ का अन्त- एक लपट भरी उछाल

और चीख़ती हुई दहाड़ में होता है।

डरी हुई चिड़ियों का एक झुंड

पत्तियों के भीतर थरथराता है

और जंगल फिर अपनी हरियाली में झूम उठता है।

दूधनाथ सिंह की वे कहानियां पाठकों का खास ध्यान खींचती हैं, जो दिलचस्प किन्तु प्रतीकात्मक होने के कारण उलझी हुई, जटिल और चमत्कारपूर्ण होती हैं। उनकी कहानी 'रीछ' अपनी प्रतीकात्मकता, फन्तासी तथा यौन-चित्रों-संवादों के कारण पर्याप्त विवादग्रस्त और चर्चित हुई। इसमें मध्यवर्गीय व्यक्ति के सामने उपस्थित व्यक्तित्व के द्वैत अथवा विभाजित व्यक्तित्व की समस्या को व्यक्त करने के लिए प्रतीकों का बहुस्तरीय उपयोग करके ऐसी फन्तासी रची गई है, जिसके प्रतीकार्थ को पकड़ने में कठिनाई होती है। दाम्पत्य सम्बन्धों में उपस्थित 'रीछ' दरअसल पति की अतीत की स्मृति-यंत्रणा का प्रतीक है! 'रीछ' को लेकर बुनी गई जटिल और उलझी हुई फन्तासी पर फ्रायड के मनोविश्लेषण का प्रभाव है।

इस कहानी के बारे में, दूधनाथ सिंह कहते हैं - ''रीछ का मुख्य कथ्य यह है कि अगर आप पीछे-देखू हैं, अगर आप अतीतजीवी हैं तो आपके लिए रास्ता एक ही है कि आप या तो अतीत का वध कर दें और नहीं तो अतीत आपका वध कर देगा। यानी आदमी को अतीतजीवी नहीं होना चाहिए। बस इतनी-सी बात पर कहानी लिखी गई। कहानी में आया हुआ रीछ का बच्चा उसी अतीत का प्रतीक है, जो हर समय उस आदमी का पीछा करता है और अन्ततः जब वह आदमी उसे मारने की कोशिश करता है तो वह (अतीत) उसके दिमाग को फाड़कर उसके दिमाग के अन्दर प्रवेश कर जाता है। कहानी लिखते वक्त कहानीकार के नाते यह मेरा निश्चय था कि अतीतजीवी ही मरे, अतीत नहीं। क्योंकि कहानी का पूरा कथ्य इसी ओर ले जाता था।''

ग्रामीण परिवेश यानी अपनी जड़ों से विलग, वियुक्त होकर शहर आने पर बेरोजगार और बेसहारा बने दूधनाथ सिंह की शुरूआती कहानियों में उस विलगाव और बेसहारेपन का चित्रण ही प्रमुख रूप से मौजूद है। 'रक्तपात', 'आइसबर्ग' और 'सपाट चेहरे वाला आदमी' जैसी शुरुआती कहानियों में परिवेश से विलगाव और बेसहारेपन के दुख-दर्द की अभिव्यक्ति साफ तौर पर देखी जा सकती है। उनकी शुरुआती कहानियों में गांव से अलग हुए एक युवक की तकलीफों और असामंजस्य की ईमानदार अभिव्यक्ति मिली है। गांव और शहर का द्वन्द्व तथा शहरी ठंडेपन में निगल लिए जाने के भय एवं चीत्कार को उनकी शुरुआती कहानियों में देखा-सुना जा सकता है। 'रक्तपात' कहानी में एक प्रवासी युवक की पारिवारिक प्रेम सम्बन्धों के बीच उपस्थित झंझावातों और बिखरावों की कचोट भरी स्मृतियां हैं। इसमें दादा-पिता-मां-बहन और पत्नी से असहज और तनाव भरे सम्बन्धों की अभिव्यक्ति में पारिवारिक जीवन की विचित्र बेचारिगी का ऐसा रूप प्रस्तुत हुआ है कि पाठक स्वयं उसका हिस्सेदार महसूस करने लगता है। दूधनाथ सिंह की कहानियां मध्यवर्ग की ढोंगभरी सामाजिक संरचना के विरुद्ध सवाल उठाती हैं।

'आखिरी कलाम' दूधनाथ सिंह की अपनी प्रियतम रचनाओं में से एक है। यह उपन्यास बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पहले और बाद के सांप्रदायिक माहौल का सजीव चित्रण करता है। उन्होंने जो मुख्य किरदार गढ़ा है, वह एक प्रतिरोध है, साम्प्रदायिकता के खिलाफ। उसका कोई रूप नहीं है। हालांकि, तत्सत पाण्डेय के किरदार की प्रेरणा उन्हें सीपीआई के वरिष्ठ नेता होमी दाजी से मिली। उन्होंने जब लिखना शुरू किया तो लगा कि वह होमी दाजी को एक प्रतिरोध की शक्ति के रूप में दर्ज कर रहे हैं लेकिन वह सिर्फ एक प्रतिरोध है, सांप्रदायिकता के खिलाफ। दूधनाथ सिंह का मानना था कि 'एक लेखक का दायित्व है कि वह अपने समय की सामाजिक समस्याओं का चित्रण करे। उन समस्याओं के प्रति प्रतिबद्ध रहे लेकिन कोई भी लेखक समाज को बदलने का अगर सपना देखता है तो वह पूरा नहीं हो सकता क्योंकि समाज एक लेखक की रचनाओं से नहीं बदलता, उसके बदलने के अपने तर्क होते हैं।'

दूधनाथ सिंह की औपन्यासिक संरचना में 'आखिरी कलाम' हिंदू फासीवादी खतरे की पृष्ठभूमि में एक ऐसी जीवन्त जिरह है, जो धर्म, धर्मनिरपेक्षता, जनतन्त्र, मीडिया, मुसलमान, वामपंथ से लेकर लोहियावादी राजनीति तक का विस्तार लिए है। चंदन पांडेय लिखते हैं - 'रचनाशीलता के उनके अनेक आयाम हैं। उनकी कहानियों का मुरीद कौन नहीं होगा? कथा की हर विधि को उन्होंने अपनाया, सुलझाया और लिखा है। उन पर तो असंख्य बातें होंगी और होनी भी चाहिए लेकिन मैं एक अनन्य बात उनकी रचनाओं से सीखने को मिली कि वो चमकीले, कोटेबल, वाक्यों से परहेज करते थे। उनकी रचनाएँ अपने प्रभाव में खूब याद होंगी लेकिन कोई चमकदार किन्तु असंपृक्त वाक्य शायद ही दिखे।

सबसे पहले जो मैंने उनकी कहानी पढ़ी थी, वो थी: धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे। धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे इकलौती कहानी है जिसमें कथा का प्रस्थानबिंदु कल्पित है। एक ऐसे समय की कल्पना जहां स्त्रियों की खरीद-फ़रोख़्त में भी कायदा बना हुआ है। वो आज की यजीतरह बेकायदा समय नहीं है। इस कल्पना के उपरांत पिता-पुत्र को धर्मयुद्ध में उतार लेने का अद्भुत किन्तु दहला देने वाला आख्यान है। इस कहानी को पढ़ने के बाद हर कोई यही करेगा कि दूधनाथ सिंह की कहानियाँ ढूँढ-ढूँढ कर पढ़े।' उनके लेखन में कमाल का नैरंतर्य था। उन्होंने कई बेहतरीन उपन्यास भी लिखे। ‘लौट आ ओ धार’ दूधनाथ सिंह से सबसे बेहतर परिचय कराती है। बलिया से बनारस पैदल आने का संघर्ष, बीमारी, प्रेम, मित्रताएँ, आदि इसमें उनके जीवन के अनेक पक्ष स्यात प्रकट होते हैं। दरअसल, दूधनाथ सिंह हिंदी लेखकों के उस नक्षत्र मंडल का अभिन्न हिस्सा थे, जिसके कुछ ही सदस्य अब बचे हैं, लेकिन सबकी चमक सब काल तक रहेगी।

इस नक्षत्र मंडल में नामवर सिंह, कमलेश्वर, मार्कंडेय, शेखर जोशी, रवींद्र कालिया, ज्ञान रंजन और काशीनाथ सिंह, लक्ष्मीकांत वर्मा, जगदीश गुप्त, सत्य प्रकाश मिश्र, कमला प्रसाद और अमरकांत जैसे दिग्गज लेखक शामिल रहे। कहते हैं कि दूधनाथ हिंदी के एक विवादास्पद कथाकार थे। उनकी कहानियां अक्सर उनके ही किसी दोस्त के जीवन चरित का बारीक ऑब्जर्वेशन होती थीं। 'हुंडार' और 'नमो: अंधकारम्' कहानियां इसका उदाहरण हैं लेकिन, उनके दोस्त भी उनका लोहा मानते थे, क्योंकि उनकी कहानियां साधारण ऊंचाई से ऊपर होती थीं। उनसे मिलने पर उनकी बातों से यह एहसास होता था कि वे केवल ज्ञानी नहीं, बल्कि कथाकार और कवि हैं, बेहद मूडी हैं, पजेसिव हैं और खराब लिखनेवालों को हिकारत की नजर से देखते हैं लेकिन, अपमान करने की हद तक गुस्से के बावजूद ऐसे लोगों को कभी अपमानित नहीं करते थे।

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