जानिये उस जर्मन विचारक को जिसके कारण आबाद है हज़ारों करोड़ की UPSC इंडस्ट्री

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सॉफ़्टवेयर इंजीनियर, वाइल्ड लाइफ़ फ़ोटोग्राफ़ी और यू ट्यूब सेलेब्रिटी बनने के जमाने में भी भारत के युवाओं का एक बहुत बड़ा तबका है जो आज भी “कलक्टर साहब” बनना चाहता है. आई.ए.एस. होने का रुतबे और उसकी चमक आज भी बरकरार है. यूँ ही तो हर साल करीब 11 लाख युवा UPSC परीक्षा में नहीं बैठते. हालाँकि आख़िर में “कलक्टर साहब” उनमें से एकदम मुट्ठी भर ही क्यूँ न बनते हों! परीक्षा में पास होने के लिए अक्सर कई सालों की मेहनत और त्याग लगते हैं.

ये तमाम बातें एक तरफ़ लेकिन क्या हमने कभी इस पर सोचा है कि आई.ए.एस. का पद वुजूद में कैसे आया? इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज के अधिकारियों का जो रुतबा जो पॉवर होती है वह क्यूँ होती है? और क्या वाकई वह उतनी जरुरी भी है जितनी बतायी जाती है? आख़िर किसने बनाया नौकरशाही का यह तंत्र?

ये सब जानने के लिए हमें सौ साल पीछे मैक्स वेबर के पास जाना होगा. वेबर बीसवीं सदी के जर्मन विचारक थे. उन्हें आधुनिक समाजशास्त्र का शिल्पकार भी कहा जाता है. उन्होंने अपनी किताब “Economy and Society” (1922) में नौकरशाही (Bureaucracy) का सिद्धांत गढ़ा. वेबर के मुताबिक़ नौकरशाही तभी सर्वाधिक उपयुक्त शासन प्रणाली हो सकती है जब उसके सिद्धांत, उसकी प्रक्रियाएँ पूरी तरह तार्किक हों. इसके अलावा वेबर ने नौकरशाही की सफलता के लिए तीन और शर्तें स्थापित की हैं. श्रम का सटीक विभाजन, योग्यता के आधार पर व्यक्तियों का चयन और अधिकारियों में निर्वैयक्तिक संबध. 

वेबर के मुताबिक़ ब्यूरोक्रेसी को स्थापित करने के का एक प्रमुख उद्देश्य सरकार के लिए एक ऐसे तंत्र का आविष्कार करना था जो एक ‘मशीन’ की तरह काम करे. वेबर मूलतः ब्यूरोक्रेसी को एक ‘तंत्र’ या ‘मशीन’ की तरह देखती है जिसमे मानवीय तत्वों (human elements) की कोई जगह नहीं हो सकती. ब्यूरोक्रेसी उनके अनुसार ‘नियमपालन’ करने की शक्ति और चाहत को उसकी उच्चतम सीमा तक ले जाना है. इसी बात को पुख़्ता करती हुई वेबर की ये पंक्ति भी है जहाँ वह कहते हैं कि ब्यूरोक्रेसी जितनी मानवीय तत्वों से दूर होगी, उतना ही कुशलतापूर्वक अपना काम करेगी. 

बाद के सालों में वेबर की थियरी को बहुत सारे समाजवैज्ञानिकों ने चुनौती दी और एक अधिक मानवीय, अधिक लोकतांत्रिक नौकरशाही की बात की. लेकिन कुछ संदर्भों में वेबर की कही बातें आज भी व्यवहार में दिखाई देती हैं. भारत में UPSC की मेरिट-बेस्ड रैंक वेबर की “स्पष्ट पदानुक्रम” (clear hierarchy) की धारणा से प्रभावित लगती है. इसी तरह नीचे का हर रैंक अपने से ऊपर के रैंक की कमांड का पालन करता हुआ एक पिरामिड नुमा संरचना को बनाये रखता है. इस पिरामिड में वाद-विवाद या बातचीत की बहुत संभावना वेबर के सिद्धांत में नहीं बचती. 

जैसी वेबर की कल्पना थी, एक ‘मशीन’ की तरह काम करना इस तंत्र की संरचना में ही निहित है. लेकिन वेबर की कल्पना में एक सरकारी अधिकारी को अपने धर्म, जाति, लिंग, राजनीति संबंधी पूर्वाग्रहों के बिना, बिना भेदभाव किये निष्पक्षता के साथ पेश आने की जरूरत होती है जो व्यवहार में कितना होता है बहस का विषय है. वेबर के अनुसार तो एक अधिकारी सिर्फ़ अपने पद, अपनी कुर्सी और अपने रैंक से बंधा होना चाहिए और किसी चीज़ से नहीं.

और ऐसे देखने पर हर नौकरशाह को आम नागरिक यानि ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति की सेवा करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए. पर क्या व्यवहार में ऐसा होता है? लाइसेंस-परमिट-कोटा-राज, लाल फ़ीताशाही, कुर्सी राज का “स्टील फ़्रेमवर्क” क्या वेबर की बुनियादी कल्पना पर चल पाया है या वह राजनीति के आगे नतमस्तक हो गया है?

नौकरशाही पर हमारी इस शृंखला में हम आपको उन आई.ए.एस अधिकारियों से परिचित करवाएँगे जिन्होंने वेबर की आशंकाओं से अलग अपने काम से आम लोगों का जीवन बेहतर करने में अपनी सत्ता और प्रतिभा का उपयोग किया है. यह आप तय करियेगा कि वे अपवाद हैं या नियम?

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