बेटियों को बलशाली नहीं, दयालु पिता चाहिए

12 साल पहले हार्वर्ड की एक स्‍टडी में सामने आया यह आंकड़ा काफी चौंकाने वाला था कि अमेरिका में 73 फीसदी महिलाएं डैडी इशु की शिकार हैं. किसी न किसी रूप में अपने पिताओं के साथ जटिल संबंधों का असर इन महिलाओं के वयस्‍क जीवन पर पड़ा.
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अमेरिकन राइटर ईव इन्‍सलर (Eve Ensler) की किताब ‘एन एपॉलजी’ (An Apology) के पिता अपने माफीनामे में लिखते हैं, “पिताओं को लगता है कि बच्‍चे को सही दिशा देने के लिए उन्‍हें मजबूत और ताकतवर होने की जरूरत है, जबकि होना उन्‍हें सिर्फ थोड़ा और दयालु होना था.”

11 साल पहले ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने एक वृहद सोशल स्‍टडी थी. 15 लाख से ज्‍यादा के सैंपल साइज वाली इस स्‍टडी में यह समझने की कोशिश की गई कि पिता के साथ संबंधों का स्‍वरूप फीमेल चाइल्‍ड यानि बेटियों के एडल्‍ट जीवन को किस तरह प्रभावित करता है. इस स्‍टडी पर न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स में अंग्रेजी में जो स्‍टोरी छपी, उसकी हेडलाइन थी- “जब पापा करते हैं घर के काम तो बेटियां चुनती हैं बेहतर कॅरियर.”

अमेरिकन सायकॉलजिस्‍ट सूसन ई. श्‍वार्टज की एक किताब है- द एबसेंट फादर इफेक्‍ट ऑन डॉटर्स (The Absent Father Effect on Daughters: Father Desire, Father Wounds). इस किताब में एक जगह वो लिखती हैं, “वयस्‍क जीवन में स्त्रियों के जीवन व्‍यवहार और विपरीत जेंडर के साथ उनके संबंध पर इस बात का गहरा असर पड़ता है कि बचपन में पिता के साथ उनके रिश्‍ते कैसे थे. मां के साथ उनके रिश्‍तों से यह बात मनोवैज्ञानिक नजरिए से तय नहीं होती.... अनुपस्थित पिताओं का घाव कई बार आजीवन रहता है.”

बच्‍चे के जीवन में पिता की भूमिका और फादर कॉम्‍प्‍लेक्‍स पर मनोविज्ञान में बहुत कुछ लिखा-कहा जा चुका है. सिगमंड फ्रायड और उसके बाद के कई मनोवैज्ञानिकों ने पिता मेल चाइल्‍ड या बेटे के संदर्भ में पिता के रिश्‍ते को को देखने की कोशिश की. फ्रायड ने 1899 में अपनी किताब ‘इंटरप्रिटेशंस ऑफ ड्रीम्‍स’ (Interpretation of Dreams) में पहली बार ओडिपस कॉम्‍प्‍लेक्‍स की थियरी दी. हालांकि बहुत बाद में फ्रायड, उनके समकालीन और उनके बाद के कई सायकोएनालिस्‍टों के काम को पैट्रीआर्कल बताया गया क्‍योंकि इस पूरी थियरी में फीमेल चाइल्‍ड यानि लड़कियों का कहीं जिक्र नहीं था. हार्ल गुस्‍ताव जुंग ने कुछ हद तक लड़के और लड़की दोनों पर पिता के प्रभाव को अपने काम में समझने की कोशिश की, लेकिन फिर भी यह नाकाफी था.   

12 साल पहले हार्वर्ड की एक स्‍टडी में सामने आया यह आंकड़ा काफी चौंकाने वाला था कि अमेरिका में 73 फीसदी महिलाएं ‘डैडी इशु’ की शिकार हैं. किसी न किसी रूप में अपने पिताओं के साथ जटिल संबंधों का असर इन महिलाओं के वयस्‍क जीवन पर पड़ा.

यह एक गंभीर और गहरा विषय है. संभवत: 5000 शब्‍दों का आर्टिकल भी यह समझने के लिए कम है कि एक  मनुष्‍य के मस्तिष्‍क की वायरिंग पर उसके शुरुआती संबंधों का कितना गहरा असर पड़ता है और किस तरह वह उसकी आने वाली पूरी जिंदगी की दिशा तय करता है.

यहां इस बात को विस्‍तार से समझाने के लिए एक कहानी सुनाती हूं. ये कहानी है सेकेंड वेव फेमिनिस्‍ट मूवमेंट का चेहरा, अमेरिका की जानी-मानी फेमिनिस्‍ट और विमेंस राइट्स एक्टिविस्‍ट ग्‍लोरिया स्‍टाइनम की.

ग्‍लोरिया अपने पिता और बचपन के बारे में लिखती हैं, “वो मेरे साथ बहुत आदर से पेश आते और मुझे गंभीरता से लेते थे. मुझे याद नहीं कि उन्‍होंने कभी डांटा हो या अपनी कोई बात मुझ पर थोपने की कोशिश की हो. बहुत बचपन में भी मेरे जीवन से जुड़े किसी फैसले में ये बताने से पहले कि मुझे क्‍या करना है, वो मेरी राय पूछते थे. ये बात इतनी मामूली सी भी हो सकती है कि क्‍या आज शाम मैं पार्क में खेलना पसंद करूंगी या घर में बैठकर किताब पढ़ना या बगीचे में पौधों को पानी देना.”

उनके जीवन पर फिल्‍म बिना रही फिल्‍मकार जूली तैमोर के साथ एक इंटरव्‍यू के दौरान एक सवाल के जवाब में ग्‍लोरिया ने कहा, “आत्‍मसम्‍मान मेरे ऑर्गेनिक सेल्‍फ का हिस्‍सा है. उसके लिए मुझे अलग से कोई श्रम नहीं करना होता. मैं अपना आदर करती हूं क्‍योंकि मेरे पिता ने हमेशा मेरा आदर किया. मैंने बचपन से यही सीखा है.” 

जब जूली तैमोर ग्‍लोलिया स्‍टाइनम के जीवन पर फिल्‍म ग्‍लोरियाज बना रही थीं, उसी वक्‍त की यह लंबी बातचीत है. उस बातचीत में एक जगह जूली कहती हैं, "ये देखना बहुत रोचक है कि अगर ग्लोरिया किसी अजनबी या मित्र पुरुष के साथ किसी अनकंफर्टेबल स्थिति में पड़ जाए, जहां उसे लगे कि उसका सम्मान कम हुआ, या किसी ने खुद को उस पर थोपने की कोशिश की या उसे मैनिपुलेट किया जा रहा है या उसे लगे कि ये ग्रेसफुल जगह नहीं है तो वो क्या करती है. न उसकी आवाज ऊंची होती है, न वो लड़ती है, न शोर मचाती है, न मर्द को सबक सिखाती है. वो बहुत चुपचाप, पूरी गरिमा से उस जगह से दूर हट जाती है. उस कमरे से बाहर निकल जाती है. उस जगह से चली जाती है.”

जूली का जिस बात पर जोर है, वो यह कि कितनी सहजता और सरलता से अपने अनादर को अस्‍वीकार करने, तुरंत अपने साथ खड़े होने का यह भाव ग्‍लोरिया में सहज रूप से आता है, जिसे पाने के लिए सैकड़ों लड़कियां काफी संघर्ष करती हैं.

अपनी मर्जी के खिलाफ कुछ होने,अपमानित होने पर ना कहने की सहजता इस बात से आती है कि बचपन में पिता के साथ आपके संबंधों में कितनी लोकतांत्रिक जगह थी. कितनी बार आपके ना का सम्‍मान किया गया. कितनी बार आपसे पूछा गया कि आप क्‍या चाहती हैं. या आपका बचपन भी उन हजारों-लाखों बच्‍चों की तरह रहा, जहां बड़ों के पास यह विशेषाधिकार सुरक्षित था कि वो बच्‍चों की मर्जी पूछे बगैर उनके जीवन से जुड़ा हर छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा फैसला कर दें.

एडल्‍ट ग्‍लोरिया अपने जीवन से जुड़े फैसले कर पाती हैं क्‍योंकि उस बच्‍ची ग्‍लोरिया को अपने बारे में खुद फैसले लेने की जगह और मौका मिला. उसकी राय को महत्‍व दिया गया.

यही रोल होता है एक पिता का अपनी बेटी की जिंदगी में. ईव इंसलर की किताब ‘एन एपॉलजी’ एक काल्‍पनिक माफीनामा है. उस लंबी चिट्ठी में जो पिता माफी मांग रहा है, वो माफी ईव के पिता नहीं नहीं मांगी थी. वो माफीनामा ईव ने लिखा ताकि वह उस दुख के बोझ से मुक्‍त हो सके, जो वो अपने दिल पर बरसों से लिए फिर रही है.

कठोर, जिद्दी, कंट्रोल करने वाला, अपनी बात थोपने वाला, बच्‍चे की भावनाओं को न समझने वाला, उसका अनादर करने वाला पिता एक लड़की को जीवन भर के घाव दे देता है. इस तरह का व्‍यवहार लड़कों के मनोविज्ञान को भी चोट पहुंचाता है, लेकिन एक पैट्रीआर्कल दुनिया में लंबे समय में स्त्रियों के जीवन पर इस बात का असर ज्‍यादा जटिल होता है. ईव इंसलर ने किताब लिखकर अपना वह घाव खुद भरने की कोशिश की.  

संसार के तमाम दुखों की तरह पीढ़ी दर पीढ़ी अनुपस्थित पिताओं का एक लंबा इतिहास है. बेटियों के बचपन से अनुपस्थित रहे संसार के सारे पिता ‘एन एपॉलजी’ के काल्‍पनिक पिता की तरह यदि अपनी बेटियों से माफी मांगने पर आएं तो शायद संसार के सारे पन्‍ने कम पड़ जाएंगे, लेकिन माफियां पूरी नहीं होंगी.

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