क्राउडसोर्स्ड बर्ड डेटा से थार रेगिस्तान के चार क्षेत्रों का अध्ययन किया जा सकता है: स्टडी

पहले थार रेगिस्तानी क्षेत्र को एक ही पारिस्थितिकीय क्षेत्र माना जाता था, लेकिन हाल ही के अध्ययन ने इसके चार अलग पारिस्थितिकीय क्षेत्रों की पहचान की है: जोकि पूर्वी थार, पश्चिमी थार, संक्रमणीय क्षेत्र और खेती विकसित क्षेत्र हैं.

हाल के दिनों में आईआईटी जोधपुर (IIT Jodhpur) के अध्ययन में थार रेगिस्तानी वातावरण के चार क्षेत्रों को समझने में क्राउडसोर्स्ड (ऑनलाइन) बर्ड डेटा (crowdsourced bird data) एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में सामने आया है. इस शोध में क्राउडसोर्स्ड बर्ड डेटा के महत्व पर जोर दिया गया है, जो रेगिस्तानी वातावरण के क्षेत्रों को समझने, कृषि-खेतों के मानवीय प्रभावों का मूल्यांकन करने और भौगोलिक क्षेत्रों और जैव विविधता के बीच जटिल संबंधों को पता लगाने में एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में सामने आया है. इस डेटा के उपयोग से पक्षी प्रजातियों की जानकारी, कृषि प्रभावों, भूगोल और जैवविविधता के बीच संबंधों के बारे में मूल्यवान जानकारी हासिल किया जा सकता है. इस शोध में ईबर्ड (eBird) के ओपन सोर्स क्राउडसोर्स्ड डेटा का उपयोग किया गया है और इसके सहयोगी भागीदार बीएसबीई विभाग, आईआईटी जोधपुर, सीएसई विभाग, आईआईटी जोधपुर और जोधपुर सिटी नॉलेज एंड इनोवेशन क्लस्टर है.

थार भारतीय रेगिस्तान अपनी अनोखी जैव विविधता और नाजुक वातावरण तंत्र के लिए जाना जाता है. हालांकि, विभिन्न मानवजनित गतिविधियों और व्यापक डेटा की कमी के कारण इस क्षेत्र की वातावरण विशेषताओं और इसके विभिन्न जैविक समुदायों के वितरण की समझ सीमित है. किसी भी क्षेत्र के वातावरण का मूल्यांकन करने के लिए पारंपरिक तरीकों में अक्सर महत्वपूर्ण संसाधनों, समय और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, जिससे पर्याप्त डेटा एकत्र करना और चुनौतीपूर्ण हो जाता है.

इस तरह के शोध की कमी को ध्यान में रखते हुए जोधपुर सिटी नॉलेज इनोवेशन फाउंडेशन से जुड़ी परिस्थितिविज्ञानशास्री डॉ. मानसी मुखर्जी, आईआईटी जोधपुर के कंप्यूटर विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. अंगशुमन पॉल, बायोसाइंस और बायोइंजीनियरिंग विभाग की प्रमुख प्रोफेसर डॉ मिताली मुखर्जी, आईआईटी जोधपुर ने थार रेगिस्तान में चार पारिस्थितिक क्षेत्रों को परिभाषित करने के लिए क्राउडसोर्स्ड वर्ड डेटा को एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में उपयोग करने का सुझाव दिया है.

शोध के महत्व के बारे में बात करते हुए आईआईटी जोधपुर के बायोसाइंस और बायोइंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर और हेड डॉ. मिताली मुखर्जी ने कहा, "थार एक प्राकृतिक लैबोरेटरी के रूप में कार्य करता है, जो यहां के घटकों एवं प्रजातियों के पनपने, उनकी परस्परता और समूचे वातावरण तंत्र के संरक्षण के लिए नवाचारी 'डिज़ाइंस' की सुविधा प्रदान करता है.“

पहले थार रेगिस्तानी क्षेत्र को एक ही पारिस्थितिकीय क्षेत्र माना जाता था, लेकिन हाल ही के अध्ययन ने इसके चार अलग पारिस्थितिकीय क्षेत्रों की पहचान की है: जोकि पूर्वी थार, पश्चिमी थार, संक्रमणीय क्षेत्र और खेती विकसित क्षेत्र हैं.

शोध के परिणाम निम्नलिखित हैं:

  • खेती योग्य क्षेत्र को तीन दूरस्थ भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित पाया गया है, इसमें मानवीय गतिविधियों के कारण पर्यावरण विखंडन का हुआ है जोकि पारिस्थितिकीय क्षेत्र के एक नए उभरते हुए स्वरूप की ओर इशारा कर रहा है.

  • खेती विकसित क्षेत्र में सबसे कम विविधता (α विविधता) और प्रजाति संरचना में सबसे अधिक परिवर्तन (β विविधता) देखा गया है, जिससे इस क्षेत्र की अद्वितीय जैव विविधता के संरक्षण के लिए इस क्षेत्र में पुनर्स्थापना के प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया गया है.

  • यह अध्ययन क्राउडसोर्स्ड (ऑनलाइन) बर्ड डेटा की महत्व पर जोर देता है जो पारिस्थितिकीय क्षेत्रों को समझने, कृषि-खेतों के प्रभाव का मूल्यांकन करने और भौगोलिक क्षेत्रों और जैव विविधता के मध्य एक पारिस्थितिकीय प्रणाली में संबंध की जांच करने में सहयोग प्रदान करता है इसलिए इसका उपयोग मूल्यवान साधन के रूप में किया जा सकता है.

भविष्य के अध्ययन हेतु रेगिस्तानी इकोसिस्टम में बायोटा आधारित स्थिरता आकलन को बढ़ाने व विभिन्न पोषक स्तरों में स्थानीय विभिन्नता की खोज पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा. इसके अतिरिक्त संरक्षण योजना हेतु पारिस्थितिकी क्षेत्रों की सूक्ष्म इकाइयों के अंतर्गत उपस्थित विभिन्नता, स्थिरता व दीर्घकालिक स्थिरता पर उनके प्रभाव की जांच करना और उनकी व्यापक समझ रखना महत्वपूर्ण है.

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