भारतीय मूल के साइंटिस्ट ने की 3डी प्रिंट से असली त्वचा बनाने की खोज

भारतीय मूल के साइंटिस्ट ने की 3डी प्रिंट से असली त्वचा बनाने की खोज

Tuesday November 05, 2019,

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अमेरिका में रेनेस्सेलाएर पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप कार्यरत भारतीय मूल के वैज्ञानिक पंकज करांदे ने रक्त वाहिकाओं से लैस 3डी प्रिंट वाली सजीव त्वचा तैयार करने का एक तरीका खोज निकाला है, जिसका निकट भविष्य में अरबों डॉलर के 3डी बायोप्रिंट मार्केट पर तो व्यापक असर पड़ेगा ही, इससे मानव के प्रतिकृत अंग मिलना आसान हो जाएगा।  

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अमेरिका में रेनेस्सेलाएर पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप कार्यरत भारतीय मूल के वैज्ञानिक पंकज करांदे ने रक्त वाहिकाओं से लैस 3डी प्रिंट वाली सजीव त्वचा तैयार करने का एक तरीका खोज निकाला है। यह प्राकृतिक त्वचा जैसी प्रतिकृति बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक रिसर्च माना जा रहा है। इससे निकट भविष्य में एक दो 3डी बायोप्रिंट मार्केट पर व्यापक असर पड़ने वाला है, साथ ही मानव के प्रतिकृत अंग मिलना आसान हो जाएगा। मार्केट रिसर्च कंपनी ग्रैंड व्यू रिसर्च इन्कॉरपोरेशन के मुताबिक, वर्ष 2026 तक 3डी बायोप्रिंटिंग का बाजार 4.1 अरब डॉलर का हो जाएगा। 3डी बायोप्रिंटिंग बहुत तेज गति से बढ़ रही है। इस गति के लिहाज से मानव अंग हासिल करने के लिए प्रतीक्षा सूची अब बीते समय की बात हो जाएगी। इस बीच इजरायली वैज्ञानिकों ने बायो-प्रिंटिंग से ऐसा मानव हृदय तैयार किया है, जिसमें सभी कोशिकाएं, रक्त वाहिनियां, वेंट्रीकल्स और चेम्बर्स हैं। 


मेडिकल फील्ड को इस किस्म की 3डी बायोप्रिंटिंग से काफी उम्मीदें हैं क्योंकि विभिन्न देशों में इस तकनीक के जरिये मानव अंगों का निर्माण करने के प्रयासों को सफलता मिल रही है। भविष्य में, जटिल वैस्कुलर सिस्टम के साथ पूर्ण अंगों की प्रिंटिंग संभव होगी और लाखों मरीजों के लिए अंग उपलब्ध होंगे जो किडनी प्रत्यारोपण, हृदय प्रत्यारोपण, लिवर प्रत्यारोपण और फेफडा प्रत्यारोपण के लिए प्रतीक्षा सूची में हैं। एडवांस्ड 3डी बायोप्रिंटिंग शरीर के नए अंग और मॉडल अंग बनाने में भी सहायक होगी। अंगों का आकार बनाकर रखना और वातावरण को बनाने से अंगों के विकास में मदद मिलती है। यही पहले सबसे बड़ी बाधा थी। हल यह है कि एक ठीक बायोलिंक बनाई जाए। सैद्धांतिक रूप से 3डी बायोप्रिंटिंग में अंग प्रत्यारोपण की व्यापक संभावनाएं हैं। असल में ये अंग शरीर के भीतर कैसे काम करेंगे इसका प्रयोग वैज्ञानिकों द्वारा किया जाना बाकी है। एक बार जब वैज्ञानिक असल आकार के अंग प्रिंट करने लगेंगे तो चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांति हो जाएगी।


साइंटिस्ट पंकज करांदे बताते हैं कि हाल फिलहाल, क्लिनिकल उत्पाद के रूप में जो कुछ उपलब्ध है, वह एक फैन्सी बैंड-एड की तरह है। यह जख्मों को तेजी से ठीक करने जैसी पद्धति मुहैया कराता है लेकिन यह मेजबान कोशिकाओं के साथ कभी एकीकृत नहीं होता। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि हम जानते हैं कि रोपी गई चीज में असल में रक्त और पोषक तत्वों का स्थानांतरण हुआ जो रोपी गई चीज को जीवित रख रहे हैं। चिकित्सा स्तर पर इसे इस्तेमाल योग्य बनाने के लिए शोधकर्ताओं को सीआरआईएसपीआर जीन संपादन प्रौद्योगिकी जैसी चीज का इस्तेमाल करते हुए दानदाताओं की कोशिकाओं को संपादित करने में समर्थ होने की जरूरत है, जिससे वाहिकाएं एकीकृत हो सकें और रोगी के शरीर द्वारा स्वीकार की जा सकें।

 




करांदे बताते हैं कि अभी हम उस स्थिति में नहीं हैं, लेकिन उसके करीब हैं। आग से झुलसे रोगियों से जुड़ी तंत्रिकाएं और वाहिकाएं खत्म हो जाने जैसी चुनौतियों के समाधान के लिए अधिक काम किए जाने की जरूरत है। हालांकि उनकी टीम शोधकर्ताओं को मधुमेह या प्रेशर अल्सर जैसी बीमारी से पीड़ित लोगों की मदद करने के करीब लाया है। त्वचा प्रतिरूप में कार्यशील संवहनी प्रणाली की अनुपस्थिति एकीकरण में महत्वपूर्ण बाधा रही है। यदि रक्त वाहिकाओं के अंदर रहने वाली मनुष्य की एंडोथीलियल कोशिकाओं के इर्द-गिर्द रहने वाली पेरिसाइट कोशिकाओं समेत महत्वपूर्ण तत्वों को जानवरों के कोलेजन और त्वचा ग्राफ्ट के अंदर पाई जाने वाली संरचनात्मक कोशिकाओं के साथ जोड़ दिया जाए तो वे संदेश देना शुरू कर देती हैं। कुछ हफ्तों के अंदर ऐसी कोशिकाएं जैविक रूप से योग्य संवहनी संरचना बनाती हैं।


त्रिआयामी (3डी) बायोप्रिंटिंग प्राकृतिक ऊतकों जैसी विशेषताओं वाली जैव चिकित्सा प्रतिकृति गढ़ने के लिए कोशिकाओं, वृद्धि कारकों और जैव सामग्री को आपस में जोड़ती है। अमेरिका के याले स्कूल ऑफ मेडिसिन की एक टीम ने जब संरचना को एक विशेष प्रकार के चूहों में लगाया तो 3डी प्रिंट वाली त्वचा की वाहिकाओं ने संदेश देना और चूहों की कोशिकाओं से जुड़ना शुरू कर दिया। इस खोज से संबंधित शोध के परिणाम ‘टिश्यू इंजीनियरिंग पार्ट ए’ पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। 3डी या थ्री डायमेंशनल प्रिंटिंग में लंबाई, चौ़ड़ाई, ऊंचाई और गहराई में से तीन आयामों को लेकर किसी ठोस वस्तु (सॉलिड ऑब्जेक्ट्स) का डिजाइन कंप्यूटर पर तैयार किया जाता है और डिजाइन के मुताबिक अलग-अलग लेयर्स में उन्हें जोड़कर वस्तु का निर्माण किया जाता है। आमतौर पर 3डी प्रिंटर प्लास्टिक का उपयोग करते हैं, क्योंकि इसका उपयोग आसान और सस्ता है। कुछ 3डी प्रिंटर अन्य सामग्री जैसे धातु और सिरैमिक के साथ भी 3डी प्रिंट कर सकते हैं। 


3डी प्रिंटिंग ने अपने संक्षिप्त इतिहास में तेजी से सफर किया है- जिसका चिकित्सा जगत पर स्पष्ट प्रभाव है। वर्ष 1983 में चार्ल्स हल ने एक छोटा काला अंजन (आईवाश) कप 3डी प्रिंट किया। यह दुनिया की पहली 3डी प्रिंटेड चीज थी। वर्ष 1986 में उन्होंने अमेरिका के साउथ कैरोलिना में इस टेक्नोलॉजी यानी स्टीरियोलिथोग्राफी को पेटेंट करवाया और 3डी सिस्टम बनाया। महज 13 वर्ष बाद, 1996 में टेक्सस के सर्जन ने अमेरिका के विल्फोर्ड हाल मेडिकल सेंटर में हल की कंपनी की इस तकनीक का उपयोग करके जुड़वा का मॉडल बनाया। इस मॉडल का उद्देश्य था कि इन दोनों को अलग करने की रणनीति बनाने में सफलता पाई जाए। आखिर में, सर्जन इसे करने में सफल हुए और प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोनों बच्चे चल सकने के योग्य थे। तभी से वैज्ञानिकों ने 3डी बायोप्रिंटिंग का उपयोग स्टंट और स्प्लिंट बनाने में किया, जो अब व्यावसायिक रूप से चलन में हैं। वर्ष 2002 में वैज्ञानिक एक छोटी किडनी बनाने में सफल रहे। अब महज 17 वर्ष बाद, वैज्ञानिकों ने हृदय के प्रिंट में सफलता प्राप्त की है।





यद्यपि, इसका आकार खरगोश के हृदय के आकार का है लेकिन इस सफलता में बहुत व्यापक संभावनाएं छिपी हैं और यह मानव के सुप्रयोग का अद्भुत नमूना है। फ्रीडम रिवर्सिबल इम्बेडिंग ऑफ सस्पेंडेड हाइड्रोजेल्स, संक्षेप में 'फ्रेश" बायोप्रिंटिंग की सबसे लोकप्रिय तकनीक के रूप में 3 डी इमेजिंग का उपयोग करके काम करती है। एमआरआई या सीटी स्कैन से उस अंग की 3 डी इमेज निकल आती है जिसे प्रिंट करना होता है। इसके बाद वैज्ञानिक जैविक मटेरियल जैसे अल्जीनेट, कॉलेजन, जिलेटिन, हायल्यूरोनिक एसिड की मदद से अन्य किसी भी अंग का प्रिंट बनाते हैं।


3डी बायोप्रिंटिंग में बायोलॉजिकल मटेरियल, बायोकेमिकल्स और जीवित कोशिकाओं की परत दर परत बहुत सूक्ष्मता से पोजिशनिंग की जाती है। यह इनके क्रियाशील हिस्सों पर पूरे त्रिविमीय नियंत्रण के साथ की जाती है और इसके सहारे 3-डी ढांचा खड़ा हो जाता है। 3 डी बायोप्रिंटिंग के कई तरीके हैं जिनमें बायोमिमिक्री, ऑटोनोमस सेल्फ असेंबली और बिल्डिंग ब्लॉक्स शामिल हैं। बायोमिमिक्री में किसी भी अंग के सूक्ष्म वातावरण की बारीक से बारीक समझ का ख्याल रखा जाता है और उसी के अनुरूप बिल्कुल उसी तरह का अंग तैयार किया जाता है।