जिंदगी की जंग हार गईं देश की पहली महिला डीजीपी कंचन चौधरी भट्टाचार्य

जिंदगी की जंग हार गईं देश की पहली महिला डीजीपी कंचन चौधरी भट्टाचार्य

Friday August 30, 2019,

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किरण बेदी के बाद कंचन चौधरी भट्टाचार्य देश की दूसरी ऐसी महिला आईपीएस रहीं, जो वर्ष 2004 में देश की पहली महिला डीजीपी बनी थीं। हिमाचल की रहने वाली चौधरी ने रिटायर्ड होने के बाद हरिद्वार से लोकसभा चुनाव भी लड़ा। देहरादून में साइकिल से गिरकर घायल होने के बाद वह हाल ही में मुंबई चली गई थीं, जहां एक अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली।

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देश की पहली महिला डीजीपी कंचन चौधरी भट्टाचार्य


31 अक्टूबर 2007 को उत्तराखंड पुलिस महानिदेशक पद से सेवा निवृत्त हुईं देश की पहली महिला डीजीपी और किरण बेदी के बाद 1973 बैच की देश की दूसरी महिला आईपीएस कंचन चौधरी भट्टाचार्य (72) अब इस दुनिया में नहीं रहीं। कुछ महीने पहले वह देहरादून प्रवास के दौरान साइकिल से गिरकर घायल हो जाने से कुछ समय बेड रेस्ट के बाद मुंबई अपने पति के पास चली गईं थीं, जहां उन्होंने मुंबई के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली।


कंचन की दो बेटियां हैं। स्वभाव से अत्यंत सहज कंचन चौधरी ने उत्तराखंड में अपने कार्यकाल के दौरान पुलिस के लिए कई अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किए। मूलतः हिमाचल प्रदेश की रहने वाली चौधरी भारतीय पुलिस सेवा में यूपी कैडर से आई थीं। वर्ष 2004 में वह उत्तराखंड में देश की पहली महिला पुलिस महानिदेशक बनीं। एक जमाने में दूरदर्शन का सर्वाधिक चर्चित रहा धारावाहिक 'उड़ान' कंचन चौधरी भट्टाचार्य की ही जिंदगी पर आधारित था, जिसका निर्माण उनकी बहन कविता चौधरी ने किया था। 


कंचन चौधरी भट्टाचार्य की शुरुआती शिक्षा अमृतसर (पंजाब) के राजकीय महिला महाविद्यालय से हुई। उसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर किया। सर्विस या पब्लिक लॉइफ वह जितनी सहज, मिलनसार, अपनी ड्यूटी और विचारधारा में उतनी ही शख्त रहीं। वह कहती थीं कि हरिद्वार से उनका खून का रिश्ता था। उनके नाना मुकंदलाल शाह हरिद्वार के ही रहने वाले थे। उनके नाना समाजसेवी थे और उन्होंने कई आश्रमों और ट्रस्टों को जमीन दान में दी।


चौधरी पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री को अपना आदर्श मानती थीं। वर्ष 2014 में उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा और आम आदमी पार्टी की ओर से उन्होंने हरिद्वार लोकसभा सीट पर चुनाव भी लड़ा लेकिन जीत नहीं सकीं। उसके बाद वह हमेशा के लिए सियासत की दुनिया से अलग हो गईं। 


वह कहती थीं कि

'देश में फैले भ्रष्टाचार, नेताओं के घोटाले और आम आदमी की पीड़ा को देखते हुए उन्होंने राजनीति में आने का फैसला लिया। पुलिस के पास पॉवर तो है, लेकिन खादी वाले उसे प्रयोग नहीं करने देते। यदि पुलिस को उनकी पॉवर दे दी जाए तो वह और बेहतर काम कर सकती है। इसी व्यवस्था ने मेरे मन को शांत नहीं रहने दिया। इसलिए मैं राजनीति में आई हूं।'


वह कहती थीं कि लीडर का मतलब पालक होता है। उसकी तुलना मां से भी की जाती है। लीडर में निर्णय लेने की तीव्र क्षमता, सर्वत्यागी, निस्वार्थ भावना से प्रेरित, दृढ़ इच्छा शक्ति होने के साथ ही वह सर्वगुण संपन्न का होना चाहिए ताकि जनता की समस्याओं को ताकत से उठा सके। लीडर को कभी अहंकार में नहीं रहना चाहिए।


कंचन चौधरी को वर्ष 2004 में मेक्सिको में आयोजित इंटरपोल सभा में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा गया था। वर्ष 1997 में उन्हें राष्ट्रपति पदक मिला।