मिलें तिहाड़ में रेप के दोषी 142 कैदियों का इंटरव्यू करने वाली मधुमिता पांडेय से

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ब्रिटेन के शेफील्ड हॉलम विश्वविद्यालय में अपराधशास्त्र की लेक्चरर मधुमिता पांडेय निर्भया कांड के बाद से अब तक तिहाड़ जेल के 142 ऐसे कैदियों पर रिसर्च कर चुकी हैं, जो रेप के आरोप में सजा काट रहे हैं। उन्होंने ये रिसर्च इंटरव्यू 22 साल की उम्र में शुरू किया था, जिसके सात साल गुजर चुके हैं।  


मधुमिता पांडेय (फोटो क्रेडिट: WashingtonPost)


दिल्ली के निर्भया कांड के बाद तिहाड़ जेल में लगभग डेढ़ सौ बलात्कारियों के इंटरव्यू करने वाली मधुमिता पांडेय बताती हैं कि ऐसे कैदियों से बातचीत के पीछे उनका मकसद डॉक्टरल थीसिस है। इस साहसिक रिसर्च में उन्हे पता चला है कि ऐसी घटनाओं की वजह भारतीय समाज में पुरुषवादी मानसिकता है।

मधुमिता पांडेय इस समय ब्रिटेन के शेफील्ड हॉलम विश्वविद्यालय में अपराधशास्त्र की लेक्चरर हैं। वह बताती हैं कि निर्भया कांड के बाद वह अंदर से हिल गई थीं। वह रेप करने वाले उन पुरुषों से मिलकर देखना चाहती थीं, ऐसा करने वालों की सोच कैसी होती है, ऐसा उन्होंने क्यों किया। किसी भी महिला को अपना शिकार बनाकर, बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देते वक्त उनके मन में क्या चल रहा होता है। क्या ये आम इंसानों से अलग होते हैं, इनकी प्रवृति कैसी होती है?

मधुमिता जब भारत आकर पहली बार बलात्कारियों के साक्षात्कार लेने के लिए दिल्ली के तिहाड़ जेल गई थीं, उस समय उनकी उम्र 22 साल थीं। उस समय वह यूनाइटेड किंगडम की एंजला रस्किन यूनिवर्सिटी से क्रिमिनोलॉजी की पढ़ाई कर रही थीं। उसी दौरान वर्ष 2012 में दिल्ली में वह दिल दहला देने वाली घटना हुई।

उस दर्दनाक वाकये ने उनको रेप के आरोपियों की मानसिकता पर रिसर्च करने के लिए मजबूर कर दिया। एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में उनका रिसर्च इंटरव्यू 2013 में शुरू हुआ। वह जानना चाहती थीं कि आखिर ये वहशी किस्म के लोग कैसे आसानी से एक पल में किसी भी महिला की ज़िंदगी बर्बाद कर देते हैं? वह तिहाड़ जेल में ऐसे कैदियों के साथ करीब एक सप्ताह रहीं।



मधुमिता कहती हैं, एक 49 साल का कैदी, जिसने एक पांच वर्षीय लड़की का रेप किया था, वो अपने पाप पर दुख जताते हुए कहता है, 'हां मैं बुरा महसूस करता हूं। मैंने उसका जीवन बर्बाद कर दिया। अब वो तो बड़ी हो गई होगी, कोई भी उससे शादी नहीं करेगा लेकिन मैं उसे स्वीकार करूंगा। जब मैं जेल से बाहर आऊंगा, तब मैं उससे शादी करूंगा।'

सोचिए जरा रेप के लिए सजा काट रहा कैदी है, अब भी उसी सदियों पुरानी सोच में जी रहा है, जो रेप का कारण है। उसको अब भी लगता है कि एक लड़की का अस्तित्व सिवाय उसके जिस्म के अलावा कुछ भी नहीं। अगर उसकी 'इज्जत' चली गई तो उसका जीवन भी खत्म। उस कैदी की इस प्रतिक्रिया ने मधुमिता को इतना धक्का पहुंचाया कि वो उस पीड़िता के बारे में पता करने के लिए मजबूर हो गईं। इस व्यक्ति ने साक्षात्कार में लड़की के ठिकानों का विवरण दिखाया था।

जब मधुमिता ने उस लड़की की मां को ढूंढ निकाला, तब वो ये जानकर और भी आश्चर्य में पड़ गईं कि उस लड़की के परिवार को यह भी नहीं बताया गया था कि उनकी बेटी का बलात्कारी जेल में है। मधुमिता बताती हैं कि वह भी नई दिल्ली में पली-बढ़ी हैं। निर्भया कांड के बाद से उनको दिल्ली का चेहरा अलग सा, हिंसक, क्रूर, अमानवीय नजर आने लगा। उन्होंने सोचा कि मन में घुमड़ते सवालों से वह क्यों न सीधे मुठभेड़ करें। वह क्यों न अपने सवाल सीधे रेप के आरोपियों से ही पूछें।

जब वह बलात्कारियों से मिलीं तो अधिकतर को यह नहीं पता था कि उन्होंने रेप किया है। वहां मिले अधिकांश पुरुष अशिक्षित थे, कुछ ने ही हाईस्कूल तक की पढ़ाई की थी। बहुत से तीसरे या चौथे ग्रेड के ड्रॉपआउट मिले। जब वह उन पर स्टडी करने पहुंचीं तो उनको यकीन था कि वे सब राक्षस हैं, लेकिन जब उनसे बातचीत करने लगीं तो पता चला कि वे तो हमारे ही बीच के वहशी किस्म के इंसान हैं।



मधुमिता कहती हैं कि भारतीय परिवारों में यहां तक कि अधिक शिक्षित परिवारों में भी, महिलाएं अक्सर परंपरागत भूमिकाओं के लिए बाध्य होती हैं। यहां तक कि वो अपने पति का नाम लेकर बुला तक नहीं सकतीं। एक प्रयोग के रूप में उन्होंने कुछ दोस्तों को फोन किया और पूछा, तुम्हारी मां तुम्हारे पिता को क्या कहती हैं? मुझे जो जवाब मिलते थे वह थे, 'आप सुन रहे हैं,' 'सुनो,' या 'चिंटू के पिता'

उन रेप के दोषियों से बातचीत करने के अनुभवों के बीच उन्होंने जाना कि उन लोगों में से बहुत से लोग यह नहीं जानते कि उन्होंने जो किया है, वह बलात्कार है। उन्हें समझ नहीं आता कि सहमति क्या है। अपने सवालों के ऐसे जवाब मिलने से वे तो हैरान रह गई थीं कि क्या यह सिर्फ ये ही पुरुष ऐसे हैं? या पुरुषों का विशाल बहुमत ही ऐसा है?

भारत में सामाजिक व्यवहार बहुत रूढ़िवादी हैं। स्कूल पाठ्यक्रमों में यौन शिक्षा छोड़ दी जाती है। यहां पर नीति बनाने वालों का मानना है कि ऐसे विषयों को पढ़कर युवा भ्रष्ट हो सकते हैं और पारंपरिक मूल्यों को अपमान कर सकते हैं।


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