ताकि हर मासूम अपनी आंखों से देख सके ये रंगों भरी दुनिया, शुरू हुआ मायोपिया जागरूकता अभियान

By yourstory हिन्दी
November 15, 2022, Updated on : Tue Nov 15 2022 11:48:35 GMT+0000
ताकि हर मासूम अपनी आंखों से देख सके ये रंगों भरी दुनिया, शुरू हुआ मायोपिया जागरूकता अभियान
भारत में 14 से 20 नवम्बर तक राष्ट्रीय मायोपिया सप्ताह मनाया जाता है. भारत में स्कूल जाने वाले लगभग 13 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे मायोपिया के शिकार हैं.
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भारत में मायोपिया महामारी के रूप में बढ़ रहा है और बच्चे भी मायोपिया से ज्यादा संख्या में पीड़ित हो रहे हैं. इसी पर सबका ध्यान खींचने के लिए एंटोड फार्मास्युटिकल्स अपनी संस्था एंटोड आई हेल्थ फाउंडेशन द्वारा चलाये जाने वाले एक हफ्ते के मायोपिया जागरूकता अभियान को सपोर्ट कर रहा है. 14 से 20 नवम्बर तक यह जागरूकता अभियान चलेगा. इस अभियान में स्ट्रैबिस्मस एंड पीडियाट्रिक ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (एसपीओएसआई) की भी हिस्सेदारी है.


भारत में 14 से 20 नवम्बर तक राष्ट्रीय मायोपिया सप्ताह मनाया जाता है. मायोपिया के कारण हर साल छोटे-छोटे लाखों बच्चे नज़र सम्बन्धी बीमारी का का शिकार हो रहे हैं. युवावस्था से लेकर वयस्कता के दौरान मायोपिया कई गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है. इन गंभीर समस्याओं में मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, रेटिना डिटेचमेंट, मायोपिक मैकुलोपैथी, और मायोपिक स्ट्रैबिस्मस फिक्सस शामिल है.


हाल ही में हुई एक स्टडी में खुलासा हुआ है कि भारत में स्कूल जाने वाले लगभग 13 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे मायोपिया के शिकार हैं. यह संख्या पिछले कुछ सालों में दोगुनी हो गई है. इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के बढ़ते बहुत ज्यादा उपयोग की वजह से ऐसा हो रहा है.


ऐसा पहली बार हो रहा है कि इस तरह का अभियान भारत के विभिन्न टियर-I और टियर-II शहरों में चलाया जा रहा है. इस अभियान में आंखों के डॉक्टरों और फार्मा इंडस्ट्री के बड़े-बड़े लोग तथा कम्पनियाँ सहयोग दे रही हैं. इस अभियान का प्रमुख फोकस जागरूकता फैलाना और माता-पिता को एक साल में कम से कम एक बार अपने बच्चों की आंखों की जांच कराने के लिए प्रोत्साहित करना है. मायोपिया के विभिन्न पहलुओं पर माता-पिता और बच्चों को शिक्षित करने के लिए कंपनी आँखों के बाल रोग विशेषज्ञ के साथ मिलकर काम करेगी.


एंटोड फार्मास्युटिकल्स के सीईओ & राष्ट्रीय मायोपिया सप्ताह के अभियान अध्यक्ष श्री निखिल मासुरकर ने मायोपिया के बढ़ते चलन और रोकथाम पर अपनी राय रखते हुए कहा, "मायोपिया भारत में बढ़ती हुई एक प्रमुख समस्या है और अगर इसको रोकने के लिए जरूरी रोकथाम और कार्रवाई नहीं की गयी तो यह एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन जाएगी. इसके अलावा कोविड-19 ने काफी हद तक इस समस्या की भयावहता को बढ़ा दिया है जिससे देश के हेल्थकेयर सिस्टम पर मायोपिया का बोझ बढ़ गया है.


दुनिया भर में हुए रिसर्च से पता चला है कि कोविड-19 लॉकडाउन के कारण बारीक चीजों को करने की गतिविधियों में वृद्धि हुई है, जिससे आँखों पर जोर पड़ा है. इस दौरान बच्चों द्वारा बाहर कम समय बिताने के कारण उनमें मायोपिया बढ़ा है. समाज में किसी भी बदलाव की शुरुआत एक आवाज से होती है. इसलिए आंखों की देखभाल करने वाले डॉक्टरों और इंडस्ट्री पार्टनर की एक सामूहिक आवाज बनकर जागरूकता बढ़ाना और मायोपिया के बारे में माता-पिता और बच्चों को क्लीनिक तक लाना बहुत जरूरी बन गया है. भारत भर से 5 लाख से ज्यादा बच्चों तक पहुँचने का लक्ष्य रखने वाले इस हफ्ते भर चलने वाले अभियान में हमारी कोशिश यह रहेगी कि हम मायोपिया से लड़ने के लिए लोगों को अपनी आँखों की जांच कराने और अच्छी आदतों को अपनाने को बढ़ावा दिया जाए."


मायोपिया जागरूकता अभियान का उद्देश्य मायोपिया के बारे में जागरूकता बढ़ाना और माता-पिता को साल में कम से कम एक बार अपने बच्चों की आंखों की जांच कराने के लिए प्रोत्साहित करना है:


- मायोपिया की शुरुआत होने के ख़तरे के बारे में लोगों को बताना

- जो पहले से ही मायोपिया से पीड़ित हैं उन्हें मायोपिया के बढ़ने के बारे में सूचित करना

- मायोपिया का प्रबंधन अच्छे तरीके से करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करना


स्ट्रैबिस्मस एंड पीडियाट्रिक ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (एसपीओएसआई) के सेक्रेटरी डॉ पी के पांडे ने कहा, "ज्ञात और अज्ञात कारणों से विशेष रूप से एशियाई क्षेत्रों में मायोपिया की घटनाओं में बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी हो रही है. यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में मायोपिया की घटना लगभग 8 प्रतिशत प्रति दशक की दर से तेजी से बढ़ रही है और 2050 तक लगभग आधी आबादी के मायोपिया से पीड़ित होने का अनुमान है.


डीजेनरेटिव मायोपिया के केस भी बढ़ने वाले हैं. आने वाले समय में डीजेनरेटिव मायोपिया सम्पूर्ण मायोपिया के केस का 10 प्रतिशत तक हो सकता है. गंभीर मायोपिया से मायोपिक कोरियोरेटिनल डिजेंनरेटिव बदलाव, मोतियाबिंद, ओपन-एंगल ग्लूकोमा और अन्य चीजों के साथ मायोपिया से जुड़े स्ट्रैबिस्मस भी हो सकता है. जब आँखों की ऐसी समस्याएं बढेंगी तो देश के हेल्थकेयर सिस्टम पर बोझ बढ़ेगा.


समाज इससे वित्तीय, सामाजिक और शैक्षिक रूप से प्रभावित होगा. एंटोड द्वारा चलाए गए अभियान का प्रमुख फोकस जनता में मायोपिया को लेकर जागरूकता फैलाना और माता-पिता को साल में एक बार अपने बच्चों की आंखों की जांच कराने के लिए प्रोत्साहित करना है. जांच के बाद बच्चों को डॉक्टरों से भी दिखाना जरूरी है. एसपीओएसआई संस्था जनता के बीच फैलने वाले इस बीमारी की रोकथाम तथा जागरूकता के लिए एंटोड आई हेल्थ फाउंडेशन के साथ सहयोग करके बहुत खुश हैं. हम उम्मीद करते है कि यह अभियान अपने निर्धारित टारगेट और उद्देश्यों को पूरा करेगा."


Edited by Anuj Maurya

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