'पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया' की तर्ज पर गरीब और वंचित बच्चों को शिक्षा देने में जुटे 22 साल के शांतनु

'पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया' की तर्ज पर गरीब और वंचित बच्चों को शिक्षा देने में जुटे 22 साल के शांतनु

Wednesday November 06, 2019,

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"22 साल के शांतनु शर्मा मेरठ के रहने वाले हैं और बीटेक फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रहे हैं। शुरू से ही सामाजिक कामों में रूचि रखने वाले शांतनु ने दो साल पहले अपने 5 दोस्तों के साथ मिलकर 'उद्गम फाउंडेशन' बनाया, जिसका उद्देश्य शिक्षा से वंचित बच्चों तक आसानी से शिक्षा पहुंचाना है।"

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बच्चों के साथ शांतनु और उनकी टीम

यह बात सभी जानते हैं कि शिक्षा केवल एक इंसान के ही नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र के विकास में योगदान देती है। बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर ही एक राष्ट्र की मजबूत नींव तैयार की जा सकती है। हमारे देश के लिए गरीबी और भूखमरी के अलावा अशिक्षा भी बड़ी समस्या है। देश में कई सरकारें आईं और गईं लेकिन अशिक्षा की समस्या अभी भी जस की तस बनी हुई है। बच्चों को आधारभूत शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है।


हालांकि केवल सरकार के योजना बनाने से ही सब कुछ नहीं होता है, बल्कि लोगों में भी जागरूकता होनी चाहिए। इसके लिए समाज में शांतनु शर्मा जैसे युवाओं का होना बहुत जरूरी है। 

 

22 साल के शांतनु शर्मा मेरठ के रहने वाले हैं और वे बीटेक फाइनल इयर की पढ़ाई कर रहे हैं। शुरू से ही सामाजिक कामों में रूचि रखने वाले शांतनु ने दो साल पहले अपने 5 साथियों के साथ मिलकर उद्गम फाउंडेशन बनाया। इस फाउंडेशन का उद्देश्य शिक्षा से वंचित बच्चों तक शिक्षा पहुंचाना था।


योरस्टोरी से बात करते हुए शांतनु कहते हैं,

'मैंने कई बच्चों को सड़क पर भीख मांगते और गुब्बारे बेचते देखा था। मुझे ये सब बहुत बुरा लगता था। मैं उन्हें स्कूल जाते देखना चाहता था। वहीं से मैंने फाउंडेशन बनाने के बारे में सोचा।'


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शांतनु शर्मा

उद्गम फिलहाल उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के आसपास के 5 गांवों में काम कर रहा है। यह गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को फ्री में शिक्षा उपलब्ध कराता है।


इसके लिए मेरठ के आसपास के 5 गांवों में उद्गम की क्लासेज चलती हैं। वहां गरीब बच्चों को शांतनु और उनके साथी पढ़ाते हैं।

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों

अपनी शुरुआत के बारे में योरस्टोरी से बात करते हुए शांतनु कहते हैं,

'मैं शुरू से ही समाज के लिए कुछ करना चाहता था। मैं पहले एक एनजीओ के साथ स्वच्छ भारत अभियान में काम कर रहा था। मैंने नोटिस किया कि कई बच्चे हैं जो अपनी आर्थिक स्थिति के कारण स्कूल नहीं जा पाते और शिक्षा से दूर रह जाते हैं।'


दो साल पहले शांतनु ने शिक्षा के क्षेत्र में काम करना शुरू किया। उन्होंने अपने 5 साथियों आदित्य सिंह, दीपांशु, कौशल, प्रशांत और दुर्गेश के साथ मिलकर आसपास के 5 गांवों के 100 घरों में जाकर बच्चों से बात की। वहां जाने से उन्हें पता चला कि बच्चों को आधारभूत शिक्षा नहीं मिल पा रही।


इसके बाद शांतनु ने अगस्त 2018 में उन बच्चों को पढ़ाई की ओर ले जाने के लिए वॉलंटिअर्स क्लासेज शुरू कीं। इनमें गरीब और पढ़ाई से वंचित बच्चों को रोज 2 घंटे पढ़ाया जाता है। पढ़ाई के अलावा क्लास में बच्चों को स्टेशनरी, जूते और बैग जैसे सामान भी दिए जाते हैं।

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छोटी टीम के लिए पैसे खर्च करना थोड़ा मुश्किल था। इसके लिए शांतनु की टीम ने चाइल्ड एजुकेशन एडोप्शन प्रोग्राम शुरू किया। इस प्रोग्राम के तहत गांव के लोग किसी भी एक बच्चे का पूरे साल का खर्च उठा सकते हैं। इसके लिए उन्हें 1500 रुपये देने पड़ते हैं।


वर्तमान में उद्गम की 5 क्लास हैं जो छज्जुपुर, डिमोली, ढींढाला, सोरखा, अंजोली गांव में चलाई जाती हैं। उद्गम फाउंडेशन को छज्जुपुर के एक निजी स्कूल संचालक के. पी. चौधरी से काफी सहयोग मिल रहा है।



फिलहाल फाउंडेशन में कुल 20 सदस्य हैं। इसी साल अप्रैल में फाउंडेशन ने स्लम एजुकेशन प्रोग्राम की शुरुआत की है। इसमें फाउंडेशन के मेंबर मेरठ के लाल कुर्ती स्लम एरिया के बच्चों को पढ़ाते हैं। इसके लिए इलाके के खुले मैदान में एक टीन शेड की क्लास बनाई गई और बस्ती के बच्चों को क्लास में आने के लिए प्रेरित किया जाता है।


क्लास में बच्चों को बेसिक शिक्षा से शुरुआत की गई। बच्चे बोर ना हों, इसके लिए क्लास में ड्रॉइंग, ऑडियो-विडियो क्लासेज भी लगाईं। इस क्लास में शांतनु के साथ काजल भी योगदान देती हैं। तीन महीनों बाद क्लास के 45 बच्चों में से कुल 36 बच्चों का ऐडमिशन स्कूल में कराया गया। इनमें लड़कों का ऐडमिशन सेंट जोसेफ स्कूल में और लड़कियों का ऐडमिशन भाग्यवती आर्य समाज स्कूल में कराया।

माता-पिता को समझाना मुश्किल काम है

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शांतनु कहते हैं, बच्चों को शिक्षा तक ले जाने में सबसे मुश्किल काम उनके पैरेंट्स को इस बात के लिए राजी करना है। बच्चों के माता-पिता पूछते हैं कि इसमें हमारा क्या फायदा है?




अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए शांतनु कहते हैं,

'बच्चों के माता-पिता को लगता है कि उनके बच्चों को पढ़ाने में हमारा निजी फायदा है। हमें स्कूटी से आता देख उन्हें लगता है कि उनके बच्चों को पढ़ाने से हमें पैसे मिलते हैं। वे पूछते हैं कि हमें कितना पैसा मिलता है? उन्हें हमारे फाउंडेशन के बारे में समझाना सबसे मुश्किल काम है। हालांकि अब चीजें पहले की तुलना में थोड़ी बदली हैं और माता-पिता भी साथ देने लगे हैं।'

शांतनु का कहना है कि सोशल मीडिया पर लिखने मात्र से कुछ नहीं होता बल्कि असल बदलाव जमीनी स्तर पर काम करने से आता है।

सरकार और युवाओं के लिए संदेश

शांतनु कहते हैं, सरकार को चाहिए कि वह केवल आंकड़ें ना दिखाए बल्कि योजनाओं को असल में जमीन पर उतारे।


वह बताते हैं,

'केवल टीवी और सोशल मीडिया पर अपनी योजनाओं को दिखाने से असल सफलता नहीं मिलती। सरकार को चाहिए कि वह अपनी योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करे ताकि समाज की समस्याओं को जड़ से मिटाया जा सके।'

वह आगे कहते हैं कि सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी सबकी है। इसके लिए सभी लोगों खासकर युवाओं को आगे आना चाहिए। हम इस आइडियोलॉजी को आगे ले जाना चाहते हैं। एक शख्स अगर दो घंटे का समय फाउंडेशन या किसी भी अन्य तरह के सोशल कॉज को देता है तो उससे एक बच्चे की जिंदगी सुधर सकती है।


अंत में शांतनु कहते हैं, पढ़ाई को लेकर लोगों में जागरूकता पैदा होनी बेहद जरूरी है क्योंकि पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया।