सामाजिक भलाई के लिए अपनी देशभक्ति को कैसे प्रसारित कर रही हैं आंत्रप्रेन्योर शर्मिला ओसवाल

पुणे में रहने वाली शर्मिला ओसवाल, 1 ऑर्गैनिक (1Organic) की प्रबंध निदेशक हैं। 1 ऑर्गैनिक एक सामाजिक उपक्रम है जिसे लॉकडाउन के दौरान शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य ऑर्गैनिक फूड को अधिक सुलभ और सस्ता बनाना है।
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कोरोनावायरस के चलते लगे लॉकडाउन का मतलब था कि हममें से कई लोगों को ज्यादा 'फैमिली टाइम' मिल रहा था। लेकिन सामाजिक उद्यमी और पर्यावरणविद् शर्मिला ओसवाल का घर एक ऐसे सामाजिक उपक्रम के लिए चर्चा के केंद्र बदल गया, जिसका उद्देश्य ऑर्गैनिक और स्वस्थ भोजन तक पहुंच और सामर्थ्य सुनिश्चित करना है।

शर्मिला उस पुरानी कहावत की काफी तरफदार लगती हैं जिसमें कहा जाता है कि 'रोकथाम इलाज से बेहतर है' और यह स्वस्थ भोजन के साथ शुरू होता है।

उन्होंने योरस्टोरी को बताया, “आज, यह ट्रेंड बन गया है कि ऑर्गैनिक और प्राकृतिक रूप से उगाया गया भोजन, अमीर और धनी लोगों के साथ जुड़ा हुआ माना जाता है। जैसा कि हमने लॉकडाउन के दौरान COVID-19 और अन्य बीमारियों के कारण होने वाली मौतों को देखा तो हमें ऑर्गेनिक फूड को सुलभ बनाने की आवश्यकता महसूस हुई।"

इसने उनके बेटे शुभम ओसवाल को आधिकारिक तौर पर सस्ता और क्रूरता मुक्त जैविक भोजन के लिए एक बाजार 1 ऑर्गैनिक का शुभारंभ करने के लिए प्रेरित किया।

किसानों की एक एजेंसी

शर्मिला ओसवाल, मैनेजिंग डायरेक्टर,1Organic

1 ऑर्गैनिक की प्रबंध निदेशक के रूप में, शर्मिला पूरे भारत में दो लाख से अधिक किसानों और 4,000 से अधिक आदिवासी परिवारों की प्राकृतिक खेती प्रथाओं का लाभ उठाती हैं। 1995 से खाद्य सुरक्षा और जल विशेषज्ञ रहीं शर्मिला ने लेह, लद्दाख, और मेघालय के आदिवासी क्षेत्रों सहित भारत के कोने-कोने के किसानों के साथ काम किया है। बदले में, वह कहती हैं कि किसान उन पर और उनके उद्यम पर भरोसा करते हैं और किसान निर्माता संगठन के माध्यम से आपूर्ति करने के लिए उत्सुक हैं।

वह कहती हैं, "सरकार लोगों को खेती करने के उनके ऑर्गैनिक और प्राकृतिक तरीके के लिए इंडिया ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन प्रदान करने का लाखों में शुल्क लेती है, जिसमें आमतौर पर लगभग दो से तीन साल लगते हैं।"

पुणे में स्थित, 1Organic के पास यूरोपीय संघ से घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय प्रमाणपत्र हैं और यह रिलायंस रिटेल के साथ-साथ अपनी वेबसाइट के साथ साझेदारी में बेचता है। उद्यमी का कहना है कि परिचालन के छह महीनों में स्टार्टअप ने 50 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की है।

देशभक्ति उनके खून में है

कोंकण में एक रूढ़िवादी मारवाड़ी परिवार में जन्मी और पली-बढ़ीं, शर्मिला ने अपनी शिक्षा के लिए संघर्ष किया और भारत और विदेशों दोनों में छात्रवृत्ति हासिल करके पढ़ाई की। उन्हें ILS लॉ कॉलेज में प्रशासन को यह भी बताना पड़ा कि उन्हें एडमिशन मिलता है तो वह संस्थान के लिए किसी एसेट से कम नहीं होंगी। 

वहां से, वह नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर से वाटर लीडरशिप प्रोग्राम को करने के लिए स्कॉलरशिप हासिल करने के लिए आगे बढ़ीं और टफ्ट यूनिवर्सिटी में वाटर डिप्लोमैट के रूप में एक मुकाम हासिल किया।

शर्मिला बताती हैं, “वास्तव में, कई आउटलेट ने मेरे बारे में लिखा है 'द गर्ल फ्रॉम घूंघट टू हार्वर्ड'। एक छोटी बच्ची के रूप में, जब मैंने घूँघट में अपनी बहनों को देखा, तो मैं शिक्षा के माध्यम से अपना खुद का रास्ता बनाना चाहती थी।“

यह ध्यान देने योग्य है कि शर्मिला एक ऐसे परिवार से हैं जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सीधे तौर पर शामिल रहा है। उनकी मां महात्मा गांधी के समय सत्याग्रह आंदोलन का हिस्सा थीं। अपने देश के लिए देशभक्ति और प्रेम ने उन्हें कनाडा में अपने स्थायी निवास को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया, जहाँ वह एक पर्यावरण वकील के रूप में बस गई थीं। वह 2003 में भारत लौट आईं।

उसके लिए देशभक्ति का मतलब जरूरतमंद लोगों की मदद करना है और इस प्रकार उन्होंने अपने गैर-लाभकारी संगठन, ग्रीन एनर्जी फाउंडेशन के माध्यम से देश भर के किसानों के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया।

वह कहती हैं कि कुशल महिलाओं में अपने काम को बेचने और व्यापक दर्शकों तक पहुंचने के लिए डिजिटल ज्ञान और मार्केटिंग कौशल की कमी है, इसलिए उन्होंने उन्हें शिक्षित करने के लिए डिजिटल वारियर्स नामक एक फेसबुक ग्रुप शुरू किया।

इंगेजमेंट बढ़ने के साथ, उन्होंने गैर-मेट्रो शहरों की महिला उद्यमियों को जोड़ने के लिए व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर डिजी बाजार (Digi bazaars) शुरू कर दिए, ताकि प्रोडक्ट्स को खरीदने, बेचने और बेचने के लिए व्यावसायिक टिप्स साझा कर सकें। आज, इसने दो लाख से अधिक महिलाओं के बीच कॉन्टैक्ट बनाए हैं।

2017 में, पीएम नरेंद्र मोदी ने महिला उद्यमियों को सशक्त बनाने के लिए उनके मिशन पर ध्यान दिया और उन्हें डिजिटल साक्षरता के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं पर चर्चा करने के लिए दिल्ली बुलाया।

आज 48 साल की उम्र में, भले ही शर्मिला के नाम पर कई खिताब हो सकते हैं, लेकिन वह एक आजीवन छात्र के रूप में पहचाने जाना चाहती हैं और कहती हैं कि यह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से सीखने की संभावना है जो उन्हें बनाए रखती है।

Edited by Ranjana Tripathi

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