[सर्वाइवर सीरीज़] मैं दूसरे सर्वाइवर लोगों की मदद कर रहा हूं और कुछ सार्थक करने के अपने लंबे समय से अधूरे सपने को पूरा कर रहा हूं

इस सप्ताह की सर्वाइवर सीरीज़ की कहानी में, फ़िरोज़ा खातून हमें बताती हैं कि कैसे एक पारिवारिक मित्र द्वारा उनकी तस्करी की गई थी और वह अभी भी उसे सलाखों के पीछे डालने के लिए लड़ रही है।
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तमाम सकारात्मक बदलावों लाने के बावजूद मैंने एक बात देखी, कि सिस्टम कैसे तस्करी पीड़ितों को विफल करता है। मैंने तस्कर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई और उसे अदालत ले गयी। हमने छह साल तक केस लड़ा और मैंने पूरी कोशिश की कि अपराधी को सलाखों के पीछे डाला जाए। लेकिन हम हार गए।

अपने तस्कर के खिलाफ न्याय पाने में विफल रहने के बावजूद, फिरोजा अभी भी अदालत में मामले को आगे बढ़ा रही है। वह दूसरे सर्वाइवर लोगों के साथ भी काम कर रही है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उन्हें न्याय मिले।

(प्रतीकात्मक चित्र)

मैं अपने परिवार में सबसे छोटे बच्चे के रूप में, उत्तर 24 परगना के बशीरहाट क्षेत्र में पली-बढ़ी हूं। मेरे माता-पिता को मुझसे काफी उम्मीदें थीं। मेरा सबसे बड़ा सपना था कि मैं अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाऊं और डिग्री हासिल करूं और अपने जीवन में कुछ सार्थक करूं। हालाँकि, हमारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी और मुझे अपने सपनों को छोड़ना पड़ा।

मेरी बड़ी बहन की शादी के समय ही उसके ससुराल वालों का एक रिश्तेदार हमारे परिवार में बार-बार आने लगा था। उसने मेरे परिवार का विश्वास जीता और मुझे विश्वास दिलाया कि वह मेरी आगे की पढ़ाई का खर्च उठाने में और मुझे नौकरी दिलाने में मदद कर सकता है।

मेरा परिवार मुझे पुणे भेजने के लिए तैयार हो गया, लेकिन जैसे ही हम पहुंचे, उसने मुझे एक वेश्यालय में बेच दिया। एक महीने में मुझे छुड़ाया गया और राहत मिली कि मैं घर जा रही थी, लेकिन एक बार जब मैं वहां गयी, तो मैंने पाया कि चीजें पूरी तरह बदल गई थीं।

मेरे पड़ोसियों, मेरे दोस्तों और स्कूल में मेरे साथियों ने मुझसे पूरी तरह से किनारा कर लिया। बहुतों ने मुझे जो कुछ भी हुआ उसके लिए दोषी ठहराया। लेकिन मैंने हार मानने से इनकार कर दिया और अपने क्षेत्र के एक एनजीओ से संपर्क किया, जहां मुझे अपने आघात से निपटने और अपने दुख को स्वस्थ तरीके से प्रसारित करने के लिए सिखाया गया। एनजीओ ने लीडरशिप और सॉफ्ट स्किल्स ट्रैनिंग के माध्यम से विभिन्न प्रकार के कौशल हासिल करने में मेरी मदद की। बाद में मैं 'उत्थान' नामक एक एंटी-ट्रैफिकिंग सर्वाइवर ग्रुप में शामिल हो गयी, जिसे 2016 में स्थापित किया गया था।

आज, मैं समाज से तस्करी को खत्म करने और इससे जुड़े कलंक और रूढ़ियों को तोड़ने की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रही हूं, जो सर्वाइवर लोगों को सहनी पड़ती है।

उत्थान में, मैं दूसरे सर्वाइवर लोगों के साथ सहकर्मी लेखा परीक्षा में भाग लेने, तस्करी विरोधी अभियान चलाने, व्यक्तियों की तस्करी विधेयक की वकालत करने और मंत्रालयों से संबंधित हितधारकों को शामिल करने जैसे कई क्षेत्रों में शामिल रही हूं। मैंने महाराष्ट्र और कोलकाता में जनहित याचिका पर काम किया है। इसके अतिरिक्त, सर्वाइवर लोग और मैं एक फोन एप्लिकेशन का उपयोग कर रहे हैं, जो पुनर्वास सेवाओं और नेटवर्क के लिए एक प्लेटफॉर्म की तलाश में मदद करता है।

तमाम सकारात्मक बदलावों लाने के बावजूद मैंने एक बात देखी, कि सिस्टम कैसे तस्करी पीड़ितों को विफल करता है। मैंने तस्कर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई और उसे अदालत ले गयी। हमने छह साल तक केस लड़ा और मैंने पूरी कोशिश की कि अपराधी को सलाखों के पीछे डाला जाए। लेकिन हम हार गए।

मैं हार मानने के लिए तैयार नहीं हूं और 2017 में हाई कोर्ट में मेरे मामले पर पुनर्विचार करने और मुझे वह न्याय प्रदान करने की अपील की जिसकी मैं सही हकदार थी। इसके अतिरिक्त, मैं यह भी समझ गयी थी कि मैं पीड़ित मुआवजे (वीएस) के लिए आवेदन करने के योग्य थी। मैं अब दूसरे सर्वाइवर लोगों को वीएस के लिए आवेदन करने और उन्हें प्रशिक्षण देने में मदद कर रही हूं ताकि वे उसी मिशन और विजन को आगे बढ़ा सकें। जमीनी स्तर पर काम करने से मुझे कुछ सार्थक करने के अपने लंबे समय से अधूरे सपने को पूरा करने की राह मिली है।

(अंग्रेजी से अनुवाद: रविकांत पारीक)

Edited by Ranjana Tripathi

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