इन्हें कहते हैं झारखंड की लेडी टार्जन, 10 हज़ार महिलाओं की फौज के साथ जमुना टुडू सालों से बचा रही जंगल

जमुना टुडू को उनके इस सराहनीय काम के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द द्वारा पद्मश्री अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। इससे पहले जमुना को साल 2013 में फिलिप्स बहादुरी अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।
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किसान पिता के घर जन्मी जमुना उड़ीसा के रैरंगपुर कस्बे में पली-बढ़ी हैं। जमुना और उनके अन्य भाई-बहन जंगलों के साये में ही अपना अधिकतर शुरुआती जीवन बिताया है, इस दौरान वे किसानी में अपने पिता की भी मदद किया करती थीं।

लेडी टार्जन जमुना टुडू, फोटो साभार: Twitter

देश और दुनिया भर के लोग आज इन्हे झारखंड की 'लेडी टार्जन' के नाम से जानते हैं। जमुना टुडू ने राज्य के जंगलों की रक्षा के लिए अपने पूरे जीवन को समर्पित कर दिया है।

आज जमुना के साथ तस्करों द्वारा झारखंड के जंगलों की अवैध कटाई को रोकने के काम में उनका सहयोग करीब 10 हज़ार महिलाओं की एक खास सेना करती है, लेकिन जमुना के लिए यह सब कर पाना कतई आसान नहीं रहा है और आज भी उन्हे तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

साल 2000 में शुरू हुई मुहिम

किसान पिता के घर जन्मी जमुना उड़ीसा के रैरंगपुर कस्बे में पली-बढ़ी हैं। जमुना और उनके अन्य भाई-बहन जंगलों के साये में ही अपना अधिकतर शुरुआती जीवन बिताया है, इस दौरान वे किसानी में अपने पिता की भी मदद किया करती थीं।

शादी हो जाने के बाद जमुना झारखंड आ गईं और यहाँ आकर पेड़ों की अवैध कटाई को देखकर व्यथित हुईं जमुना ने इसे रोकने का फैसला लिया। जमुना की यह मुहिम साल 2000 में शुरू हुई और इसी के साथ उन्होने अपने साथ जंगल बचाने की समान विचारधारा वाली अन्य महिलाओं को भी इस मुहिम से जोड़ना शुरू कर दिया।

ऐसे पड़ा ‘लेडी टार्जन’ नाम

जमुना टुडू को लोग आज झारखंड की लेडी टार्जन के नाम से जानते हैं। अपने इस खास नाम के बारे में बात करते हुए जमुना कहती हैं कि उनके संघर्ष को देखते हुए लोग उन्हे इस खास नाम से पुकारते हैं।

जमुना बताती हैं कि जंगल को बचाने की इस मुहिम में कई बार ऐसा भी भी समय आता है जब उनके भीतर से डर बिल्कुल खत्म हो जाता है और ऐसी दशा में वह पीछे नहीं हटती हैं। जमुना की इस मजबूत इच्छाशक्ति की तारीफ आज हर कोई करता है।

जब उन्हे हुई परेशानी

जमुना के अनुसार साल 2004 में उन्होने अपने गाँव से बाहर निकलना शुरू किया। जमुना ने पंचायतों से लेकर दूसरे ब्लॉक आदि जाकर लोगों के बीच जंगलों की उपयोगिता को लेकर जागरूकता फैलाना शुरू कर दिया। जमुना के इन प्रयासों के चलते कई लकड़ी माफिया उनके लिए मुश्किलें खड़ी करने लगे।

जमुना का दावा है कि उन्हे घर में इसके चलते एक बार डकैती भी डलवाई गई। घर में घुसे उन डकैतों ने उनको और उनके परिवार को इस दौरान काफी डराया और धमकाया भी, लेकिन जमुना इन धमकियों से डरने वाली नहीं थीं।

बनाई महिलाओं की सेना

नीति आयोग के CEO अमिताभ कांत से सम्मान प्राप्त करते हुए जमुना 

इन सारी कठिनाइयों के बीच जमुना टुडू ने महिलाओं को संगठित करना शुरू किया और इसके बाद उनके साथ 10 हज़ार से अधिक महिलाओं की सेना तैयार हो गई। जमुना की यह सेना अपनी सुरक्षा और जंगल काटने के उद्देश्य से घुसे घुसपैठियों को भगाने के लिए अपने हाथों में डंडे और तीर-कमान लेकर चलती है।

हालांकि उनकी मुश्किलें बस यहीं खत्म नहीं होती हैं, कई पुलिसकर्मी और वन अधिकारी भी इन लकड़ी माफियाओं के साथ हाथ मिलाकर चलते हैं जिससे जमुना और उनकी सेना की परेशानियाँ कई बार बढ़ जाती हैं।

जमुना टुडू को उनके इस सराहनीय काम के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द द्वारा पद्मश्री अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। इससे पहले जमुना को साल 2013 में फिलिप्स बहादुरी अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।


Edited by Ranjana Tripathi

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