वक्त ने करवट ली तो पंचायत चुनाव जीत गईं महिला बंधुआ मजदूर

By जय प्रकाश जय
February 01, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:20:58 GMT+0000
वक्त ने करवट ली तो पंचायत चुनाव जीत गईं महिला बंधुआ मजदूर
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सांकेतिक तस्वीर

तेलंगाना में कुदुमुला देवम्मा और बिहार में रेणु देवी का पंचायत चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक ताकत के बूते बंधुआ मजदूरी से मुक्त हो लेना, बंधुआ बनाने वाले मालिक से समर्थित प्रत्याशी को पछाड़ देना, हमारे देश में ऐसी उन लाखों औरतों की जिंदगी में बदलाव ला सकता है, जो कर्ज चुकाने के लिए बंधुआ मजदूर बन जाती हैं। 


देश की जिन गंभीर समस्याओं पर मुख्यधारा का मीडिया खामोश रहता है और सरकार उदासीन, उनमें बंधुआ महिला मज़दूरों की समस्या भी एक है। सरकारी घोषणाओं में यह समस्या खत्म हो चुकी है और मीडिया के लिए इसमें सनसनी नहीं रही लेकिन समस्या अभी जहाँ की तहाँ है। 1975 में राष्ट्रपति के एक अध्यादेश के जरिए औपचारिक तौर पर बंधुआ मज़दूरी पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन देश के लगभग सभी राज्यों में आज भी यह प्रथा बिना किसी रोक-टोक के जारी है। बीच-बीच में सरकारें बंधुआ तौर पर काम कर रहे मज़दूरों की मुक्ति और पुनर्वास का स्वांग भी रचती हैं, लेकिन मुक्त कराए गये मज़दूरों को पुनः एक नए तरह की बंधुआ मज़दूरी का शिकार होना पड़ा है। 


न तो उनकी जीविका के लिए पर्याप्त साधन मुहैया कराए गए और न ही शक्तिशाली भूमिपतियों से उनकी हिफाजत का कोई विश्वसनीय इंतजाम हो पाया। दक्षिण तेलंगाना के पंचायत चुनाव में निर्वाचित कुदुमुला देवम्मा भी पति और ससुर के लिए कर्ज भरने के लिए दशकों तक मछुआरों के बीच बंधुआ मजदूरी कर चुकी हैं। इससे लगता है कि हमारे देश में ऐसी राजनीतिक उपलब्धियां उन लाखों औरतों की जिंदगी में बदलाव ला सकती हैं, जो कर्ज चुकाने के लिए गुलाम (बंधुआ मजदूर) हो जाती हैं।


आज भी हमारे देश में बंधुआ मज़दूर औरतों का मामला आज भी एकदम जीवंत और सशक्त है। आज भी बेतहाशा प्रचार और धूमधाम के साथ देश में जब किसी परियोजना का उद्घाटन किया जा रहा होता है- किसी जंगल में देश की किसी मुलायम या कठोर धरती के हिस्से पर कोई अभागा परिवार चुपचाप गुलामी की ज़ंजीरों में कसता जा रहा होता है। किसी भी क़ानून अथवा अध्यादेश ने बंधुआ मज़दूर औरतों की मदद नहीं की है। राष्ट्रीय श्रम संस्थान ने यह साबित कर चुका है कि देश में आज भी लाखों औरतें बंधुआ मज़दूरी कर रही हैं। जब तक बंधुआ मज़दूर औरतों में देवम्मा की तरह चेतना पैदा नहीं हो पाती है और बंधुआ मजदूर औरतें एकजुट होकर खड़ी नहीं हो जाती हैं, कोई भी उन्हें आज़ाद ज़िंदगी बिताने का हक़ नहीं दे सकता है।


कुदुमुला देवम्मा को रोजाना सौ मछुआरों द्वारा पकड़ी गईं मछलियां उन परिवारों को बेचनी पड़ती थीं, जिनके नाव होते थे। नाव के मालिक उन्हें जबरन गांव में रोक कर रखते और इनमें से कई तो ऐसे थे, जो तीन पीढ़ियों से इनकी गुलामी झेल रहे थे। वर्ष 2016 में इन लोगों को मुक्त कराया गया। देवम्मा बताती हैं कि वह कुछ ऐसा है, जिसके बारे में वह सपना भी नहीं देख सकती थीं। उनकी प्राथमिकता रही है, अपने समुदाय की स्थिति को बेहतर करना और उन्हें आजाद रहने में मदद देना। गुलामी से निकल कर नेता बनने की यात्रा प्रेरणादायी है। इस जीत ने इलाके के दूसरे लोगों के पुनर्वास को तेज करने का एक शानदार अवसर पैदा किया है। 


देवम्मा की तरह ही बिहार से 2014 में रेणु देवी को बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराया गया था। रेणु देवी नवादा जिले की रहने वाले हैं। वर्ष 2017 में उन्होंने बंधुआ बनाने वाले अपने मालिक के प्रत्याशी को पंचायत चुनाव में हरा दिया। उसके बाद उन्होंने सबसे पहले अपने इलाके को राज्य के बाकी हिस्से से जोड़ने वाली सड़क बनवाई। शुरू में रेणु देवी सार्वजनिक मंचों से भाषण नहीं पाती थीं। धीरे-धीरे उनमें खुद पर भरोसा पैदा हुआ और आज वह इलाके की गरीब जनता की आवाज बन चुकी हैं। उस ईंट भट्ठे पर रेणु देवी और उनके पति से जबरन मजदूरी कराई जाती थी। जब वह इसका विरोध करती थीं तो ईट भट्ठा का मुंशी राम सिंह मारपीट करता था। पति-पत्‍‌नी को भी अलग-अलग कमरे में रात में बंद कर दिया जाता था और सुबह में ताला खोला जाता था। काम करने की मजदूरी भी नहीं मिलती थी। 


हमारे देश में महिला बंधुआ मजदूरों में ज्यादातर शारीरिक शोषण का शिकार होने पर मजबूर होती हैं। उनमें से कइयों को देर-सबेर देह व्यापार के धंधे में धकेल दिया जाता है। ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स में भारत को बंधुआ मजदूरों की राजधानी करार दिया जाना इस कड़वी तस्वीर को साफ करता है। मोटे अनुमान के मुताबिक, इस समय देश में कोई डेढ़ करोड़ लोग बंधुआ मजदूर के तौर पर जीवन बिताने के लिए अभिशप्त हैं। दहेज की रूढ़ि ने भी औरतों की बंधुआ मजदूरी को बढ़ावा दिया है। दहेज देने के लिए युवती के घरवाले ठेकेदार से एकमुश्त रकम लेकर उसे बंधुआ मजदूर के तौर पर काम करने भेज देते हैं लेकिन इस दलदल से मुक्ति मिलना तो दूर अक्सर ऐसी युवतियों का सफर किसी रेडलाइट इलाके में जाकर खत्म होता है। बंधुआ मजदूर के तौर पर काम करने के दौरान भी उनको मालिकों और ठेकेदारों के शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ता है। ऐसे में रेणु देवी और देवम्मा की जीत उम्मीदों की नई किरण लगती है।


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