जहरीले क्रीम-लिपस्टिक से कैंसर-चर्मरोग, नकली आईब्रोज़ के भी कई साइड इफेक्ट्स!

जहरीले क्रीम-लिपस्टिक से कैंसर-चर्मरोग, नकली आईब्रोज़ के भी कई साइड इफेक्ट्स!

Sunday June 23, 2019,

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महिलाएं जिन सौंदर्य प्रसाधनों (लिपस्टिक, फेयरनेस क्रीम, लिप बाम, एंटी एजिंग क्रीम आदि)का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रही हैं, वे कैंसर और चर्मरोगों का उपहार बाट रहे हैं। विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि लंबी-घनी नकली बरौनियां (फेक लैशेज) लगवाने के आंखों पर कई तरह के साइड इफेक्ट्स सामने आए हैं।


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सांकेतिक तस्वीर

वर्षों तक सर्वेक्षण-परीक्षण के बाद सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायर्मेंट (सीएसई) ने दावा किया है कि आजकल ज्यादातर महिलाएं भारतीय बाजार में बिकने वाले जिन सौंदर्य प्रसाधनों का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रही हैं, वे कैंसर और चर्मरोगों का उपहार बाट रहे हैं। उनमें जहरीले रासायनिक तत्व घुले हुए हैं। क्रीम-लिपस्टिक में सबसे अधिक मात्रा में पारा, क्रोमियम और निकेल जैसे जहरीले रासायनिक तत्व पाए गए हैं। जबकि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट्स एंड रूल्स ऑफ इंडिया के तहत पारे का किसी भी रूप में प्रयोग प्रतिबंधित होने के बावजूद सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली कंपनियां मनमाना ऐसे जहरीले रसायनों का प्रयोग कर रही हैं।


भारत में कॉस्मेटिक्स उद्योग का सालाना 20 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कारोबार है, जो 17 फीसदी की रफ्तार से बढ़ता जा रहा है। सीएसई ने 73 सौंदर्य उत्पादों (लिपस्टिक, फेयरनेस क्रीम, लिप बाम, एंटी एजिंग क्रीम आदि) का गहन अध्ययन, परीक्षण किया तो पता चला कि पारा, क्रोमियम, निकिल आदि फेफड़े का कैंसर और किडनी को घातक नुकसान पहुंचा रहे हैं। चौदह तरह की 44 फीसदी क्रीमों में पारे का 0.10 से लेकर 1.97 ‘पीपीएम’ तक प्रयोग हो रहा है। परीक्षण में क्रीमों में सबसे अधिक मात्रा में पारा मिला। पचास फीसदी लिपस्टिकों में ‘क्रोमियम’ और 43 फीसदी में 'निकेल’ जैसा जहरीला रसायन घुला है। आंखों को आकर्षक दिखाने के लिए महिलाओं में लंबी-घनी नकली बरौनियां (फेक लैशेज) लगाने का भी ट्रेंड बढ़ता जा रहा है। ऐसी मेक-अप एक्सेसरीज बनाने वाली कंपनियां जमकर मुनाफा कमा रही हैं।





एसोचैम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 25 से 45 वर्ष के पुरुषों ने रूप सज्जा तथा सौंदर्य प्रसाधन पर खर्च के मामले में महिलाओं को पीछे छोड़ दिया है। पुरुष सौंदर्य प्रसाधन उद्योग अगले तीन वर्षों में 35,000 करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। फिलहाल भारत में पुरुष साज-सज्जा उद्योग 16,800 करोड़ रुपए का है। पिछले पांच सालों में यह 45 प्रतिशत की दर से बढ़ा है। गौरतलब है कि आजकल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर ब्यूटी क्वीन जैसी हजारों तरह की सौंदर्य प्रतियोगिताएं आयोजित हो रही हैं, जिनकी प्रतिभागी अपना शरीर (त्वचा, बाल, नाखून) सजाने-संवारने (मेक-अप) में जहरीले कॉस्मेटिक्स उत्पादों का बेधड़क इस्तेमाल कर रही हैं।


ये उत्पाद भारी मात्रा में रिटेल स्टोर, ब्रांड आउटलेट्स और सुपरमार्केट में तथा ऑनलाइन हाथोहाथ बिक रहे हैं। अगले साल तक इनमें साढ़े चार प्रतिशत (500 बिलियन डॉलर) तक और वृद्धि का अनुमान है। गौरतलब होगा कि इसी साल फरवरी में कैलिफोर्निया की ईएलएफ कॉस्मेटिक्स कंपनी को उत्तर कोरिया से नकली बरौनी (आईलैशेज) आयात करने पर दस लाख डॉलर का जुर्माना भरना पड़ा। उससे पहले नकली बरौनी के आयात-निर्यात पर एक कंपनी पर चार करोड़ डॉलर से अधिक का जुर्माना लगाया जा चुका है।


इस बीच कास्मेटिक के विश्व बाजार में महिलाओं के नकली बरौनियों (फेक लैशेज) से अपनी आंखें भड़कीली-चमकीली बनाने के फैशन ने एक और स्वास्थ्य संकट को अंजाम दिया है। औसतन ऊपरी पलक में डेढ़ से ढाई सौ बरौनियां होती हैं। जर्मन महिला विशेषज्ञ क्रिस्टियाने बायरेल का कहना है कि फेक लैशेज लगाने से आंखों से पानी गिरता है, खुजली-दर्द होता है। एलर्जी से आंखें एक्जीमा का शिकार हो सकती हैं।


नकली लैशेज रेशम, जानवरों के फर, नकली केमिकल से बनते हैं। पहली बार इसके इस्तेमाल में ढाई सौ यूरो तक चुकाने पड़ते हैं। लंबी बरौनियों के लिए कई तरह के प्रोस्टाग्लैंडिन्स से जुड़े सीरम भी बाजार में उपलब्ध हैं, जिनका इस्तेमाल ग्लूकोमा के इलाज में दी जाने वाली आई-ड्रॉप में होता है। लैश सीरम के कारण बहुत गंभीर किस्म के संक्रमण होते हैं। इससे आइरिस का रंग तक बदल जाता है। इन्हें इस्तेमाल करने वाले लोग किसी न किसी तरह के साइड इफेक्ट जरूर झेलते हैं।