वरिष्ठ पत्रकार और क्राइम फिक्शन राइटर संजीव पालीवाल की 'पिशाच' भारी डिमांड के चलते दो हफ्ते में ही पहुंची रीप्रिंट के लिए

अगर आप भी हैं क्राइम थ्रीलर उपन्यास के शौकीन और जानना चाहते हैं साहित्य की दुनिया के सनसनीखेज खुलासों को करीब से, तो 'पिशाच' ज़रूर पढ़ें।
1 CLAP
0

किताब: पिशाच (फिक्शन)

लेखक: संजीव पालीवाल

प्रकाशक: एका (वेस्टलैंड)

हिन्दी पत्रकारिता को अपने कई दशक समर्पित कर चुके संजीव पालीवाल पहली किताब ‘नैना’ के बाद पाठकों की उम्मीदों के मुताबिक अपनी दूसरी किताब ‘पिशाच’ के जरिये बिल्कुल खरे उतरे हैं। एका से छपे इस उपन्यास में भी संजीव ने अपनी कहानी को पत्रकारिता की दुनिया से उतने ही रोचक ढंग से जोड़ा है जैसा उन्होने अपने पहले उपन्यास ‘नैना’ में किया था। कहानी इतनी धारदार है कि उपन्यास के पहले पेज को पढ़ने की शुरुआत करने के बाद पाठक खुद को अंतिम पेज पढ़ने तक रोक नहीं पाएगा। 

लगातार होते कत्ल और बना हुआ सस्पेंस एक ओर जहां पाठक को ‘सम्मोहित’ कर लेते हैं, वहीं कहानी का फ्लो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उपन्यासकार ने अपनी कहानी में किसी भी तरह की ढील नहीं रखी है जिससे पाठक जरा सा भी विचलित हो सके।  

पाठक किताब की शुरुआत के साथ समर के किरदार के साथ जुड़ते हुए यह महसूस कर सकता है कि वो कातिल को जल्द ही खोज लेगा लेकिन लेखक ने इस कहानी को ऐसा बांधा है कि पाठक खुद भी हैरान रह जाएगा। इस क्राइम थ्रिलर उपन्यास में साहित्य की वो दुनिया दिखाई देती है जिससे आमतौर पर लोग अंजान होते हैं। परत दर परत आगे बढ़ती हुई कहानी पाठक को तमाम झटके देती है।  

‘पिशाच’ के बारे में बात करते हुए संजीव के साथी पत्रकार शम्स ताहिर खान कहते हैं कि "अगर हर पन्ना आपको चौंका रहा है तो यह समझ लीजिये कि लेखक आप पर सवार हो गया है।" इस उपन्यास के लिए शम्स की यह टिप्पणी एकदम सटीक है क्योंकि पहले ही पन्ने से पाठक इस उपन्यास से खुद को चिपका हुआ पाता है और जब पाठक को होश आता है, तो किताब का अंतिम पन्ना आ चुका होता है। 

साहित्यकार गीताश्री ने इस उपन्यास के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘पहली बार किसी लेखक ने साहित्य के भीतर के अपराध पर ऐसे दहला देने वाली साहसिक कथा लिखी है।’ यह टिप्पणी इस तरफ भी इशारा करती है कि संजीव ने किस तरह इस विधा को एक नए पाठक वर्ग को अपने साथ जुड़ने का आमंत्रण दिया है। 

गौरतलब है कि ‘पिशाच’ अपनी रिलीज़ के दो हफ्ते के भीतर ही इतनी बिकी है कि उसे रीप्रिंट के लिए भेज दिया गया है, जो किसी भी लेखक के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। ऐसा बहुत समय बाद हुआ है, कि कोई किताब इतने कम समय में रीप्रिंट के लिए चली जाये। संजीव के अनुसार "इससे लोगों का यह भ्रम भी टूट जाना चाहिए कि देश में लोग क्राइम फिक्शन को अन्य विधाओं की तुलना में कम पसंद करते हैं।" इसी के साथ हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में तो यह और भी बड़ी उपलब्धि बन जाती है।

पिशाच पर वरिष्ठ पत्रकार आलोक जोशी कहते हैं, कि "पिशाच को पढ़ने में बहुत आनंद आया। मैंने किताब पढ़ने की शुरुआत ही जासूसी उपन्यास से की थी और मैं कर्नल रंजीत के उपन्यास पढ़ा करता था। संजीव को पढ़ते हुए कर्नल रंजीत की याद आती है।"

पिशाच को लिखने के पीछे के कारण के बारे में बात करते हुए संजीव कहते हैं, कि उन्होंने यह किताब पाठकों के मनोरंजन को ध्यान में रखते हुए लिखी है। वहीं क्राइम फिक्शन के बारे में बात करते हुए संजीव का कहना है कि भारत में इस विधा को लोग काफी पसंद करते हैं, जबकि हमारे देश में बेहद कम क्राइम फिक्शन लिखे गए हैं। संजीव का मानना है कि नैना की तरह ही उनका दूसरा उपन्यास पिशाच भी पाठकों का खूब मनोरंजन करेगा।

संजीव के पहले उपन्यास 'नैना' ने जितनी सफलता हासिल की, दूसरे उपन्यास पिशाच ने उस सफलता को और पीछे छोड़ दिया है। संजीव जल्दी ही अपने अगले यानि कि तीसरे उपन्यास पर भी काम करना शुरू कर देंगे, जो अगले साल अप्रैल या मई तक पाठकों के हाथ में होगा। पत्रकारिता की दुनिया में सफलता हासिल करने के बाद अब बतौर उपन्यासकार सफलता के नए शिखर को छू रहे संजीव कहते हैं, कि वे अब बतौर लेखक अपने इस नए फेज़ का आनंद ले रहे हैं। संजीव के अनुसार उनकी यह सफलता उन्हें प्रेरित करने के साथ-साथ ही इस विधा के नए लेखकों के लिए भी एक प्रेरणाश्रोत बनेगी। 

 

'पिशाच' के विमोचन के दौरान सुरेंद्र मोहन पाठक (दाएं) के साथ संजीव पालीवाल

पत्रकारिता के साथ लेखन कर रहे संजीव टाइम मैनेजमेंट पर खास ज़ोर देते हैं। उनके अनुसार वे हर रोज़ कम से कम 1 हज़ार शब्द जरूर लिखने की कोशिश करते हैं। संजीव के अनुसार इस टाइम मैनेजमेंट की वजह से ही वे 3 से 4 महीनों में अपने उपन्यास को पूरा कर लेते हैं। अपने पाठकों को संदेश देते हुए संजीव कहते हैं कि लोगों को खूब पढ़ना चाहिए क्योंकि पढ़ने से हम सभी के भीतर दुनिया को और करीब से जानने की समझ पैदा होती है। यह सच है कि बेहतर ज़िंदगी का रास्ता बेहतर किताबों से ही होकर जाता है।

महज पहले उपन्यास की सफलता के बाद किसी लेखक को ‘काबिल’ मान लेना जल्दबाज़ी हो सकती है लेकिन संजीव पालीवाल ने अपने दूसरे उपन्यास के साथ स्टेडियम पार वो छक्का मारा है जिसके बाद अब पाठक उनसे ऐसी ही बेहतरीन अगली कहानी की उम्मीद लगाकर बैठे हुए हैं। संजीव ने अपने लगातार दो धाकड़ उपन्यासों के साथ एक नए पाठक वर्ग को अपने साथ जोड़ लिया है जिसे क्राइम और रोमांच का मिश्रण काफी रास आता है।

'पिशाच' अमेज़न पर ऑनलाइन उपलब्ध है। इस लिंक पर जाकर आप किताब ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं।

Edited by Ranjana Tripathi