विजयलक्ष्‍मी पंडित की अनकही प्रेमकहानी, जो मजहब की दीवारों की भेंट चढ़ गई

By yourstory हिन्दी
December 01, 2022, Updated on : Thu Dec 01 2022 02:31:33 GMT+0000
विजयलक्ष्‍मी पंडित की अनकही प्रेमकहानी, जो मजहब की दीवारों की भेंट चढ़ गई
1953 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष बनने वाली वह विश्‍व की पहली महिला थीं.
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आज विजयलक्ष्‍मी पंडित की पुण्‍यतिथि है. 1 दिसंबर, 1990 को 90 साल की उम्र में देहरादून में विजयलक्ष्‍मी पंडित का निधन हुआ था. वह कैबिनेट मंत्री बनने वाली भारत की पहली महिला थीं. 1953 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष बनने वाली वह दुनिया की पहली महिला थीं.


1937 में वह संयुक्त प्रांत की प्रांतीय विधानसभा के लिए निर्वाचित हुईं थीं और स्थानीय स्वशासन और सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री के पद पर नियुक्त की गईं. 1946-50 तक वह भारतीय संविधान सभा की सदस्य रहीं. वह आपातकाल के समय इंदिरा गांधी के खिलाफ मुखर आवाज उठाने और विरोध में जनता दल पार्टी ज्‍वाइन करने वाली कांग्रेस परिवार की महिला थीं.  


इन सारी महत्‍वपूर्ण उपलब्धियों के अलावा उनकी एक पहचान ये भी है कि वह भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं. विजयलक्ष्‍मी पंडित अपने जीवन काल में विभिन्‍न कारणों से सुर्खियों और विवादों में भी रहीं. 19 बरस की उम्र में पहले प्रेम विवाह की पहल से लेकर एक बार एक महंगे होटल में रुकने और बिना बिल चुकाए वापस चले जाने तक उन्‍हें लेकर तमाम तरह के किस्‍से मशहूर हैं.   


18 अगस्त, 1900 को इलाहाबाद के एक समृद्ध और बेहद प्रसिद्ध परिवार में विजय लक्ष्मी पंडित का जन्म हुआ. पिता मोतीलाल नेहरू जाने-माने वकील थे. विजयलक्ष्‍मी उनकी तीसरी संतान थीं. सबसे बड़े नेहरू, फिर दूसरे नंबर पर बहन कृष्‍णा और सबसे छोटी विजयलक्ष्‍मी. वह जवाहरलाल से उम्र में 11 साल छोटी थीं. बचपन में उनका नाम स्वरूप कुमारी था. शुरुआती शिक्षा घर पर ही हुई. उन्‍हें तालीम देने शिक्षक घर आते थे.

साल 1919 में विजया 19 बरस की थीं. मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद में एक अखबार शुरू करने की सोच रहे थे. इस अखबार का संपादकीय कार्यभार संभालने के लिए उन्‍हें एक ऐसे नौजवान की जरूरत थी, जो काबिल हो, रेडिकल हो, देश-दुनिया की समझ रखता हो और जिसमें संपादकीय कौशल हो.


किसी ने उन्‍हें सैयद हुसैन का नाम सुझाया. 23 जून, 1888 को कलकत्‍ता के एक संभ्रांत परिवार में जन्‍मे सैयद हुसैन उन सारे मानकों पर खरे उतरे, जिसकी मोतीलाल को तलाश थी. सैयद हुसैन अमेरिका से कानून की पढ़ाई करके लौटे थे. इंग्लैंड प्रवास के दौरान भी उनके काफी चर्चे रहे. 1916 में हिंदुस्‍तान लौटने पर उन्‍होंने बीजी हार्निमन के अखबार 'बॉम्बे क्रॉनिकल' में उनके साथ काम किया.  


मोतीलाल नेहरू को जिस शख्‍स की तलाश थी, वो उन्‍हें मिल गया था. उन्‍होंने सैयद को इलाहाबाद आने का न्‍यौता भेजा. वो आए और इंडीपेंडेंट के पहले संपादक बन गए. उस समय उनकी उम्र 31 साल थी.


19 बरस की विजयलक्ष्‍मी का अकसर ही इंडीपेंटेंड के दफ्तर जाना होता था. वह उस सुदर्शन नौजवान के प्रति अपने अदम्‍य आकर्षण को रोक नहीं पाईं और उनके प्रेम में पड़ गईं. हालांकि सैयद हुसैन अपने उम्र और तजुर्बे ये से जानते थे कि यह रिश्‍ता मुकम्‍मल नहीं हो पाएगा. इसलिए उन्‍होंने खुद को रोकने और विजयलक्ष्‍मी को हतोत्‍साहित करने की पूरी कोशिश की.


लेकिन विजयलक्ष्‍मी कहां रोकने से रुकने वाली थीं. उन्‍होंने तो ठान ली थी कि वो विवाह करेंगी तो सैयद हुसैन से ही. लेकिन जब घरवालों को उनके इस इरादे का पता चला तो मानो घर में बम ही फूट पड़ा हो.


मोतीलाल नेहरू का परिवार अपने समय से आगे काफी, पढ़ा-लिखा, प्रतिष्ठित, प्रगतिशील और देश-दुनिया के एक्‍सपोजर वाला परिवार था, लेकिन अंतर्धार्मिक विवाह उनके लिए भी बहुत बड़ी बात थी.


ऐसा नहीं है कि मोतीलाल नेहरू या स्‍वयं नेहरू भी सैयद हुसैन को पसंद नहीं करते थे. वो उनके व्‍यक्तित्‍व और काबिलियत के कायल थे, लेकिन किसी हाल इस विवाह को मंजूरी नहीं दे सकते थे. खुद महात्‍मा गांधी ने इस मामले में हस्‍तक्षेप करके विजयलक्ष्‍मी को अपने फैसले से पलटने की सलाह दी थी.


जो भी हुआ, परिवार का विरोध विजयलक्ष्‍मी के प्रेम पर भारी पड़ गया. मोतीलाल नेहरू ने अगली ट्रेन से सैयद हुसैन की रवानगी का इंतजाम किया और आनन-फानन में विजयलक्ष्‍मी के लिए दूसरे सुयोग्‍य वर की तलाश शुरू हो गई.  


हुसैन ने हिंदुस्‍तान छोड़ दिया और इंग्‍लैंड चले गए. इधर परिवार ने विजयलक्ष्‍मी के लिए एक सुयोग्‍य वर ढूंढ लिया. दो साल बाद 1921 में महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण बैरिस्टर रंजीत सीताराम पंडित से विजयलक्ष्‍मी की शादी हो गई और वो विजयलक्ष्‍मी पंडित बन गईं. विजयलक्ष्मी की तीन संतानें हुईं.


सैयद हुसैन ने फिर आजीवन विवाह नहीं किया. जवाहरलाल नेहरू उनके हमेशा संपर्क में रहे और कायल भी. उन्‍होंने हुसैन को मिस्र में भारत का राजदूत बनाकर भेजा. 1949 में जब हुसैन को अमेरिका में भारत का राजदूत बनाकर भेजे जाने की घोषणा हुई, उसी समय मिस्र के एक होटल में हार्ट अटैक से हुसैन का निधन हो गया. वे सिर्फ 61 साल के थे. आज भी मिस्र की राजधानी काइरो की एक सड़क का नाम उनके नाम पर है.


Edited by Manisha Pandey