अयोध्या पर कोर्ट का फैसला जो भी हो, वह किसी की हार-जीत नहीं : प्रधान मंत्री

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'अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का चाहे जो भी फैसला आए, वह किसी की हार-जीत नहीं। फैसला भारत की शांति, एकता और सद्भावना की महान परंपरा को और बल प्रदान करे। समाज के सभी वर्गों की तरफ से सद्भावना का प्रयास बहुत सराहनीय हैं।'

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घरों, दुकानों, मजलिसों, चौपालों पर तो फैसले की घड़ियां आती-जाती रहती हैं, लेकिन देश और समाज के सामने कोई ऐसा वक़्त आ उपस्थित हो, जिससे सबका हित-अनहित जुड़ा है, सिर्फ और सिर्फ, मनुष्यता तथा मानवाधिकारों का तक़ाजा बनता है, साथ साझी विरासतों, एकल संस्कृतियों, साहित्यिक उक्तियों, देशज कहावतों और अपने पुरखों की उन बातों का, जिनका समाज को उन्नत, शांतचित्त, उपदेशवत आग्रही बनाने में अमूल्य योगदान रहा है। जैसेकि बापू की प्रार्थना सभाओं में गूंजती एक पंक्ति हमारा युगधर्म बन गई- 'ईश्वर-अल्ला तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान।' आज जब अयोध्या पर देश की सुप्रीम अदालत की ओर से फैसले की ऐतिहासिक घड़ी आ उपस्थित हुई, चारो तरफ से सामाजिक समरसता और सद्भावना के स्वर मुखर होना लाज़िमी हो जाता है। 


अयोध्या, पौराणिक मान्यताओं में पुरुषोत्तम भगवान राम की नगरी। उसको गुजरते वक़्त की ऐसी नज़र लगी कि संभलते, संभालते हालात आज यहां तक आ पहुंचे, देश की सर्वोच्च न्याय पालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा है। ऐसा कैसे हो गया, क्यों हो गया, जिम्मेदार कौन है, ऐसे सवालों के जंगल में भटकने की बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सौ बात पर एक बात पते की लगती है -

'अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का चाहे जो भी फैसला आएगा, वह किसी की हार-जीत नहीं। देशवासियों की प्राथमिकता रहे कि फैसला भारत की शांति, एकता और सद्भावना की महान परंपरा को और बल प्रदान करे। पिछले कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट में निरंतर इस विषय पर सुनवाई हो रही थी, पूरा देश उत्सुकता से देख रहा था। इस दौरान समाज के सभी वर्गों की तरफ से सद्भावना का वातावरण बनाए रखने के लिए किए गए प्रयास बहुत सराहनीय हैं।'



आज देश-काल ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जहां से आगे का रास्ता हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत संभाले रखने में हमसे पूरी समझदारी की उम्मीद कर रहा है। समाज में तरह-तरह की विघ्न-संतोषी शक्तियां होती हैं तो जान पर खेलकर हिफाजत करने वाले असंख्य लोग भी। वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हों या मातृभूमि पर मर मिटे स्वतंत्रता संग्राम के अनगिनत रणबांकुरे, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी हों अथवा भारत की सरहदों पर अहर्निश मुस्तैद लाखों सैन्य बहादुर। बापू का सबसे प्रिय भजन था - 'वैष्णव जन तो तेने रे कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे', यानी सच्चा वैष्णव वही है, जो दूसरों की पीड़ा को समझता हो। सच भी है कि देश और समाज की पीड़ा से बड़ा कोई दुख नहीं होता है। हमारे पुरखों की जुबान से ही ये शब्द निकल कर दशकों से आम जन-मानस में गूंजते आ रहे हैं कि 'न हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा।'


विश्व-समुदाय में आज भारत जिस तरह शान और गर्व से मस्तक ऊंचा किए खड़ा है, उसमें सबसे अमूल्य योगदान हमारी साझी विरासत, मिश्रित महान संस्कृतियों का रहा है, जिसे कोई भी आततायी, देशी-विदेशी ताकत आज तक पराजित नहीं कर सकी है। हम लड़े, लड़खड़ाए भी हैं, किंतु फिर पूरी ताकत से उठ खड़े हुए, आ गए हैं आज यहां तक, विश्व प्रतिस्पर्द्धा में विकासशील से विकसित देश होने की हैसियत तक। साझा संस्कृति' का एक प्रमुख तत्व है-

'हिंदू-मुस्लिम सद्भाव', संस्कृति में हिंदू-मुस्लिम संस्कृतियों का एक-दूसरे में घुल-मिल जाना। इसी आत्मसातीकरण की दुहरी प्रक्रिया में भारतीय संस्कृति की आत्मा का निर्माण हुआ है। आज के दिन हमे पीएम मोदी की बातों को एक पल के लिए भी नहीं भुलाना है कि - 'अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला चाहे जो भी हो, वह किसी की हार-जीत नहीं।' 


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