कभी डूबती SpiceJet के तारणहार बने थे अजय सिंह, अब घटा रहे हिस्सेदारी

रिपोर्ट्स हैं कि अजय सिंह, स्पाइसजेट में अपनी आंशिक हिस्सेदारी बेचने के लिए खरीदार की तलाश में हैं. अभी स्पाइसजेट में उनकी कुल 60 प्रतिशत हिस्सेदारी है.
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बजट विमानन कंपनी स्पाइसजेट (SpiceJet) फिलहाल थोड़ी मुश्किलों में घिरी है. DGCA ने स्पाइसजेट के विमानों में आई तकनीकी गड़बड़ी के कारण 8 हफ्तों तक उसकी 50 फीसदी उड़ानों पर रोक लगा दी है. इस दौरान एयरलाइन पर सख्त निगरानी रखी जाएगी. इस बीच यह खबर भी सामने आई है कि स्पाइसजेट के प्रमोटर अजय सिंह (Ajay Singh) विमानन कंपनी में अपनी हिस्सेदारी घटाना चाह रहे हैं.

रिपोर्ट्स हैं कि अजय सिंह, स्पाइसजेट में अपनी आंशिक हिस्सेदारी बेचने के लिए खरीदार की तलाश में हैं. अभी स्पाइसजेट में उनकी कुल 60 प्रतिशत हिस्सेदारी है. माना जा रहा है कि मिडिल ईस्ट की एक बड़ी विमानन कंपनी और एक भारतीय कंपनी के साथ इस बिक्री को लेकर बातचीत चल रही है. मिडिल ईस्ट की कंपनी 24 प्रतिशत हिस्सेदारी और बोर्ड में जगह में रुचि रखती है.

साल 2015 में जब स्पाइसजेट बंद होने की कगार पर थी, तो इन्हीं अजय सिंह ने कंपनी की नैया पार लगाई थी. लेकिन दिलचस्प यह भी है कि अजय सिंह ने ही एक अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर स्पाइसजेट को शुरू किया था. आइए जानते हैं कि स्पाइसजेट और अजय सिंह की कहानी...

एसके मोदी से शुरू हुआ सफर

स्पाइसजेट की नींव उद्योगपति एसके मोदी से पड़ी. उन्होंने 1984 में प्राइवेट एयर टैक्सी सर्विसेज की शुरुआत की. 1993 में इसका नाम एमजी एक्सप्रेस रखा गया. 1994 इसका नाम ModiLuft कर दिया गया, जब इसने लुफ्थांसा के साथ पार्टनरशिप की. जर्मनी की लुफ्थांसा ने ModiLuft को न केवल पायलट उपलब्ध कराए बल्कि इसके भारतीय स्टाफ को ट्रेनिंग भी दी. इनमें पायलट, केबिन क्रू की ट्रेनिंग और मैकेनिक्स शामिल थे. ModiLuft पैसेंजर और कार्गो सर्विसेज उपलब्ध कराती थी. ModiLuft ने 1996 में परिचालन बंद कर दिए.

इसके 10 साल बाद अजय सिंह ने ModiLuft को अन्य निवेशकों के साथ मिलकर खरीद लिया और इसे स्पाइसजेट के नाम से 2005 में शुरू किया. स्पाइसजेट की पहली उड़ान 24 मई 2005 को दिल्ली और मुंबई के बीच थी. सिंह का मकसद स्पाइसजेट को एक ऐसी विमानन कंपनी के तौर पर स्थापित करने का था, जो सस्ते किराए पर लोगों को रिच फ्लाइंग एक्सपीरियंस उपलब्ध कराए. सिंह की स्पाइसजेट में शुरुआती हिस्सेदारी 20 प्रतिशत थी. बाद में यह बढ़ गई. स्पाइसजेट ने उस वक्त काफी सस्ते में लोगों को हवाई सफर कराया. लिहाजा इसे बजट कैरियर का नाम दे दिया गया. 2008 तक यह भारत की तीसरी सबसे बड़ी लो कॉस्ट विमानन कंपनी बन चुकी थी. 

कलानिधि मारन की एंट्री

इसके बाद कहानी में एंट्री हुई मीडिया इंडस्ट्री के दिग्गज बिजनेसमैन कलानिधि मारन की. जून 2010 में सिंह की स्पाइसजेट में हिस्सेदारी घटकर 5-6 प्रतिशत रह गई. मारन ने सन टीवी के माध्यम से सिंह से स्पाइसजेट में 37.7 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीद ली. कलानिधि मारन के साथ अजय सिंह की डील साल 2010 में 750 करोड़ रुपये की रही थी. इसके बाद सिंह ने अपनी बाकी की हिस्सेदारी भी बेच दी और स्पाइसजेट से बाहर निकल गए. मारन ने कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 58.46 प्रतिशत कर ली.

लेकिन मारन ज्यादा वक्त तक स्पाइसजेट का परिचालन और स्वामित्व नहीं संभाल सके. स्पाइसजेट की वित्तीय हालत लगातार खराब होने लगी. मारन के स्वामित्व में 2014 में स्पाइसजेट का शेयर गिरकर 15 रुपये प्रति शेयर पर आ गया, जो कभी 80 रुपये पर हुआ करता था. वित्त वर्ष 2013-14 खत्म होने पर स्पाइसजेट का घाटा 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा का हो चुका था. वित्त वर्ष 2014-15 में कंपनी का घाटा 687 करोड़ रुपये रहा लेकिन वह 1240 करोड़ रुपये के कर्ज में डूब चुकी थी.

SpiceJet में अजय सिंह की फिर से एंट्री

हालात इतने खराब हुए कि मारन ने स्पाइसजेट में अपनी हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया. दिसंबर 2014 तक स्पाइसजेट लिमिटेड का नियंत्रण कलानिधि मारन के सन ग्रुप के पास था. स्पाइसजेट कर्ज में डूबी हुई थी और बंद होने की कगार पर थी. एक सुबह सरकारी तेल कंपनियों ने प्लेन्स में फ्यूल भरने से मना कर दिया. धीरे-धीरे स्पाइसजेट के सारे प्लेन खड़े होने लगे. सैकड़ों फ्लाइट कैंसिल करनी पड़ीं और कर्मचारियों की सैलरी अटक गई. कुछ फ्लाइट्स तो अचानक से कैंसिल हुईं और इसकी वजह से कुछ एयरपोर्ट्स पर स्पाइसजेट कर्मचारियों को पैसेंजर्स द्वारा पीटे जाने की भी खबर आईं. 17 दिसंबर 2014 को शाम 4 बजे तक दिवालिया होने की कगार पर खड़ी स्पाइसजेट के परिचालन बंद हो चुके थे.

इसके बाद स्पाइसजेट में फिर से एंट्री हुई अजय सिंह की. मारन ने जनवरी 2015 में अपनी पूरी हिस्सेदारी अजय सिंह को बेच दी. SpiceJet उड़ानें तभी शुरू हो सकीं, जब तेल कंपनियों के बकाए का आंशिक पेमेंट हो सका. उस वक्त रिपोर्ट आई थीं कि फ्लाइट्स रेज्यूम होने के 1 घंटे पहले अजय सिंह को राजीव गांधी भवन में अधिकारियों से मिलते देखा गया था. दिल्ली में इसी बिल्डिंग में सिविल एविएशन मंत्रालय है. अजय सिंह और मारन के बीच औपचारिक सौदा जनवरी 2015 में हुआ लेकिन सिंह ने एक टेंटेटिव एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर होने के बाद सरकार से बातचीत दिसंबर 2014 में ही शुरू कर दी थी. औपचारिक सौदे पर हस्ताक्षर होने के बाद ही सिंह स्पाइसजेट के दैनिक परिचालनों में शुरू हुए.

घाटे में ग्लोबल क्रूड प्राइसेज का रहा बड़ा हाथ

ग्लोबल क्रूड प्राइसेज के चलते 2012 में कंपनी को 39 करोड़ रुपये का घाटा हुआ. लेकिन कलानिधि मारन द्वारा हिस्सेदारी बढ़ाने और 100 करोड़ रुपये इन्वेस्ट करने से साल के आखिर तक कंपनी फिर मुनाफे में लौट आई. जब मारन बंधुओं ने 2010 में स्पाइसजेट को खरीदा था तो जेट फ्यूल की कीमत 40 रुपये लीटर थी जो 2013 में 77 रुपये पहुंच गई. लेकिन फरवरी 2015 में इसकी कीमत 36 रुपये प्रति लीटर और फरवरी 2016 में 35 रुपये रह गई. किसी भी विमानन कंपनी की परिचालन लागत में करीब आधी हिस्सेदारी फ्यूल की होती है.

ये बदलाव किए

एयरलाइन का नेतृत्व अपने हाथ में लेने के बाद सिंह ने जो सबसे पहला काम किया, वह यह कि उन्होंने विमानन कंपनी की बुनियादी चीजों को ठीक किया. उन्होंने सुनिश्चित किया कि फ्लाइट उड़ें और वेबसाइट्स जैसे इंटरफेस, एयरपोर्ट पर काउंटर्स ठीक से काम करें. इस सबके लिए वे प्लेन्स की सर्विस के लिए वेंडर्स को वापस लाए. उनकी कोशिशों से एक बार फिर स्पाइसजेट में ग्राहकों का यकीन जगा. पुराने मैनेजमेंट ने विस्तार पर ध्यान दिया लेकिन पॉइंट टू पॉइंट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने के मूल लो कॉस्ट सिद्धांत से दूर हो गया. इसके अलावा विस्तार के तहत डेस्टिनेशंस एड करने में भी कुछ खामियां रहीं. नए मैनेजमेंट ने एंसिलरी रेवेन्यु को बेहतर बनाने पर भी फोकस किया. सिंह ने यह भी फैसला किया था कि जब तक स्पाइसजेट मुनाफे में नहीं लौट आती, वह कोई सैलरी नहीं लेंगे. वह प्रमोटर और सीईओ दोनों थे. इसके अलावा कुछ ऐसे टॉप एग्जीक्यूटिव्स को भी निकाला गया, जो मोटी सैलरी ले रहे थे. सिंह के नेतृत्व में स्पाइसजेट ने 2015 में 356.54 करोड़ रुपये का प्रॉफिट दर्ज किया.

सिंह के आने से पहले कंपनी लो कॉस्ट मॉडल को फॉलो नहीं कर रही थी. स्टेशंस की संख्या ज्यादा थी और फ्लाइट्स कम थीं. कुछ रूट्स पर उसी दिन कोई रिटर्न फ्लाइट नहीं थी. सिंह ने आने के बाद नेटवर्क को भी दुरुस्त किया. शारजाह और काठमांडू समेत 5 स्टेशनों को ड्रॉप किया गया. एक साल के अंदर ही रेवेन्यु बेहतर हुआ और लागत घटी. इसके अलावा फ्यूल प्राइस घटने से भी स्पाइसजेट को फिर खड़ा होने में मदद मिली.

जो सोचा, वह कर दिखाया

जब 2015 में उन्होंने फिर से स्पाइसजेट को मारन से खरीदा तो उनके दोस्तों ने उन्हें दिवालिया होने की कगार पर खड़ी विमानन कंपनी से दूर रहने की सलाह दी. लेकिन सिंह को लगता था कि कंपनी में अभी भी जान बची है और वह इसकी नियति बदल सकते हैं. उन्होंने सोचा कि अगर एयरलाइन डूबती है तो कोई उन पर आरोप नहीं लगाएगा लेकिन अगर यह फिर से चल निकलती है तो आनी वाली पीढ़ियां इसके किस्से सुनाएंगी.

अजय सिंह का जन्म दिल्ली में हुआ. उनके पिता भी बिजनेसमैन थे. सिंह की रुचि रियल एस्टेट और फैशन एक्सेसरीज में थी. उन्होंने आईआईटी दिल्ली से टेक्सटाइल इंजीनियरिंग 1984-88 में की हुई है. उसके बाद उन्होंने कॉरनल यूनिवर्सिटी से एमबीए किया. सिंह 1992 में भारत वापस लौटे. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की भी पढ़ाई की है. स्पाइसजेट की स्थापना से पहले अजय सिंह ऑटो सेक्टर और संचार सेक्टर में कई बड़ी कंपनियों में अहम पदों पर रह चुके थे. साल 1996 में दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के बोर्ड में रहे. उन्होंने डीटीसी के कायाकल्प की योजना बनायी. उनके कार्यकाल में डीटीसी बसों की संख्या 300 से 6000 हो गई थी.

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