क्या कारण है कि भारत वन्यजीवों की तस्करी का एक प्रमुख अड्डा है?

वन्यजीवों और वन्यजीव उत्पादों के लिए भारत न केवल एक प्रमुख स्रोत है, बल्कि अवैध व्यापार का अड्डा भी है. भारत में और भारत से बाहर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीवों की तस्करी मुख्य रूप से या तो पूर्वोत्तर के साथ लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा या हवाई अड्डों के माध्यम से होती है.
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वन्यजीवों की तस्करी से तात्पर्य जीवित या मृत जंगली जानवरों और पौधों के अवैध व्यापार से है. इससे दुनिया के पर्यावरण, जैव विविधता, अर्थव्यवस्था, शासन और स्वास्थ्य पर भारी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. यह अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध का एक रूप है जो कई देशों में फैला हुआ है. इस अपराध के तहत वन्यजीवों का अवैध शिकार, तस्करी और अवैध संग्रह या कब्जा शामिल है.

विश्व वन्यजीव कोष (WWF) के अनुसार, वन्यजीव तस्करी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चौथा सबसे बड़ा संगठित अपराध है. इसकी कीमत प्रति वर्ष अनुमानित तौर पर 1500 करोड़ पाउंड है.

जंगली जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन साइट्स (CITES) का हिस्सा होने के बावजूद भारत वर्तमान में वन्यजीव तस्करी में शीर्ष 20 देशों में से एक है, और हवाई मार्ग द्वारा वन्यजीव तस्करी में शीर्ष 10 देशों में से एक है. भारत में दुनिया के 8% वन्यजीव पाए जाते हैं. भारत की इस विशाल विविधता पूर्ण प्रकृति और घनी मानव आबादी के कारण अवैध वन्यजीव और वन्यजीव उत्पादों के लिए यह एक स्रोत के साथ-साथ एक पारगमन देश (transit country) दोनों के रूप में कार्य करता है.

इसके अतिरिक्त, कई अन्य कारकों ने अवैध वन्यजीव व्यापार के खिलाफ लड़ाई को और अधिक कठिन बना दिया है. इनमें चीन, म्यांमार और अन्य दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की अवैध आवाजाही वाली अंतर्राष्ट्रीय सीमा, बढ़ता विमान बाजार, तेजी से बढ़ता एयरपोर्ट सेक्टर और वन्यजीव तस्करों द्वारा सोशल मीडिया का उपयोग मार्केट प्लेस की तरह किया जाना शामिल है. 

इसके अलावा, भारत में विदेशी वन्यजीव प्रजातियों के तस्करों ने 2020 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा जारी स्वैच्छिक प्रकटीकरण योजना का भी दुरुपयोग किया है. इस योजना का उद्देश्य भारत में विदेशी जानवरों के बढ़ते बाजार को नियम के तहत लाना था. भारतीयों के लिए 15 मार्च, 2021 से पहले बिना किसी दस्तावेज के विदेशी जंगली प्रजातियों के कब्जे की घोषणा करने की अनुमति देकर भारतीय प्रजातियों के व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया. इससे इस बाजार में और तेजी आई. 

तेलंगाना के एक चिड़ियाघर में एक एमु. विदेशी वन्यजीव प्रजातियों के तस्करों ने 2020 में सरकार द्वारा जारी स्वैच्छिक प्रकटीकरण योजना का दुरुपयोग किया. तस्वीर – कूरकुला दिव्या/विकिमीडिया कॉमन्स

इन कारणों के अलावा, भारत में विदेशी जानवरों के स्वामित्व से संबंधित कानूनों में बड़ी खामियां हैं. विदेशी वन्यजीव प्रजातियों को ले जाते पकड़े गए लोगों पर अपराध का आरोप तभी लगाया जा सकता है जब यह साबित हो सके कि उन्होंने उन जानवरों के साथ अवैध रूप से कोई अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की थी. बेंगलुरू के बाहरी इलाके में बचाए गए पक्षियों और जानवरों के लिए एक शिक्षा केंद्र और जीवों के लिए पालतू अभयारण्य के संस्थापक संजीव पेडनेकर का कहना है, “भारत में विदेशी प्रजातियों के स्वामित्व को नियमित करने वाली कोई नीति या कानून नहीं है. वन्यजीव संरक्षण कानून केवल भारतीय वन्यजीवों पर लागू होता है.”

भारत में सबसे अधिक किस प्रजाति का अवैध व्यापार किया जाता है?

चूंकि भारत वन्य जीवों और वन्य उत्पादों का न केवल एक प्रमुख स्रोत है, बल्कि तस्करी के लिए एक पारगमन देश भी है, इसलिए यहां से बड़ी संख्या में वन्य प्रजातियों को अवैध रूप से देश से बाहर ले जाया जाता है. डीआरआई (राजस्व खुफिया निदेशालय) के स्मगलिंग इन इंडिया रिपोर्ट 2020-21 के अनुसार, सबसे आम वन्यजीव और वन्यजीव उत्पाद जिन्हें भारत से बाहर तस्करी करते समय जब्त किया गया था, उनमें हाथी दांत, कछुए (विशेषकर भारतीय तारा कछुआ), और लाल चंदन है. फिलहाल भारत से गैंडे के सींग के व्यापार में गिरावट आई है. हालांकि, देश तेजी से पैंगोलिन के अवैध शिकार और तस्करी का एक प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है. बाघ के अंगों का व्यापार भी बेरोकटोक जारी है.

एक पैंगोलिन जिसे कलक्कड़ मुंडनथुराई टाइगर रिजर्व, तमिलनाडु के रेंज ऑफिस में लाया गया. भारत में पैंगोलिन का अवैध शिकार तेजी से बढ़ रहा है. तस्वीर – ए जे टी जॉनसिंह/विकिमीडिया कॉमन्स.

इसके अलावा ब्रम्हपुत्र नदी के बेसिन के ऊपरी हिस्से में पाई जाने वाली चन्ना बरका या स्नेकहेड और पश्चिमी घाट में पाई जाने वाली ज़ेबरा लोच जैसी सजावटी मछलियां अपने प्रकृतिक आवासों से विलुप्त होती जा रही हैं. जीवित मछलियों के एक्वैरियम की अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की मांग को पूरा करने के लिए उन्हें पकड़ा जाता है. सुनहरे सियार, एशियाई काले भालू, तेंदुआ (तांत्रिक उपयोग और पारंपरिक दवाओं के लिए) और नेवले (नेवले के बाल पेंटब्रश के लिए) के शरीर के अंगों के व्यापार के साथ वन्य जीवों की तस्करी बढ़ी है.

2020 में प्रकाशित ट्रेड रिकॉर्ड्स एनालिसिस ऑफ फ्लोरा एंड फॉना इन कॉमर्स (TRAFFIC) रनवे टू एक्सटिंक्शन रिपोर्ट के अनुसार, हालांकि भारत से बाहर भारतीय स्टार कछुओं की तस्करी कम हो रही है लेकिन लाल कान वाले स्लाइडर कछुओं की तस्करी बढ़ रही है. कंगारू, मर्मोसेट, टामेरीन्स जैसे विदेशी जानवरों और भारत से मैकाव्स (हिरामन तोता) और तोते जैसे पक्षियों को भारत से बाहर ले जाने के वाकये बढ़ रहे हैं. मार्च और अप्रैल 2022 के दौरान पश्चिम बंगाल में डीहाईड्रेडेड (निर्जलित) और बीमार कंगारुओं के बचाए जाने वाले वीडियो के साथ इस कड़ी में नवीनतम रिपोर्ट सामने आई.

वन्यजीवों और वन्यजीव उत्पादों के अवैध आयात और निर्यात के अलावा, भारत में वन्यजीवों के मांस और पारंपरिक चिकित्सा के लिए शरीर के अंगों का जबरदस्त घरेलू बाजार है, जिसमें मीठे पानी के कछुए और मेंढक शामिल हैं.

भारत में जंगली प्रजातियों की तस्करी का आम रास्ता

भारत में और उसके बाहर अंतर्राष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी मुख्य रूप से दो मार्गों से होती है. एक, पूर्वोत्तर के साथ लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा के माध्यम से और दूसरा, हवाई अड्डों के माध्यम से. 2018 ट्रैफिक रिपोर्ट इन प्लेन साइट में कहा गया है कि गैंडे के सींग, बाघ के अंगों और पैंगोलिन की तस्करी विशेष रूप से भारत-नेपाल और भारत-म्यांमार-चीन सीमाओं पर बड़े पैमाने पर होती है, जिसमें पूर्वोत्तर भारतीय शहरों जैसे दीमापुर, गुवाहाटी और इंफाल का उपयोग एक पारगमन स्थल के रूप में किया जा रहा है. भारत-बांग्लादेश सीमा पर पक्षियों और सरीसृपों की तस्करी भी बड़े पैमाने पर होती है. हाल ही में, उत्तरी पश्चिम बंगाल में डुआर्स क्षेत्र, विशेष रूप से, जलपाईगुड़ी शहर, विदेशी जानवरों और पक्षियों की तस्करी के लिए एक उभरते हुए पारगमन केंद्र के रूप में सामने आया है.

भारत में और बाहर सरीसृपों, विशेष रूप से कछुओं की तस्करी बड़े पैमाने पर होती है, चेन्नई और मुंबई हवाई अड्डे इस गतिविधि के प्रमुख केंद्र हैं. भारतीय तारा कछुआ, जो दुनिया में सबसे अधिक तस्करी वाला सरीसृप है, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु के व्यापार केंद्रों से मुख्य रूप से हवाई मार्ग से थाईलैंड, सिंगापुर और मलेशिया तक पहुंचाया जाता है. लुप्तप्राय प्रजातियों के गैरकानूनी व्यापार के अवसरों को कम करने वाली वेबसाइट ‘रूट्’ (ROUTE) के आंकड़ों से पता चलता है कि तस्करी किए गए जानवरों में से 54% से अधिक को चेक-इन सामान से और लगभग 11% एयर कार्गो से बरामद किया गया. जिन शीर्ष भारतीय शहरों के हवाई अड्डे पर जब्ती होती है, उनमें चेन्नई, कोलकाता, मुंबई और दिल्ली शामिल हैं, इसमें विशेष रूप से चेन्नई हवाईअड्डे में सरीसृप की बरामदगी अधिक होती है.

भारत में वन्यजीव तस्करी के कारण और उससे होने वाले पर्यावरणीय नुकसान

भारत में वन्यजीवों की तस्करी के कई कारण हैं. इनमें से सबसे प्रमुख लग्जरी उत्पादों के निर्माण में उपयोग के लिए लाल चंदन और हाथीदांत और पारंपरिक चिकित्सा के लिए पशु-अंग, विशेष रूप से गैंडे के सींग और बाघ के अंग जैसे कच्चे माल की मांग है. वर्ल्ड वाइल्डलाइफ क्राइम रिपोर्ट 2020 में कहा गया है कि हालांकि 2011 के बाद से गैंडे के सींग और हाथीदांत के मांग की वैश्विक बाजार में लगातार गिरावट आई है, लेकिन पैंगोलिन और यूरोपीय ग्लास ईल जैसी नई मांगें बाजार में सामने आई हैं. असम में स्थानीय जनजातियों द्वारा पैंगोलिन का बहुत अधिक शिकार किया जाता है, वे मांस खाते हैं और बेचते हैं. इस वजह से पर्याप्त मात्रा में पाया जाने वाला यह जानवर अब अपेक्षाकृत दुर्लभ हो गया है. चीन और वियतनाम में पारंपरिक दवा बाजार पैंगोलिन, राइनो सींग, और विभिन्न बड़ी बिल्लियों, पक्षियों, एशियाई काले भालू, कस्तूरी मृग, भेड़िये और सियार की त्वचा और शरीर के अंगों के प्रमुख उपभोक्ता हैं.

एक अन्य कारण जिसकी वजह से वन्यजीवों की तस्करी होती है, वह है मांस की मांग. कई जानवर जैसे कि बंगाल स्लो लोरिस, उत्तर प्रदेश के सॉफ्टशेल कछुए, हिरण, मृग, जंगली मवेशी और यहां तक ​​​​कि समुद्री खीरे मुख्य रूप से मांस की खपत के लिए तस्करी किए जाते हैं.

नीले और पीले मैकॉ (हिरामन तोता). भारत में वन्यजीवों की तस्करी के लिए एक प्रमुख कारण मैकॉ जैसे विदेशी पालतू जानवरों की बढ़ती मांग है. तस्वीर – स्वप्निल श्रीवास्तव/विकिमीडिया कॉमन्स.

भारत में वन्यजीव तस्करी के लिए तीसरा प्रमुख कारण विदेशी पालतू जानवरों, विशेष रूप से कॉकटू, मैकॉ और ग्रे तोते जैसे पक्षियों की बढ़ती मांग है. इसके अलावा, कई भारतीय पक्षी, मछली और सरीसृप की वैश्विक बाजारों में काफी मांग है. इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात हाल ही में इंदौर के चिड़ियाघर का मिजोरम के एक ‘खेत’ से कंगारुओं को ले जाना है. इस घटना से ऐसा लगता है कि चिड़ियाघर भी अवैध रूप से विदेशी जानवरों को खरीदने में शामिल हो सकते हैं.

वन्यजीव व्यापार न केवल उनके प्राकृतिक निवासियों के वातावरण को नष्ट कर देता है, बल्कि आक्रामक प्रजातियों के प्रसार और नए ज़ूनोस (जानवरों की एक बीमारी) होने जैसे अतिरिक्त खतरों के लिए भी जिम्मेदार है. तीन वजह से पूरा पारिस्थितिकी तंत्र ध्वस्त हो सकता है और बड़ी बीमारी का प्रकोप फ़ैल सकता है. इबोला, मारबर्ग वायरस रोग, सार्स (गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम), और सबसे हालिया कोविड महामारी. ये सभी संक्रामक रोग उन क्षेत्रों में उत्पन्न हुए हैं जहां इंसानों का जंगली जीवों से संपर्क हुआ था. भारत में वन्यजीवों की तस्करी तेजी से बाघों, हाथियों, गैंडों, पैंगोलिन, तारा कछुओं और कई अन्य देशी प्रजातियां खतम हो रही हैं. इसके साथ ही, लाल-कान वाले स्लाइडर कछुए (जो लोकप्रिय पालतू जानवर हैं) और सकरमाउथ सेलफिन कैटफ़िश (एक प्रकार की मछली) जैसी आक्रामक प्रजातियां प्राकृतिक आवासों को नष्ट कर रही हैं.

भारत में वन्यजीवों की तस्करी को कम करने के लिए क्या किया जा रहा है और जब्त किए गए जानवरों का क्या होता है?

डीआरआई, तस्करी के खिलाफ लड़ाई में सबसे आगे है. उसने भारत के अंदर और बाहर वन्यजीवों की तस्करी का मुकाबला करने के लिए विश्व सीमा शुल्क संगठन की हरित सीमा शुल्क के साथ मिलकर काम किया है. वन्यजीव तस्करी में हवाई परिवहन के बढ़ते उपयोग का मुकाबला करने के लिए, भारत में कानून प्रवर्तन एजेंसियों को वन्यजीव तस्करी से लड़ने में मदद करने के लिए विश्व वन्यजीव कोष-भारत (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी) ने संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के साथ मिलकर कुछ तकनीक विकसित किया है.

इसके अलावा, अंतर्राष्ट्रीय हवाई परिवहन संघ (IATA) के पास हवाई परिवहन के माध्यम से वन्यजीवों की तस्करी के बारे में जागरूकता फैलाने में मदद करने के लिए 20 मिनट का एक छोटा प्रशिक्षण मॉड्यूल भी है. बेंगलुरु में हवाई-अड्डा अधिकारियों ने जंगली जीवों की तस्करी से निपटने के लिए एक वन प्रकोष्ठ भी स्थापित किया है. वन्यजीव संरक्षण सोसायटी-भारत द्वारा संचालित काउंटर वाइल्डलाइफ ट्रैफिकिंग कार्यक्रम, राज्य के वन विभागों, पुलिस बलों, सीमा शुल्क अधिकारियों, सीमा सुरक्षा बल इकाइयों और यहां तक ​​कि न्यायपालिका के लिए अपराध स्थल की जांच करने में मदद के लिए प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित करता है.

इन पहलकदमी के अलावा, डब्ल्यूसीसीबी ने वास्तविक समय के डेटाबेस में अपराधियों की प्रोफाइलिंग शुरू कर दी है और जल्द ही पड़ोसी देशों (नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार) के साथ सीमा पार वन्यजीव अपराध को रोकने के लिए नेटवर्क तैयार करेगा.

डीएनए परीक्षण और जैव सूचना विज्ञान सहित आणविक जीव विज्ञान उपकरणों का उपयोग वन्यजीव फोरेंसिक में भी किया जा रहा है ताकि तस्करी किए गए पशु उत्पादों की उत्पत्ति स्थान की पहचान की जा सके. इसके अलावा, नागरिक विज्ञान की पहल, डॉग स्क्वॉड, और विभिन्न डीएनए डेटाबेस और संदर्भ पुस्तकालयों का उपयोग अवैध शिकार और वन्यजीव व्यापार के लिए अतिसंवेदनशील जानवरों की आबादी की निगरानी के लिए किया जा रहा है. अवैध शिकार के खिलाफ एक सख्त संदेश देने के लिए भारत, जब्त किए गए वन्यजीव उत्पादों को भी नष्ट कर देता है.

हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद भारत में वन्यजीवों की तस्करी अभी भी बड़े पैमाने पर है. भारत की साइट्स (CITES) सदस्यता, इसके मजबूत कानून (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972) और देशी पौधों, जानवरों के 1,800 से अधिक प्रजातियों और उनके उत्पादों के व्यापार पर प्रतिबंध भी वन्यजीव तस्करी से निपटने में अप्रभावी हैं, क्योंकि इन कानूनों/सलाहों को अक्सर बेहतर तरीके से संप्रेषित और लागू नहीं किया गया. इसके अलावा, वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में तस्करी की गई विदेशी प्रजातियों से निपटने के लिए भारत को और मजबूत कानूनों की आवश्यकता है, यह एक बड़ी कमी है. जिसकी वजह से तस्कर विदेशी व्यापार का शोषण करते हैं.

भारतीय तारा कछुआ दुनिया में सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले सरीसृपों में से एक है. तस्वीर – एन ए नज़ीर / विकिमीडिया कॉमन्स.

ज्यादातर, जब भारत में तस्करी करके लाए गए विदेशी जीवित जानवरों को जब्त कर लिया जाता है, तो उन्हें बचाव केंद्रों या अभयारण्यों में भेज दिया जाता है. चूंकि चिड़ियाघर आमतौर पर भारतीय मूल वन्यजीवों को प्रदर्शित करने के लिए होते हैं, इसलिए उनके पास अक्सर जब्त किए गए विदेशी जानवरों को ठीक से रख-रखाव करने के लिए उपयुक्त बाड़े और जगह नहीं होते हैं.

संजीव के अभयारण्य, ‘प्राणी’ में वर्तमान में कई एक्सोटिक्स हैं, जैसे इगुआना, मॉनिटर लिजार्ड, लाल-कान वाले स्लाइडर, और इमू. संजीव कहते हैं “प्राणी में हमारे पास मौजूद लगभग 90% विदेशी पक्षी, हमारे इगुआना के साथ, उन लोगों द्वारा छोड़ दिए गए थे जो अब उनकी देखभाल नहीं कर सकते थे. कभी-कभी हम अपने ईमू जानवरों को भी तस्करों से बचाते हैं.”, उन्होंने आगे कहा, “इसके अलावा, प्राणी बेंगलुरु में हवाई अड्डे के अधिकारियों, वन विभाग और भारतीय पशु कल्याण बोर्ड के साथ भी काम कर रही है. वे अक्सर जब्त किए गए जानवरों को हमें सौंप देते हैं. एक यादगार उदाहरण जो मेरे दिमाग में है, जब हमें सौ से अधिक छोटे हैमिल्टन कछुओं की देखभाल करनी पड़ी, जो कि दुनिया में कछुओं की सबसे लुप्तप्राय प्रजातियों में से एक है. उन कछुओं को केम्पेगौड़ा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर जब्त किया गया था.” 

संजीव ने अफसोस के साथ स्वीकार किया कि वह अक्सर इस डर से लाल कान वाले स्लाइडर लेते हैं, क्योंकि लोग उन्हें स्थानीय झीलों और तालाबों में छोड़ देंगे, जहां ये इलाके का पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर सकते हैं और देशी प्रजातियों को मार सकते हैं. चूंकि सीआईटीईएस (CITES) का नियम आम तौर पर विदेशी प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवासों में फिर से रखने की अनुमति नहीं देते है (बहुत जरुरी परिस्थितियों को छोड़कर). जीवों की स्वतः मृत्यु या आजीवन कैद ही तस्करी के शिकार से निपटने का एकमात्र तरीका है.

चूंकि अधिकांश लोग स्वतः मृत्यु के विचार को भी हलके में नहीं लेंगे. आमतौर पर कैद में विदेशी जीव की निंदा की जाती है. उन्होंने आगे कहा, “भारत में तस्करी की गई कई विदेशी प्रजातियां – जैसे कैपुचिन, मार्मोसेट और वॉलबीज, जिसे बेचे जाने पर अच्छी रकम मिलती है. ये सभी जीव बाजार में वापस आ जाते हैं, जबकि लाल कान वाले स्लाइडर जैसे अन्य जीव या तो बचाव केंद्रों में छोड़ दिए जाते हैं या अन्यत्र तरीके से कहीं भी छोड़ दिए जाते हैं.”

(यह लेख मुलत: Mongabay पर प्रकाशित हुआ है.)

बैनर तस्वीर: लाल कान वाला स्लाइडर कछुआ. अक्सर जब लोग पालतू जानवरों के रूप में इन विदेशी जानवरों की देखभाल करने में असमर्थ होते हैं, तो वे उन्हें देखभाल केंद्रों या अभयारण्यों में छोड़ देते हैं. आमतौर पर बाहरी जीवों को कैद करने की निंदा की जाती है. तस्वीर – नोबो ज़िअस/ पिक्साबे.

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