25 जून विशेष: मदन मोहन — एक साज़ जो आज भी बजता है
25 जून को महान संगीतकार मदन मोहन साहब की जयंती पर पढ़िए उनके जीवन, संगीत सफर, लता मंगेशकर संग रिश्ते और ‘Veer-Zaara’ के अमर गीतों की कहानी. जानिए एक सरल, आत्मसम्मानी और भावुक इंसान की दास्तां, जिसने भारतीय फिल्म संगीत को रूह दी.
हर साल 25 जून की तारीख आते ही दिल के किसी कोने में एक पुरानी रागिनी जाग उठती है. जैसे वक्त पलटकर उसी मोड़ पर आ खड़ा हो, जहाँ कोई धुन हवा में घुल रही हो — नर्म, मधुर, और बेहद अपनी. एक मीठी सी याद, एक पुरानी धुन की गूंज... जैसे कहीं दूर से कोई तानपुरा बज रहा हो, कोई ग़ज़ल धीरे-धीरे कानों में उतर रही हो.
यह दिन सिर्फ एक तारीख नहीं, मेरे जैसे लाखों संगीत प्रेमियों के लिए एक एहसास है... जैसे कोई भूली-बिसरी ग़ज़ल फिर से ज़िंदगी में दस्तक दे रही हो. और इस एहसास का नाम है — मदन मोहन साहब (Madan Mohan).
उनकी धुनें बचपन से लेकर अब तक, उम्र के हर पड़ाव, हर सफ़र में मेरा सुकून बनीं. जब पहली बार मैंने फ़िल्म 'चिराग' का ‘तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है’ गीत सुना तो समझ आया की मोहब्बत क्यूं इतनी खूबसूरत होती है. और जब ज़िंदगी किसी मोड़ पर अजनबी सी लगी, तब भी 'लग जा गले' (फ़िल्म 'वह कौन थी?') ने जैसे गले लगाया.
मुझे नहीं पता कि वो कौन-सी कशिश थी उनके संगीत में — शायद उनका सादापन, उनकी शायरी से लिपटी धुनें, या फिर उनकी आवाज़ों की पाकीज़गी. पर इतना जानता हूं कि उनका संगीत सिर्फ कानों से नहीं, दिल से सुना जाता है.
मैं उन्हें कभी मिला नहीं, कभी देखा भी नहीं, पर उनके गीतों में जैसे उनकी पूरी शख्सियत बसती है — एक तन्हा, शांत, लेकिन बेहद मोहब्बत करने वाला इंसान, जो दुनिया से ज्यादा अपने रियाज़ में खोया रहता था.
तो आज, जब पूरा सोशल मीडिया शोर में डूबा है, मैं आपको ले चलना चाहता हूं मदन मोहन साहब की उस दुनिया में, जहां संगीत का मतलब सिर्फ धुन नहीं, जज़्बात होता था.
जहां हर ग़ज़ल किसी टूटे दिल की आवाज़ थी.
जहां एक संगीतकार ने शोहरत की भीड़ से दूर बैठकर ऐसा संगीत रचा, जो वक़्त को भी मात दे गया.
आईए, इस ख़ास दिन पर हम उनके पूरे सफ़र को फिर से जीएं — उनकी पहली धुन से लेकर ‘वीर-ज़ारा’ (Veer-Zaara) की रूहानी वापसी तक.
ये कहानी सिर्फ एक महान संगीतकार की नहीं, उस फनकार की है जिसने संगीत को इबादत बनाया.

मदन मोहन कोहली का जन्म 25 जून 1924 को बगदाद (इराक) में हुआ था.
बचपन, बैकग्राउंड और शुरुआती जीवन
मदन मोहन कोहली (Madan Mohan Kohli) का जन्म 25 जून 1924 को बगदाद (इराक) में हुआ था, जहां उनके पिता राय बहादुर चुन्नी लाल कोहली (Rai Bahadur Chunilal Kohli) ब्रिटिश सरकार की नौकरी में थे. कुछ वर्षों बाद उनका परिवार भारत लौट आया और लाहौर, फिर मुंबई में बस गया. पिता फ़िल्म निर्माता थे और बॉम्बे टॉकीज़ से जुड़े हुए थे.
मदन मोहन का रुझान शुरू से ही संगीत की तरफ़ था. उन्होंने लखनऊ के भातखंडे संगीत संस्थान में शास्त्रीय संगीत की तालीम ली. लेकिन यह पढ़ाई अधूरी ही रह गई क्योंकि उनके पिता चाहते थे कि वो कोई ‘अच्छी नौकरी’ करें. मदन मोहन ने भारतीय सेना में अफसर की नौकरी भी की, लेकिन सुरों का जुनून उन्हें वापस खींच लाया.
संगीत की दुनिया में पहला कदम और सफर
सेना की नौकरी छोड़कर वे ऑल इंडिया रेडियो, लखनऊ में शामिल हो गए. वहीं पर उन्होंने बेग़म अख़्तर, तलत महमूद जैसे कलाकारों के साथ काम किया और संगीत के असली मायने सीखे. धीरे-धीरे उन्होंने फिल्मों की ओर कदम बढ़ाया.
साल 1947 में उन्हें पहली बार दो ग़ज़लें रिकॉर्ड करने का मौका मिला, जिन्हें बेहज़ाद लखनवी ने लिखा था — "आने लगा है कोई नज़र जलवा गर मुझे" और "इस राज़ को दुनिया जानती है".
इसके बाद, 1948 में उन्होंने दीवान शरर की लिखी दो और निजी ग़ज़लें रिकॉर्ड कीं — "वो आए तो महफ़िल में इठलाते हुए आए" और "दुनिया मुझे कहती है कि मैं तुझको भुला दूं".
साल 1948 में ही उन्हें पहली बार फिल्मी गीत गाने का मौका मिला. उन्होंने लता मंगेशकर के साथ एक युगल गीत गाया — "पिंजरे में बुलबुल बोले, मेरा छोटा सा दिल डोले" फिल्म शहीद के लिए. इस गाने की धुन मशहूर संगीतकार गुलाम हैदर ने बनाई थी. हालांकि, यह गीत कभी फिल्म में इस्तेमाल नहीं हुआ और न ही जारी किया गया.
इसके बाद मदन मोहन ने कुछ समय तक प्रसिद्ध संगीतकारों की मदद की. उन्होंने एस.डी. बर्मन की फिल्म दो भाई में और श्याम सुंदर की फिल्मों एक्ट्रेस और निर्दोष (1948–1949) में सहायक के रूप में काम किया.
1950 में पहली बार मदन मोहन साहब का नाम बड़े पर्दे पर एक संगीत निर्देशक के रूप में आया। उनकी पहली फिल्म थी — 'आंखें'. फिल्म आंखें (1950) में ही उनका पहला रिकॉर्डेड गीत था —"प्रीत लगाकर मैंने ये फल पाया", जिसे गायक मुकेश ने गाया था.
अपने 25 साल के संगीत करियर में मदन मोहन साहब ने कुल 95 रिलीज़ हिंदी फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया (कुल 648 गाने). 12 अधूरी रह गई फिल्मों के लिए भी उन्होंने 28 गाने बनाए. एक डॉक्यूमेंट्री (Films Division द्वारा निर्मित) के लिए भी एक गीत बनाया.
मगर सच कहा जाए तो मदन मोहन साहब की असली पहचान बनी उनके ‘ग़ज़लनुमा’ गीतों से, जिसमें दर्द, मोहब्बत और तन्हाई के रंग होते थे.

अपने 25 साल के संगीत करियर में मदन मोहन साहब ने कुल 95 रिलीज़ हिंदी फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया.
मदन मोहन और लता मंगेशकर: सुरों की एक रूहानी जोड़ी
अगर मदन मोहन साहब की बात हो और लता मंगेशकर का ज़िक्र न हो, तो कहानी अधूरी रह जाएगी. लता दीदी ने एक बार कहा था:
“मदन भैया मेरे लिए सिर्फ़ संगीतकार नहीं थे, वो मेरे सुरों के सबसे सच्चे साथी थे.”
उनके साथ उन्होंने “वो चुप रहें तो मेरे दिल के दाग़ जलते हैं”, “लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो”, “नैना बरसे रिमझिम रिमझिम” जैसे अनगिनत अमर गीत गाए. लता की आवाज़ और मदन मोहन साहब के सुर — एक ऐसा संगम जिसने हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत को नयी ऊँचाइयाँ दीं.
ग़ज़लों का शहज़ादा
फिल्मी दुनिया में मदन मोहन साहब को "ग़ज़लों का शहंशाह" (King of Gazals) कहा जाने लगा. उनकी ग़ज़लें सिर्फ गीत नहीं थीं, वो एक शायरी होती थीं जो दिल को छू जाती थीं. तलत महमूद, लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी साहब ने उनकी धुनों को अपनी आवाज़ से संवारा है.
लता दीदी ने उन्हें "ग़ज़लों का शहज़ादा" नाम दिया था.
राजा मेहदी अली खान, कैफ़ी आज़मी, साहिर लुधियानवी, राजेंद्र कृष्ण और मजरूह सुल्तानपुरी जैसे दिग्गजों के साथ उन्होंने ऐसी नज्में रचीं जो आज भी जिंदा हैं. 'वीर-ज़ारा' फ़िल्म के लिए उनकी धुनों पर जावेद अख़्तर साहब ने गीत लिखे.
निजी जीवन में सादगी की मिसाल
मदन मोहन साहब की शख्सियत भी उनके संगीत जैसी ही थी — गंभीर, सच्ची और सादगी से भरी. मीडिया रिपोर्ट्स और इंटरव्यूज़ में उनके बेटे संजीव कोहली (Sanjeev Kohli) बताते हैं कि:
“पापा को कभी तड़क-भड़क पसंद नहीं थी. वो अपने रियाज़, किताबों और परिवार में ही खुश रहते थे. उन्हें कभी शोहरत का घमंड नहीं हुआ.”
मदन मोहन साहब का संघर्ष रहा, खासकर जब उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो पाईं लेकिन उनके संगीत को हमेशा सराहा गया.
14 जुलाई 1975 को 51 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ. दिल की बीमारी से पीड़ित होने के बावजूद, वे अंतिम समय तक संगीत में डूबे रहे. एक सच्चा फनकार कभी संगीत से जुदा नहीं होता — और मदन मोहन साहब इसका जीता-जागता उदाहरण हैं.

2004 में पर्दे पर आई फ़िल्म ‘Veer-Zaara’ के संगीत ने मदन मोहन साहब को दोबारा ज़िंदा कर दिया.
वीर-ज़ारा: मदन मोहन – फिर से जिए सुरों में
2004 में यश चोपड़ा साहब (Yash Chopra) ने फ़िल्म ‘Veer-Zaara’ बनाई. इस फ़िल्म के संगीत ने मदन मोहन साहब को दोबारा ज़िंदा कर दिया. उनके बेटे संजीव कोहली ने उनके पुराने अनरिलीज़ कम्पोज़िशन्स को यश जी को सुनाया. उनके देहांत के लगभग 30 साल बाद उनकी धुनों को आवाज़ मिली और उनका नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हुआ.
यश जी ने Veer-Zaara की Making Of The Songs डॉक्यूमेंट्री में कहा:
“जब मैंने वो धुनें सुनीं, मुझे लगा जैसे खुदा की आवाज़ सुन रहा हूं. उस दौर की मासूमियत और गहराई वापस आ गई.”
फ़िल्म के गाने — ‘तेरे लिए’ (Tere Liye), ‘दो पल’ (Do Pal), ‘ऐसा देश है मेरा’ (Aisa Des Hai Mera) — सब मदन मोहन साहब की रचनाएं थीं जिन्हें लता दीदी, रूप कुमार राठौड़, उदित नारायण और सोनू निगम ने गाया.
लता दीदी ने कहा:
“मदन भैया की आत्मा को तसल्ली मिली होगी कि उनका संगीत फिर से लोगों तक पहुंचा.”
मैंने मदन मोहन साहब से क्या सीखा
जब मैं मदन मोहन साहब के जीवन और संगीत को महसूस करता हूं, तो ऐसा लगता है जैसे मैंने किसी किताब को नहीं, किसी सूफी को पढ़ा हो.
उनसे मैंने सीखा — सादगी क्या होती है.
उन्होंने कभी दिखावे का रास्ता नहीं अपनाया, कभी बाजारू सफलता के पीछे नहीं भागे. उनकी आंखों में हमेशा एक ठहराव, और उनके चेहरे पर एक शांत मुस्कान रहती थी — जैसे उन्हें दुनिया से कुछ नहीं चाहिए, सिर्फ अपने सुरों की संगत.
आत्मसम्मान का मतलब मैंने उनसे जाना. जब उनकी फिल्में नहीं चलीं, और उन्हें कमतर आंका गया, तब भी उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया. खुद पर यकीन रखा और वही किया जो उन्हें आता था — सच्चा संगीत रचना.
वो खुद से बने हुए इंसान थे — ना किसी बड़े स्कूल का नाम, ना किसी गॉडफादर का सहारा. सिर्फ अपनी मेहनत, अपनी ईमानदारी और अपने फ़न पर भरोसा.
सबसे बड़ी बात, मदन मोहन साहब एक बेहद संवेदनशील इंसान थे. यह सिर्फ उनके संगीत में नहीं, बल्कि उनके रिश्तों में भी झलकता था. दोस्तों के लिए, परिवार के लिए, अपने गायक-गायिकाओं के लिए वो पूरी तरह समर्पित रहते थे. उनकी हर धुन, हर इंटरल्यूड, हर गीत जैसे किसी गहरे जज़्बे से जन्मा हो.
उनसे मैंने सीखा कि गहराई सिर्फ आवाज़ में नहीं, सोच में भी होनी चाहिए. आज जब ज़िंदगी की रफ्तार तेज़ है, हर कोई सफल होना चाहता है, वहां मदन मोहन साहब जैसे लोग याद दिलाते हैं कि असली कामयाबी वो है जो रूह को छू जाए — और वक्त के पार ज़िंदा रहे.
मदन मोहन साहब, आपने हमें सुर नहीं, सलीका सिखाया है.
आपकी रचनाएं सिर्फ सुनने की चीज़ नहीं हैं — वो महसूस करने का तरीका हैं.
अंतिम अल्फ़ाज़
आज जब मैं मदन मोहन साहब को याद करता हूं, तो केवल एक संगीतकार नहीं, बल्कि एक रूह को महसूस करता हूं. उनकी धुनों में जो इश्क, दर्द और उम्मीद है — वो समय से परे है.
उनका हर गाना एक ख़त है — किसी खोए हुए प्यार के नाम, किसी अधूरी दास्तां के नाम.
और मैं आज भी कभी अकेले में “लग जा गले” सुनता हूं तो लगता है जैसे मदन मोहन साहब सामने बैठे हैं, अपने सुरों से मेरी रूह को सहला रहे हैं.
~ मैं, रवि — आपका मुरीद, जिसके दिल में अब भी आपकी एक धुन हर रोज़ बजती है…
मैं यहाँ हूँ... यहाँ हूँ
यहाँ हूँ... यहाँ...
(आलेख में संलग्न सभी तस्वीरें साभार madanmohan.in वेबसाइट से ली गईं हैं)


