कैसे अमरोहा की ढोलक बनी उत्तर प्रदेश की पहचान की आवाज़
उत्तर प्रदेश के अमरोहा की ढोलक केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा शिल्प और स्थानीय अर्थतंत्र है। आम की लकड़ी, कुशल हाथों और त्योहारों से जुड़ी इस हस्तनिर्मित ढोलक की कहानी आज भी परंपरा और बाज़ार को जोड़ती है।
उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में ढोलक केवल एक वाद्य यंत्र नहीं है। यह एक ऐसा कार्यशील उत्पाद है, जो घरों, मंदिरों, शादियों की बारातों, मोहल्लों की बैठकों और देशभर के त्योहारों में सहज रूप से गूंजता है। इसी के साथ यह एक पूरे स्थानीय शिल्प-आधारित अर्थतंत्र को भी जीवित रखता है।
अमरोहा की ढोलक की कहानी लकड़ी से शुरू होती है। पीढ़ियों से कारीगर ढोलक के ढांचे के लिए आम की लकड़ी का उपयोग करते आ रहे हैं। यह लकड़ी हल्की होती है, संतुलित रहती है और खिंचाव सहने में सक्षम होती है। बुज़ुर्ग कारीगर आज भी उस समय को याद करते हैं, जब न बिजली थी और न मशीनें। तब काम बागों और छोटे-छोटे शेड्स में केवल हाथों के औज़ारों से होता था। कई बार एक छोटी टीम पूरे दिन में सिर्फ एक लकड़ी का खोल ही तैयार कर पाती थी।
आज भले ही कार्यशालाओं में कुछ बुनियादी मशीनें आ गई हों, लेकिन ढोलक की हस्तनिर्मित प्रकृति अब भी बनी हुई है। राजीव कुमार प्रजापति, जो राम म्यूज़िकल हैंडीक्राफ्ट चलाते हैं और स्थानीय शिल्प संस्थाओं से जुड़े हैं, बताते हैं कि मशीनें कुछ चरणों में सहायक हो सकती हैं, लेकिन ढोलक का निर्माण आज भी मुख्यतः कुशल हाथों पर ही निर्भर करता है। उनके अनुसार, लगभग 90–95 प्रतिशत कार्य अब भी हाथ से ही किया जाता है।
निर्माण की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। लकड़ी के लट्ठों को छोटे टुकड़ों में काटा जाता है, छाल हटाई जाती है, घुमावदार ढांचे पर आकार दिया जाता है और अंदर से खोखला किया जाता है। इसके बाद रंग-रोगन होता है। सबसे महत्वपूर्ण चरण इसके बाद आता है—फिनिशिंग, जो ढोलक की आवाज़ तय करती है। बकरी की खाल को सावधानी से खींचकर ढांचे पर चढ़ाया जाता है, जिससे वह सुर और गूंज पैदा होती है, जो ढोलक को उसकी विशिष्ट पहचान देती है।
समय के साथ ढोलक ने बाज़ार और पसंद के अनुसार खुद को ढाला है। कभी रस्सी से बंधी ढोलकें ही प्रचलन में थीं, लेकिन आज नट-बोल्ट वाली ढोलकें भी उतनी ही लोकप्रिय हैं। मांग भारत के त्योहारों के कैलेंडर के साथ चलती है। शिवरात्रि और सावन के महीने में डमरू जैसे छोटे वाद्य यंत्रों की मांग बढ़ती है, जबकि शादी-विवाह के मौसम और नवरात्रि जैसे पर्वों में ढोलक की मांग चरम पर होती है। इस तरह, कारोबार की लय भी उत्सवों की लय से जुड़ी रहती है।
अमरोहा को खास बनाता है इस शिल्प पर निर्भरता का पैमाना। राजीव के अनुसार, ज़िले में हज़ारों लोग ढोलक निर्माण से जुड़े हैं—लकड़ी काटने वाले, आकार देने वाले, रंग करने वाले, खाल चढ़ाने वाले, पैकिंग करने वाले और व्यापारी। उनकी अपनी इकाई में ऑर्डर के अनुसार लगभग 30–35 कुशल कारीगर काम करते हैं। भले ही ढोलकें देश के दूर-दराज़ बाज़ारों में बिकें, लेकिन उसका मूल लकड़ी का ढांचा—जो इसकी आत्मा है—आज भी अमरोहा में ही बनता है।
Edited by Ravi Pareek


