दुलारी देवी: 12 साल की उम्र में शादी, पति ने छोड़ा, बेटी की मौत… और फिर मिला पद्मश्री अवार्ड
मधुबनी की प्रसिद्ध कलाकार दुलारी देवी की प्रेरक कहानी. 12 साल में शादी, पति का साथ छूटा और बेटी की मौत के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी. मधुबनी पेंटिंग के जरिए अपने दर्द को रंगों में बदलते हुए उन्होंने पहचान बनाई और 2021 में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया.
बिहार के मधुबनी जिले के एक छोटे से गांव रांटी की रहने वाली दुलारी देवी की कहानी सुनकर कोई भी भावुक हो सकता है. उनका जीवन आसान नहीं था. बचपन में गरीबी, छोटी उम्र में शादी, पति का साथ छूटना और फिर अपनी इकलौती बेटी को खो देना. इन सबके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने अपने दर्द को रंगों में बदल दिया.
आज वही दुलारी देवी (Padma Shri Dulari Devi) मधुबनी पेंटिंग (Madhubani painting) की प्रसिद्ध कलाकार हैं और उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा जा चुका है.
दुलारी देवी कहती हैं, “मैंने अपने दर्द को रंगों में बदल दिया. अगर ऐसा नहीं करती तो शायद मैं जी ही नहीं पाती.”
गरीबी में बीता बचपन
दुलारी देवी का बचपन बहुत कठिन परिस्थितियों में बीता. उनका परिवार बेहद गरीब था. घर में पढ़ाई का कोई माहौल नहीं था. किताब और स्कूल जैसी चीजें उनके जीवन का हिस्सा ही नहीं थीं.
वह बताती हैं कि उनका परिवार मजदूरी करता था. दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था. पिता के साथ वह तालाब में मछली पकड़ने जाती थीं और मखाना भी निकालती थीं. मौसम कैसा भी हो, काम करना जरूरी था.
जब वह अभी छोटी ही थीं तब उनके पिता का निधन हो गया. इसके बाद घर की जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई. कई बार ऐसा भी होता था कि घर में खाना नहीं बनता था.
12 साल की उम्र में शादी
दुलारी देवी जब सिर्फ 12 साल की थीं तभी उनकी शादी कर दी गई. वह खुद भी उस समय बच्ची ही थीं. ससुराल में बड़ा परिवार था और सबको काम करना पड़ता था.
वह मछली और घास बेचने जाती थीं ताकि घर का खर्च चल सके. लेकिन उनका वैवाहिक जीवन खुशहाल नहीं था. उनके पति का स्वभाव बहुत गुस्सैल था.
दुलारी बताती हैं कि कई बार उनके पति आधी रात में उन्हें घर से निकाल देते थे. ऐसे समय में वह पड़ोसियों के घर में रात बिताती थीं.
एक दिन जब उन्हें फिर घर से निकाल दिया गया तो वह अपने मायके लौट आईं. उस समय उनकी शादी को सात साल हो चुके थे. इसके बाद वह कभी ससुराल नहीं लौटीं.
बेटी के सहारे जीने की उम्मीद, लेकिन...
मायके आने के बाद उनकी एक बेटी हुई. बेटी के जन्म से घर में खुशियां आईं. दुलारी देवी के जीवन में वही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई.
उन्होंने अपनी बेटी का नाम शकुंतला रखा. उन्होंने तय किया कि अब वह अपनी बेटी के साथ ही जिंदगी बिताएंगी.
लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था.
कुछ समय बाद उनकी बेटी बीमार पड़ गई. उसे अस्पताल ले जाया गया. डॉक्टरों ने बताया कि उसे टायफाइड है. इलाज के बावजूद उसकी हालत बिगड़ती गई.
एक हफ्ते बाद उनकी बेटी की मौत हो गई. उस पल को याद करते हुए दुलारी देवी कहती हैं, “मेरे सामने मेरी बेटी का शरीर पड़ा था. मुझे लगा कि मेरी दुनिया खत्म हो गई.”
अस्पताल की दीवार पर बनाई पहली पेंटिंग
बेटी की मौत के बाद दुलारी देवी पूरी तरह टूट गई थीं. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आगे कैसे जीना है.
कुछ समय बाद उन्होंने उसी अस्पताल की दीवार पर पेंटिंग बनाई जहां उनकी बेटी ने आखिरी सांस ली थी. यह उनके जीवन का नया मोड़ था.
इसके बाद वह गांव के कर्पूरी मांझी के घर काम करने लगीं. कर्पूरी मांझी मधुबनी पेंटिंग बनाते थे. दुलारी वहां खाना बनाने और घर के काम करती थीं.
एक दिन कर्पूरी मांझी ने उन्हें कागज और रंग दिए और कहा कि वह भी पेंटिंग सीखें. धीरे धीरे दुलारी देवी ने इस कला को सीखना शुरू किया. पहले उन्होंने ग्रीटिंग कार्ड पर पेंटिंग बनाई. फिर धीरे धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ने लगा.
रंग बन गए जीवन का सहारा
समय के साथ दुलारी देवी पेंटिंग में पूरी तरह डूब गईं. यही कला उनका सहारा बन गई. वह कहती हैं, “अब मधुबनी पेंटिंग ही मेरी पूजा है. यही मेरे जीवन का सहारा है.”
उनकी पेंटिंग में अक्सर एक छोटा बच्चा दिखाई देता है. वह बच्चा दरअसल उनकी बेटी का प्रतीक होता है.
दुलारी देवी कहती हैं, “हर पेंटिंग में मैं एक बच्चा बनाती हूं. वह मेरी बेटी है. इसी तरह मैं उसे अपने रंगों में जिंदा रखती हूं.”
संघर्ष से सम्मान तक
समय के साथ उनकी कला को पहचान मिलने लगी. उन्होंने कई जगह अपनी पेंटिंग प्रदर्शित की. एक बार चेन्नई में उन्होंने अपने जीवन की पूरी कहानी पेंटिंग के जरिए दिखाई.
बाद में उसी पेंटिंग पर एक किताब बनी. उस किताब से उन्हें पिछले 14 साल से रॉयल्टी भी मिल रही है.
साल 2021 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया. यह उनके जीवन का सबसे भावुक क्षण था.
वह बताती हैं कि उस दिन उन्हें अपने संघर्ष के सारे दिन याद आ गए और उनकी आंखों से आंसू निकल आए.
अब बच्चों को सिखा रही हैं कला
आज दुलारी देवी मिथिला आर्ट इंस्टीट्यूट में बच्चों को मधुबनी कला सिखा रही हैं. वहां लगभग 80 बच्चे उनसे सीख रहे हैं. उन्हें बच्चों के साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता है. वह चाहती हैं कि आने वाली पीढ़ी इस कला को आगे बढ़ाए.
दुलारी देवी की कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएं, अगर इंसान हिम्मत नहीं हारता तो वह अपनी राह खुद बना सकता है.
उन्होंने सच में अपने दर्द को रंगों में बदल दिया. और यही रंग आज उनकी पहचान बन गए हैं.



