12 साल की उम्र में शुरू किया Children’s Art Museum of India, अब है 3 लाख मेंबर की कम्यूनिटी
कृष नवल और मान्या रूंगटा ने 2022 में Children’s Art Museum of India (CAMI) की शुरुआत की. बिना फंडिंग शुरू हुए इस डिजिटल म्यूजियम से अब तक 3 लाख से ज्यादा मेंबर जुड़ चुके हैं. 20,000 से अधिक पेंटिग्स इस म्यूजियम का हिस्सा हैं. जानिए कैसे CAMI बच्चों की क्रिएटिविटी को नई पहचान दे रहा है...
किसी बच्चे की बनाई हुई पेंटिंग की उम्र अक्सर बहुत छोटी होती है. पहले कुछ दिनों के लिए उसे घर की दीवार पर जगह मिलती है. कभी फ्रिज पर चिपका दी जाती है, तो कभी स्कूल की फाइल में संभालकर रख दी जाती है. घर के लोग उसे देखकर खुश होते हैं, बच्चे की तारीफ होती है और फिर धीरे-धीरे नई ड्रॉइंग पुरानी पेंटिंग की जगह ले लेती हैं. कुछ समय बाद वही पेंटिंग किसी दराज, अलमारी या फाइल के कोने में पहुंच जाती है.
लेकिन क्या हो, अगर किसी बच्चे की बनाई हुई वही पेंटिंग एक म्यूजियम का हिस्सा बन जाए? अगर उसे सिर्फ उसके माता-पिता और टीचर ही नहीं, बल्कि दूसरे बच्चे और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के लोग भी देख सकें?
यहीं से शुरू हुई Children’s Art Museum of India (CAMI) की कहानी.
दिलचस्प बात यह है कि इस डिजिटल म्यूजियम की शुरुआत दो बच्चों ने की थी, उस उम्र में जब ज्यादातर बच्चे अपनी ड्रॉइंग स्कूल बैग में लेकर घूमते हैं.
साल 2022 में 12 वर्षीय कृष नवल (Krish Nawal) और 14 वर्षीय मान्या रूंगटा (Manya Roongta) ने मिलकर CAMI की शुरुआत की. आज, चार साल बाद, इस डिजिटल प्लेटफॉर्म से 3 लाख से ज्यादा मेंबर जुड़ चुके हैं. यहां 20,000 से अधिक पेंटिंग्स और कलाकृतियां जमा हो चुकी हैं, जबकि वेबसाइट पर 10 लाख से ज्यादा विजिटर्स आ चुके हैं.
कला से लगाव, लेकिन सोच कुछ अलग थी
कृष नवल इस समय कक्षा 11 के छात्र हैं. उन्हें बचपन से ड्रॉइंग और दूसरी क्रिएटिव एक्टिविटीज पसंद रही हैं. लेकिन उनकी दिलचस्पी सिर्फ कागज पर कुछ बनाने तक सीमित नहीं थी. उन्हें टेक्नोलॉजी पसंद थी. नई चीजें बनाने में मजा आता था. अलग-अलग आइडियाज के साथ प्रयोग करना भी उन्हें आकर्षित करता था. धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें सिर्फ आर्टवर्क ही नहीं, बल्कि उसके साथ कुछ नया करना ज्यादा दिलचस्प लगता है.
एक ही विषय को अलग-अलग बच्चे कितने अलग तरीके से देखते हैं, यह बात भी उन्हें हमेशा आकर्षित करती रही. किसी बच्चे के लिए पेड़ सिर्फ पेड़ हो सकता है, जबकि किसी दूसरे की कल्पना में वही पेड़ किसी कहानी का किरदार बन सकता है.
यही सोच आगे चलकर CAMI के आइडिया का फाउंडेशन बनी.
YourStory से बात करते हुए CAMI के को-फाउंडर कृष नवल बताते हैं, “मेरी कला में दिलचस्पी सिर्फ ड्रॉइंग या पेंटिंग सीखने तक सीमित नहीं थी. समय के साथ मुझे लगा कि कला के आसपास क्या बनाया जा सकता है, यह सवाल मुझे ज्यादा आकर्षित करता है. एक ही विषय को हर बच्चा अलग नजर से देखता है. वही सोच CAMI का कोर बनी. मेरे लिए CAMI क्रिएटिविटी, टेक्नोलॉजी और ऑन्त्रप्रेन्योरशिप को एक साथ लाने का जरिया बन गया.”
एक सवाल से हुई CAMI की शुरुआत
कृष ने कोविड-19 महामारी के दौरान इस आइडिया पर काम करना शुरू किया था. उस समय उन्होंने एक बात पर ध्यान दिया. पेशेवर कलाकारों के लिए म्यूजियम हैं, गैलरियां हैं और कई डिजिटल प्लेटफॉर्म भी मौजूद हैं. लेकिन बच्चों के लिए ऐसी जगहें बहुत कम थीं, जहां वे अपनी कला को सिर्फ जमा करके भूल न जाएं, बल्कि उसे दूसरों के साथ साझा भी कर सकें.
यहीं से एक सवाल सामने आया — आखिर बच्चे की बनाई हुई पेंटिंग का आगे क्या होता है?
CAMI की शुरुआत के पीछे कोई बहुत बड़ा बिजनेस आइडिया नहीं था. बस यही एक साधारण सवाल था.
अधिकतर मामलों में वह कुछ समय तक स्कूल की फाइल या घर की दीवार पर रहती है. कभी फ्रिज पर चिपकी रहती है और फिर धीरे-धीरे किसी दराज या अलमारी के कोने में पहुंच जाती है. दूसरी तरफ, बड़े कलाकारों के काम को गैलरियों और संग्रहालयों में जगह मिलती है.
कृष को लगा कि बच्चों को भी यह अनुभव मिलना चाहिए कि उनकी बनाई हुई पेंटिंग को देखा जा सकता है, सराहा जा सकता है और गंभीरता से लिया जा सकता है.
कृष बताते हैं, “हमने CAMI यह सोचकर शुरू नहीं किया था कि एक दिन यह बड़ी संस्था बन जाएगी. हमारी इच्छा बस इतनी थी कि कोई बच्चा अपनी बनाई पेंटिंग को म्यूजियम में देखकर यह महसूस करे कि यह जगह उसके लिए भी है.”
शुरुआत बहुत साधारण थी. दोनों ने अपने दोस्तों से उनकी पेंटिंग्स मांगीं. फिर धीरे-धीरे उन्हें एक और बात समझ आई.
कृष कहते हैं, “बच्चों को हर समय एक नई प्रतियोगिता नहीं चाहिए. उन्हें ऐसी जगह चाहिए, जहां उनकी क्रिएटिविटी को देखा जाए.”
आज CAMI अपनी पहचान “By the Children, For the Children, Of the Children” के रूप में बताती है. क्योंकि इसका मूल उद्देश्य बच्चों के लिए और बच्चों के साथ एक क्रिएटिव कम्यूनिटी बनाना है. CAMI की पहुंच भारत के 200 से ज्यादा शहरों और कस्बों तक है. स्कूलों, बच्चों, युवा एंबेसडरों और अलग-अलग रचनात्मक कार्यक्रमों के जरिए इस समुदाय को लगातार बढ़ाने की कोशिश की गई है.

क्या कला सिर्फ एक एक्स्ट्रा एक्टिविटी है?
बच्चों की पेंटिंग को डिजिटल गैलरी में जगह देना ही CAMI की एकमात्र चुनौती नहीं थी. कृष और उनकी टीम ने यह भी महसूस किया कि भारत में कला शिक्षा तक हर बच्चे की पहुंच बराबर नहीं है. कई स्कूलों में आज भी कला को एक एक्स्ट्रा एक्टिविटी की तरह देखा जाता है. अच्छे आर्ट प्रोग्राम, प्रशिक्षित शिक्षक और सीखने के संसाधन हर बच्चे को आसानी से नहीं मिलते.
CAMI ने इस अंतर को डिजिटल माध्यम से कुछ हद तक कम करने की कोशिश की. प्लेटफॉर्म पर बच्चों के लिए कला सीखने से जुड़ी सामग्री तैयार की गई. इसमें कई वीडियो भारतीय पारंपरिक कला रूपों पर केंद्रित हैं. उद्देश्य सिर्फ यह नहीं है कि बच्चा बेहतर ड्रॉइंग बनाना सीख जाए. मकसद यह भी है कि वह भारत की सांस्कृतिक विरासत को जाने और उसके प्रति दिलचस्पी विकसित करे.
कृष कहते हैं, “हम मानते हैं कि क्रिएटिविटी का मतलब एक परफेक्ट पेंटिंग बनाना नहीं है. यह कल्पना, देखने की क्षमता, प्रयोग और अपनी बात कहने का तरीका है.”
वह आगे कहते हैं, “भारत में कला शिक्षा हर स्कूल में एक जैसी नहीं है. इसलिए हमने सैकड़ों वीडियो और सीखने के संसाधनों पर काम किया. इनमें कई भारतीय पारंपरिक कला रूपों से जुड़े हैं, ताकि बच्चे अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी जान सकें.”
CAMI का डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों को अपनी पेंटिंग्स शेयर करने का मौका देता है. इसके अलावा यहां डिजिटल म्यूजियम और गैलरी, आर्टफेस्ट, रचनात्मक चुनौतियां, स्कूल गैलरी, ब्लॉग और न्यूजलेटर जैसी एक्टिविटीज भी आयोजित की जाती हैं. संस्था स्कूलों के साथ भी काम करती है और उनके लिए अलग डिजिटल आर्ट गैलरी तैयार करने की कोशिश करती है.
CAMI ने बच्चों को कला का नया अनुभव देने के लिए वर्चुअल वर्ल्ड और मेटावर्स जैसी नई टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया है. लेकिन चाहे टेक्नोलॉजी कितनी भी बदले, CAMI की सोच नहीं बदली है. इसका फोकस हमेशा बच्चों और उनकी क्रिएटिविटी पर ही है.
बिना फंडिंग शुरू हुआ सफर
CAMI शुरू से ही बूटस्ट्रैप्ड रहा है. यानि इसने किसी भी इन्वेस्टर से कोई फंडिंग नहीं जुटाई है. शुरुआत में डिजिटल प्लेटफॉर्म, होस्टिंग, डिजाइन और टेक्नोलॉजी से जुड़े खर्च परिवार के सहयोग और उपलब्ध संसाधनों से पूरे किए गए.
कृष ने शुरुआत में फंडिंग जुटाने के बजाय दूसरे सवालों पर ध्यान दिया. क्या बच्चे और स्कूल वास्तव में इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना चाहते हैं? क्या यह आइडिया उनके लिए उपयोगी है?
कृष कहते हैं, “हमने शुरुआत से प्रवेश को आसान और लगभग सभी बच्चों के लिए खुला रखने की कोशिश की. हमारा पहला लक्ष्य यह देखना था कि क्या बच्चे और स्कूल इस विचार को अपनाते हैं. इसलिए हमने पहले उपयोगिता और भागीदारी को समझा.”
उनके मुताबिक, आज भी CAMI के लिए सफलता का मतलब सिर्फ कमाई या मुनाफा नहीं है. कृष कहते हैं, “हमारे लिए ज्यादा मायने यह रखता है कि कितने बच्चे अपनी क्रिएटिविटी और पेंटिंग्स शेयर कर पा रहे हैं.”
CAMI को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवार्ड भी मिले हैं. संस्था को Global Youth Award for Creative Innovation और Bower School of Entrepreneurship का Top 18 Under 18 Entrepreneurship Award मिला है. इतना ही नहीं, कृष ने MuseumNext Digital Museums Conference में बतौर स्पीकर (वक्ता) हिस्सा लिया है और उन्हें Shri Innovation Awardee के रूप में सम्मानित किया गया है.
लेकिन इतनी कम उम्र में किसी पहल को आगे बढ़ाना आसान नहीं था.
जीता लोगों का भरोसा
कृष के मुताबिक, शुरुआत में सबसे बड़ी चुनौती भरोसा हासिल करना थी. स्कूलों और संस्थाओं को यह समझाना आसान नहीं था कि बच्चों द्वारा शुरू की गई यह पहल लंबे समय तक चल सकती है. समय के साथ दूसरी चुनौतियां भी सामने आईं. क्वालिटी बरक़रार रखना, बच्चों की सुरक्षा पर ध्यान देना और तेजी से बढ़ती कम्यूनिटी को मैनेज करना. इसके साथ ही पढ़ाई भी थी. स्कूल, परीक्षाएं, मीटिंग्स और कार्यक्रमों के बीच समय बांटना हमेशा आसान नहीं रहा.
कृष कहते हैं, “जब हमने शुरुआत की थी, तब हमारी उम्र बहुत कम थी और सबसे बड़ी चुनौती भरोसा हासिल करना था. बाद में हमें क्वालिटी और बच्चों की सुरक्षा पर भी लगातार ध्यान देना पड़ा.”
वह कहते हैं, “पढ़ाई के साथ CAMI को संभालना भी आसान नहीं रहा. लेकिन मैंने सीखा कि हर काम खुद करने की जरूरत नहीं होती. एक मजबूत टीम, वालंटियर और एंबेसडर आपको आगे बढ़ने का मौका देते हैं.”
यही शायद किसी यंग फाउंडर के लिए सबसे बड़ी सीख भी रही. हर काम खुद करने की कोशिश करने के बजाय सही लोगों को जिम्मेदारी देना.
आगे की राह
अगले कुछ सालों में कृष CAMI को सिर्फ एक ऐसी वेबसाइट नहीं रखना चाहते, जहां बच्चे अपनी पेंटिंग्स अपलोड करें. उनकी योजना स्कूल नेटवर्क को और बड़ा करने, इंटरनेशनल कम्यूनिटी को मजबूत करने और बेहतरीन इंटरैक्टिव म्यूजियम अनुभव तैयार करने की है.
वह यह भी देखना चाहते हैं कि AI और वर्चुअल वर्ल्ड जैसी नई टेक्नोलॉजी बच्चों के कला और म्यूजियम अनुभव को किस तरह बदल सकती हैं.
लेकिन विस्तार के बीच एक बात उनके लिए अहम है — CAMI की मूल भावना नहीं बदलनी चाहिए.
कृष बताते हैं, “मेरी इच्छा यह है कि किसी बच्चे के अवसर इस बात पर निर्भर न करें कि वह बड़े शहर में रहता है या छोटे कस्बे में. डिजिटल प्लेटफॉर्म इस दूरी को कम कर सकते हैं.”
उनके मुताबिक, हर बच्चे का कलाकार बनना जरूरी नहीं है.
कृष आगे कहते हैं, “हर बच्चा कलाकार बने, यह जरूरी नहीं है. लेकिन हर बच्चे को यह जरूर महसूस होना चाहिए कि उसकी क्रिएटिविटी की कीमत है. कला सिर्फ एक विषय नहीं, बल्कि सोचने और दुनिया को समझने का तरीका भी हो सकती है.”
शायद हर पेंटिंग को संभालकर रखने की जरूरत नहीं, लेकिन हर कल्पना को जगह मिलनी चाहिए
CAMI की कहानी सिर्फ दो बच्चों द्वारा शुरू की गई एक पहल की कहानी नहीं है. यह एक बड़े सवाल की कहानी भी है — हम बच्चों की क्रिएटिविटी को आखिर कितनी गंभीरता से लेते हैं?
हर पेंटिंग महान कला नहीं बनेगी. हर बच्चा बड़ा कलाकार भी नहीं बनेगा. और शायद यह जरूरी भी नहीं है. जरूरी यह है कि किसी बच्चे को कभी यह महसूस न हो कि उसकी कल्पना महत्वहीन है.
साल 2022 में कृष और मान्या ने एक छोटे से आइडिया के साथ शुरुआत की थी. एक ऐसी जगह बनाने का आइडिया, जहां बच्चे अपनी बनाई हुई पेंटिंग को सिर्फ जमा न करें, बल्कि उसे दुनिया के सामने देख सकें.
आज, चार साल बाद CAMI की कम्यूनिटी काफी बड़ी हो चुकी है. लेकिन इसके पीछे मौजूद मूल सवाल आज भी वही है. अगर बच्चों को अपनी क्रिएटिविटी के लिए सही जगह मिले, तो शायद वे सिर्फ बेहतर पेंटिंग्स बनाना नहीं सीखेंगे. शायद वे दुनिया को देखने का एक नया तरीका भी सीखेंगे.



