अब गांव की दुकानों में भी चलेगा QR पेमेंट! Getepay को मिला RBI का लाइसेंस
Getepay को मिला RBI से ऑनलाइन पेमेंट एग्रीगेटर का लाइसेंस, बन गया राजस्थान का पहला स्टार्टअप जिसे यह मंजूरी मिली. जानिए कैसे यह फिनटेक कंपनी गांव-गांव में डिजिटल भुगतान और छोटे व्यापारियों को सशक्त बना रही है.
भारत के फिनटेक सेक्टर में और एक नया चैप्टर जुड़ गया है. जयपुर स्थित डिजिटल पेमेंट और मर्चेंट एनाब्लमेंट प्लेटफॉर्म (गेटेपे) को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से ऑनलाइन पेमेंट एग्रीगेटर (Payment Aggregator - PA) की अंतिम मंजूरी मिल गई है. इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के साथ Getepay, राजस्थान की पहली कंपनी बन गई है जिसे यह लाइसेंस मिला है.
Getepay अब देश भर में विस्तार की तैयारी में है और उसका लक्ष्य है कि छोटे शहरों (टियर-2, टियर-3) और ग्रामीण भारत के लाखों छोटे व्यवसायों को अपने प्लेटफॉर्म पर जोड़कर डिजिटल समावेशन को मजबूत किया जाए.
‘भारत’ की ज़मीन से उभरी एक डिजिटल क्रांति
Getepay की यह उपलब्धि केवल एक नियामकीय स्वीकृति नहीं है, बल्कि यह एक सशक्त भारत निर्माण की दिशा में एक बड़ा कदम है. वर्ष 2016 में प्रवीन शर्मा (Pravin Sharma) द्वारा स्थापित यह कंपनी अब तक 15 लाख से अधिक व्यापारियों को डिजिटल भुगतान (Digital Payments) के आसान, सुरक्षित और सुलभ समाधान उपलब्ध करा चुकी है. किराना स्टोर से लेकर ई-कॉमर्स स्टोर्स, शिक्षा संस्थान, सेवा प्रदाता और लघु निर्माण इकाइयों तक, Getepay की पहुंच भारत के कोने-कोने तक फैली है.
प्रवीन शर्मा, फाउंडर और सीईओ, ने कहा, “यह मंजूरी केवल एक लाइसेंस नहीं, बल्कि हमारी उस सोच की पुष्टि है जिसमें हर छोटे व्यापारी को डिजिटल दुनिया से जोड़ने की आकांक्षा है. हमारा उद्देश्य सिर्फ पेमेंट्स सॉल्यूशन देना नहीं, बल्कि उन्हें एक पूरा कॉमर्स प्लेटफॉर्म मुहैया करना है जिससे वे अपने बिजनेस को नए आयाम दे सकें.”
महावीर प्रताप शर्मा, एंजेल इन्वेस्टर, ने कहा, “Getepay सिर्फ एक फिनटेक कंपनी नहीं है, यह एक ऐसा मंच है जो 'भारत' की जड़ों से जुड़ा हुआ है और वास्तविक, संरचनात्मक समस्याओं को हल कर रहा है. यह लाइसेंस इसकी विश्वसनीयता को और मजबूत करता है.”
भविष्य की योजनाएं
फिनटेक स्टार्टअप अब पेमेंट्स के अलावा डिजिटल स्टोर, इन्वेंट्री मैनेजमेंट, जीएसटी बिलिंग जैसे टूल्स भी व्यापारियों को देगा. Getepay 1 करोड़ से अधिक एमएसएमई को औपचारिक रूप से जोड़कर भारत के असंगठित क्षेत्र को संगठित करने और जीडीपी में योगदान बढ़ाने का काम करेगा.
इसके अलावा एजेंट नेटवर्क, ऑनबोर्डिंग टीम्स, और सहयोगी भागीदारों के माध्यम से हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियों का सृजन होगा. इसके साथ ही माइक्रो मर्चेंट्स, महिला उद्यमियों और ग्रामीण कारोबारियों को डिजिटल भुगतान के जरिये आर्थिक गरिमा और सशक्तिकरण मिलेगा.
Getepay की यह उपलब्धि केवल एक कंपनी की नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान और उभरते भारत की एक साझा सफलता है. आरबीआई की अंतिम मंजूरी मिलने के बाद Getepay अब देश के लाखों छोटे व्यापारियों के लिए डिजिटल युग का प्रवेशद्वार बनकर उभरने को तैयार है. यह कदम भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता और डिजिटल समावेशन के लक्ष्य को गति देने वाला साबित होगा.
क्या होता है पेमेंट एग्रीगेटर?
पेमेंट एग्रीगेटर (पीए) ऐसी संस्थाएं हैं जो ईकॉमर्स साइटों और व्यापारियों को अपने भुगतान दायित्वों को पूरा करने के लिए ग्राहकों से विभिन्न भुगतान साधनों को स्वीकार करने की सुविधा देती है. इसका मतलब है कि व्यापारियों को अपना खुद का अलग पेमेंट इंटीग्रेशन सिस्टम बनाने की जरूरत नहीं होती है.
इस प्रक्रिया में, पीए ग्राहक पूल से पेमेंट प्राप्त करते हैं और उन्हें एक समयावधि के बाद व्यापारियों को ट्रांसफर करते हैं. विशेष रूप से, बैंक और नॉन-बैंक पीए अपनी गतिविधियों के हिस्से के रूप में धन का प्रबंधन करते हैं. हालांकि, बैंक अपने सामान्य बैंकिंग संबंधों के हिस्से के रूप में पीए सेवाएं प्रदान करते हैं और उन्हें आरबीआई से अलग प्राधिकरण की आवश्यकता नहीं होती है. जबकि, नॉन-बैंक पीए को आरबीआई से प्राधिकरण की आवश्यकता होती है.
2020 में पेमेंट एग्रीगेटर के लिए RBI ने बदले नियम
वर्ष 2020 में, आरबीआई ने दिशा-निर्देश जारी किए थे जिनमें कहा गया कि सिर्फ नियामक द्वारा स्वीकृत कंपनियां ही व्यवसायियों को भुगतान सेवाएं मुहैया करा सकती हैं. जहां बैंकों को अलग से मंजूरियां लेने की जरूरत नहीं है, वहीं पेमेंट एग्रीगेटर सेवाएं मुहैया कराने वाली गैर-बैंकिंग इकाइयों को जून 2021 तक आरबीआई के पास अथॉराइजेशन के लिए आवेदन करने की जरूरत थी, जिसे बाद में बढ़ा दिया गया था. हालांकि केंद्रीय बैंक ने उन्हें नियामक से उनके आवेदन के संबंध में अगली सूचना प्राप्त नहीं होने तक परिचालन बरकरार रखने की अनुमति दे दी.
केंद्रीय बैंक ने ऐसे लाइसेंस के लिए नियम निर्धारित किए थे, लेकिन जहां कुछ कंपनियां लाइसेंस पाने के लिए मानकों पर खरी उतरीं, वहीं बड़ी तादाद में कंपनियों के आवेदनों को खारिज कर दिया गया.



