हमीरपुर की नागरा जूती: परंपरा और रोज़गार की पहचान
हमीरपुर जिले के सुमेरपुर की नागरा जूती हस्तनिर्मित चमड़े का पारंपरिक शिल्प है, जो पीढ़ियों से कारीगरों द्वारा तैयार की जा रही है। कटाई, सिलाई और फिनिशिंग की अनोखी प्रक्रिया के साथ ODOP पहल के अंतर्गत इसे नई पहचान और प्रदर्शनी मंच मिला है।
Hamirpur के सुमेरपुर क्षेत्र में नागरा जूती केवल जूते नहीं, बल्कि हस्तनिर्मित शिल्प और स्थानीय पहचान का प्रतीक हैं। यह पूरी तरह चमड़े से तैयार की जाती है और हर जोड़ी कई चरणों से गुजरती है — कटाई, सिलाई, आकार देना और फिनिशिंग।
श्याम बाबू, जो सुमेरपुर के नागरा जूती कारीगर हैं, बताते हैं कि यह जूती शुद्ध चमड़े से बनाई जाती है। इसकी एक विशेषता यह है कि इसे दाएं-बाएं पैर के अलग-अलग आकार में नहीं बनाया जाता; इसे दोनों पैरों में पहना जा सकता है। यही पारंपरिक डिज़ाइन इसे अलग पहचान देता है।
वे बताते हैं कि यह शिल्प दशकों से परिवारों के माध्यम से आगे बढ़ता आया है। सीखने की प्रक्रिया घर से ही शुरू होती है — देखकर, अभ्यास करके और धीरे-धीरे काम संभालते हुए।
हालाँकि तकनीक वही है, लेकिन बाज़ार व्यवस्था बदल गई है। अब कच्चा माल आगरा, कानपुर और जालंधर जैसे शहरों से मंगवाया जाता है, जिससे बाहरी बाज़ारों पर निर्भरता बढ़ी है।
चमड़े से तैयार जूती तक
सबसे पहले मोटे चमड़े से तला काटा जाता है। ऊपरी भाग के लिए बकरी या भेड़ के चमड़े का उपयोग किया जाता है। पैटर्न के अनुसार चमड़ा काटकर तले से सिलाई की जाती है।
इसके बाद जूती को फ्रेम पर चढ़ाकर आकार दिया जाता है और अंतिम फिनिशिंग की जाती है। पहले यह जूती भारी और मजबूत होती थी, जो खेत और कठोर जमीन के लिए उपयुक्त थी। अब इसे हल्का और आरामदायक बनाया जाता है, ताकि युवा पीढ़ी भी इसे रोज़मर्रा में पहन सके।
ODOP के अंतर्गत नागरा जूती को पहचान और प्रदर्शनी मंच मिला है, जिससे इसकी दृश्यता बढ़ी है।
Edited by Ravi Pareek


