पिता के निधन के बाद मां ने मजदूरी कर पढ़ाया, बेटी पहले IPS और फिर IAS बनी
हरियाणा के महेंद्रगढ़ की दिव्या तंवर ने गरीबी, पिता के निधन और कठिन परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं मानी. मां की मेहनत और अपने दृढ़ संकल्प के दम पर उन्होंने पहले UPSC में AIR 438 हासिल कर IPS बनीं, फिर AIR 105 लाकर IAS ऑफिसर बनने का सपना पूरा किया.
कभी कभी जिंदगी इंसान के सामने ऐसी चुनौतियां खड़ी कर देती है, जिनके आगे बड़े से बड़ा हौसला भी टूट जाए. लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मुश्किलों को अपनी पहचान नहीं बनने देते. वे अपनी मेहनत से नई पहचान बनाते हैं. हरियाणा की दिव्या तंवर (IAS Divya Tanwar Success Story) ऐसी ही एक मिसाल हैं.
दिव्या की कहानी सिर्फ एक UPSC टॉपर की कहानी नहीं है. यह उस बेटी की कहानी है जिसने गरीबी देखी, संघर्ष देखा, पिता को खोने का दर्द देखा, लेकिन अपने सपनों को कभी टूटने नहीं दिया. यही वजह है कि आज लाखों युवा उन्हें प्रेरणा के रूप में देखते हैं.
हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के छोटे से गांव निम्बी में जन्मी दिव्या तंवर का बचपन सामान्य नहीं था. जब वह छोटी थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया. परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. घर की जिम्मेदारी उनकी मां बबीता तंवर के कंधों पर आ गई.
परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी. घर चलाने और बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए उनकी मां ने मजदूरी की. कई रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने सिलाई का काम भी किया. सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी बेटियों की पढ़ाई नहीं रुकने दी.
दिव्या शुरू से पढ़ाई में अच्छी थीं. उन्होंने सरकारी स्कूल से शिक्षा प्राप्त की. गांव के माहौल और सीमित सुविधाओं के बीच भी उन्होंने बड़े सपने देखने की हिम्मत की. धीरे धीरे उनके मन में सिविल सेवा में जाने का सपना आकार लेने लगा.
ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने UPSC की तैयारी शुरू की. उनके पास बड़े शहरों जैसी सुविधाएं नहीं थीं. न महंगे कोचिंग संस्थान थे और न ही किसी तरह का विशेष माहौल. लेकिन उनके पास एक चीज थी जो सबसे ज्यादा जरूरी थी. वह थी अपने लक्ष्य को हासिल करने की जिद.
साल 2021 में उन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा दी. यह उनका पहला प्रयास था. परिणाम आया तो उन्होंने ऑल इंडिया रैंक (AIR) 438 हासिल की. इस रैंक के साथ उनका चयन भारतीय पुलिस सेवा यानी IPS के लिए हो गया.
सिर्फ 21 साल की उम्र में IPS अधिकारी बनना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी. देशभर में उनकी चर्चा होने लगी. बहुत से लोग यहीं रुक जाते. बहुत से लोग इस उपलब्धि को ही अपनी मंजिल मान लेते. लेकिन दिव्या की मंजिल कुछ और थी.
उनका सपना IAS ऑफिसर बनने का था.
IPS बनने के बाद भी उन्होंने तैयारी जारी रखी. नौकरी की जिम्मेदारियों और तैयारी के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी कमजोरियों पर काम किया और पहले से ज्यादा मेहनत की.
साल 2022 की UPSC परीक्षा में उन्होंने फिर से शानदार प्रदर्शन किया. इस बार उनकी रैंक 438 से सुधरकर 105 हो गई. इस उपलब्धि ने उनका IAS बनने का सपना पूरा कर दिया.
दिव्या तंवर की सफलता सिर्फ एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है. यह उस विश्वास की कहानी है जो कहता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो मंजिल तक पहुंचा जा सकता है.
उनकी मां का संघर्ष भी इस कहानी का उतना ही बड़ा हिस्सा है जितना दिव्या की मेहनत. एक मां ने कठिन हालात में परिवार को संभाला. एक बेटी ने उस त्याग को अपनी सफलता में बदल दिया.
आज दिव्या तंवर उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा हैं जो यह सोचकर अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं कि उनके पास संसाधन नहीं हैं. उनकी यात्रा बताती है कि सफलता का रास्ता हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन लगातार मेहनत, धैर्य और आत्मविश्वास से हर मुश्किल को पार किया जा सकता है.
दिव्या की कहानी हमें याद दिलाती है कि सपनों की ऊंचाई आपकी आर्थिक स्थिति से तय नहीं होती. उसे आपकी मेहनत, आपका साहस और आपका संकल्प तय करता है.



