2030 तक 45 लाख नौकरियां और 2400 सेंटर: कैसे ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) बन रहे हैं रियल एस्टेट की तरक्की का इंजन?
वर्तमान में दुनिया भर के GCC मार्केट में भारत की हिस्सेदारी आधे से भी ज्यादा है. यही वजह है कि बड़ी विदेशी कंपनियों के लिए अपने कामकाज को बेहतर ढंग से चलाने के लिए भारत सबसे पसंदीदा जगह बन गया है.
भारत का कमर्शियल रियल एस्टेट मार्केट इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है, और इसकी मुख्य वजह ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का तेजी से होता विकास है. पहले मल्टीनेशनल कंपनियां इन सेंटर्स का इस्तेमाल सिर्फ खर्च कम करने के लिए करती थीं, लेकिन आज ये सेंटर इनोवेशन और स्ट्रेटेजी के मुख्य ठिकाने बन चुके हैं.
यहां अब रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D), डिजिटलाइजेशन, इंजीनियरिंग, डेटा एनालिसिस और हाई एंड बिजनेस का मैनेजमेंट जैसे बड़े काम हो रहे हैं. इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा दिल्ली-NCR को मिला है, जहां नोएडा और गुरुग्राम जैसे इलाकों में 'ग्रेड ए' (बेहतरीन सुविधाओं वाले) ऑफिस स्पेस की मांग काफी बढ़ गई है.
GCCs की वजह से अब दफ्तरों की परिभाषा बदल रही है और यह सेक्टर पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा हाई-टेक और मॉडर्न होता जा रहा है.
भारत में GCCs का उदय
वर्तमान में दुनिया भर के GCC मार्केट में भारत की हिस्सेदारी आधे से भी ज्यादा है. यही वजह है कि बड़ी विदेशी कंपनियों के लिए अपने कामकाज को बेहतर ढंग से चलाने के लिए भारत सबसे पसंदीदा जगह बन गया है. अगर आंकड़ों की बात करें, तो साल 2024 में इन सेंटर्स ने करीब 2.8 करोड़ वर्ग फुट ऑफिस स्पेस लीज पर लिया. इसकी बदौलत भारत में कुल ऑफिस लीजिंग का आंकड़ा 7.72 करोड़ वर्ग फुट के पार पहुंच गया, जो पिछले साल के मुकाबले 15.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी है. यह अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है. ऑफिस स्पेस की यह मांग 2025 में भी जारी रही, जहां साल की पहली तिमाही में ही 83.5 लाख वर्ग फुट से ज्यादा जगह लीज पर ली गई है.
भविष्य की बात करें तो भारत में GCC का दायरा बहुत तेजी से बढ़ने वाला है. साल 2023 में जहां इनकी संख्या 1,580 थी, वहीं साल 2030 तक इनके बढ़कर 2,400 होने की उम्मीद है. इससे देश के लगभग 45 लाख से ज्यादा प्रोफेशनल लोगों के लिए नौकरियों के नए मौके पैदा होंगे. सेंटर्स की इसी बढ़ती संख्या और वर्कफोर्स की वजह से दिल्ली जैसे बड़े महानगरों में प्रीमियम और वर्ल्ड-क्लास ऑफिस स्पेस की मांग में जबरदस्त उछाल आने की संभावना है.
दिल्ली-NCR: GCC का एक स्ट्रेटेजिक हब
भारत के विकास की इस कहानी में दिल्ली-NCR ने GCC के लिए एक पसंदीदा ठिकाने के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई है. पिछले दो सालों में कई बड़ी विदेशी कंपनियों ने इस क्षेत्र में 50 लाख वर्ग फुट से ज्यादा ऑफिस स्पेस लीज पर लेने के सौदे किए हैं, ताकि वे अपने नए ऑफिस खोल सकें या पुराने काम को और बड़ा कर सकें. फिलहाल, भारत में होने वाले कुल GCC सौदों में दिल्ली-NCR की हिस्सेदारी लगभग 23 प्रतिशत है. ग्लोबल कंपनियां अब ऐसी जगहों को ज्यादा पसंद कर रही हैं जहां काम करने, रहने और मनोरंजन (Live-Work-Play) की सभी सुविधाएं एक ही जगह मिल सकें.
खास तौर पर नोएडा में साल 2022 के बाद ऑफिस स्पेस की मांग में बड़ी तेजी आई है. मेट्रो की बेहतर सुविधा, नए एक्सप्रेसवे और हर तरह के आधुनिक कमर्शियल इंफ्रास्ट्रक्चर ने इस जगह को कंपनियों के लिए काफी आकर्षक बना दिया है. दूसरी तरफ, गुरुग्राम भी अपनी खासियतों की वजह से ग्लोबल कंपनियों की पहली पसंद बना हुआ है; जैसे कि वहां का विकसित ऑफिस कल्चर, इंटरनेशनल एयरपोर्ट से नजदीकी और पहले से मौजूद बड़ी कंपनियों का नेटवर्क.

सांकेतिक चित्र
कॉस्ट असेसमेंट से सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस तक
ऑफिस स्पेस की मांग बढ़ने का एक मुख्य कारण यह है कि GCC अब केवल सपोर्ट देने वाले 'बैक ऑफिस' नहीं रह गए हैं. अब ये 'सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस' के रूप में विकसित हो चुके हैं, जहां से कंपनियों के मुख्य काम, R&D और डिजिटल इनोवेशन से जुड़े बड़े फैसले लिए जाते हैं. इस बड़े बदलाव की वजह से अब कंपनियों की रियल एस्टेट संबंधी जरूरतें भी पूरी तरह बदल गई हैं—अब उन्हें नॉर्मल ऑफिस के बजाय ऐसे मॉडर्न वर्कस्पेस चाहिए जो टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के अनुकूल हों.
इसके अलावा, पहले जहां इन सेंटर्स (GCCs) का मुख्य मकसद सिर्फ खर्च बचाना होता था, वहीं आज इनका पूरा फोकस काम की क्वालिटी और भविष्य की जरूरतों के हिसाब से तैयार वर्कप्लेस पर है. अब इनके लिए बड़े ऑफिस फ्लोर, मिल-जुलकर काम करने वाली जगहें (Collaborative spaces), टेक्नोलॉजी, सरकारी नियमों का पालन और पर्यावरण के अनुकूल होना बहुत जरूरी हो गया है. चूंकि ये सेंटर कंपनियों के सबसे अहम और संवेदनशील कामों को संभालते हैं, इसलिए उन्हें ऐसे सुरक्षित और भरोसेमंद दफ्तरों की जरूरत होती है जहां टेक्नोलॉजी का भरपूर इस्तेमाल हो और जो कर्मचारियों को कुछ नया करने व बेहतर रिजल्ट देने के लिए प्रेरित कर सकें.
इसी बदलाव को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि साल 2025 में कुल ऑफिस लीजिंग (किराए पर लिए जाने वाले दफ्तरों) का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा अकेले इन GCCs का होगा. यह आंकड़ा साफ तौर पर दर्शाता है कि मार्केट में प्रीमियम और हाई-क्वालिटी वाले कमर्शियल स्पेस की मांग कितनी बढ़ गई है और कंपनियां अब अपने काम के लिए बेहतरीन सुविधाओं वाली जगहों को ही प्राथमिकता दे रही हैं.
रेंटल और ऑफिस की प्राथमिकताओं पर असर
GCC की बढ़ती एक्टिविटीज का सीधा असर रेंटल मार्केट (किराये के बाजार) पर पड़ रहा है. नोएडा और गुरुग्राम जैसे इलाकों में बेहतरीन सुविधाओं वाले कमर्शियल स्पेस की भारी मांग की वजह से ऑफिस के किरायों में बढ़त देखने को मिल रही है. इसके पीछे एक बड़ी वजह यहां का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) और सड़कों का विकास भी है, जिसने इन क्षेत्रों को निवेश के नजरिए से और भी ज्यादा आकर्षक बना दिया है.
साथ ही, अब ऑफिस स्पेस की मांग का तरीका भी बदल रहा है. अब ये GCCs ऐसे दफ्तर चाहते हैं जो टेक्नोलॉजी से लैस हों, जिनमें जरूरत के हिसाब से बदलाव किया जा सके और जो पर्यावरण के अनुकूल हों. आज के समय में ऑफिस लीज पर लेते समय कुछ बातें सबसे जरूरी हो गई हैं—जैसे कि क्या वह बिल्डिंग 'ग्रीन बिल्डिंग' सर्टिफाइड है, वहां बिजली बचाने के आधुनिक इंतजाम हैं या नहीं, और क्या वहां कर्मचारियों की सेहत और सुख-सुविधाओं (Wellness) का ख्याल रखा गया है. यही वजह है कि अब बिल्डर्स भी ऐसे आधुनिक दफ्तर बनाने पर जोर दे रहे हैं जो न केवल हाई-टेक हों, बल्कि जिनमें फ्लैक्सिबिलिटी भी हो और जो सभी सरकारी व इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स पर खरे उतरते हों.
सेक्टोरल मांग के कारण
दिल्ली-NCR में GCC की मांग की एक और बड़ी खासियत यह है कि अब इसमें सिर्फ आईटी कंपनियां ही नहीं, बल्कि कई अलग-अलग क्षेत्रों की कंपनियां शामिल हैं. टेक्नोलॉजी के साथ-साथ अब इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल और लाइफ साइंसेज (दवा और हेल्थ सेक्टर) से जुड़ी बड़ी कंपनियां भी इस इलाके में अपने सेंटर खोल रही हैं या पुराने ऑफिस को बड़ा कर रही हैं. इन सभी क्षेत्रों को काम करने के लिए बहुत ही मॉडर्न सुविधाओं की जरूरत होती है, जैसे कि हाई-टेक लैब, R&D और डिजिटल रूप से एडवांस ऑफिस. इन खास जरूरतों की वजह से ही दिल्ली-NCR में अब बेहतरीन क्वालिटी वाले कमर्शियल रियल एस्टेट का विकास तेजी से हो रहा है.
भारत में ऑफिस स्पेस की कुल उपलब्धता साल 2025 तक 100 करोड़ (1 बिलियन) वर्ग फुट के आंकड़े को पार करने की उम्मीद है, और इस बढ़ती मांग को बनाए रखने में GCCs की सबसे बड़ी भूमिका होगी. भविष्य की संभावनाओं को देखें तो ये सेंटर लगातार 'ग्रेड ए' यानी बेहतरीन सुविधाओं वाले ऑफिस को प्राथमिकता देंगे. इससे दिल्ली-NCR की स्थिति एक प्रमुख कमर्शियल हब के रूप में और भी ज्यादा मजबूत हो जाएगी.
उभरते अवसर
भारत के ऑफिस मार्केट में GCC का विस्तार कोई थोड़े समय का चलन नहीं है, बल्कि यह एक बुनियादी और बड़ा बदलाव है जो लंबे समय तक रहने वाला है. दिल्ली-NCR में यह बदलाव साफ तौर पर देखा जा सकता है, जहां ऑफिस स्पेस की रिकॉर्ड लीजिंग हो रही है और किरायों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार और टेक्नोलॉजी से लैस, पर्यावरण के अनुकूल 'ग्रेड ए' ऑफिसों की बढ़ती मांग इस बात का सबूत है कि यह क्षेत्र अब ग्लोबल लेवल के कामकाज के लिए पूरी तरह तैयार है. यह विकास न केवल रियल एस्टेट बल्कि निवेश के नए मौकों के दरवाजे भी खोल रहा है.
जैसे-जैसे ये GCCs कंपनियों के लिए केवल सपोर्ट के बजाय रणनीतिक फैसले लेने वाले मुख्य ठिकाने बनते जा रहे हैं, वैसे-वैसे दिल्ली-NCR के कमर्शियल रियल एस्टेट पर इनका असर और भी ज्यादा बढ़ता जाएगा. आने वाले समय में ऑफिस मार्केट की तरक्की कैसी होगी और दफ्तरों का स्वरूप कैसा होगा, यह काफी हद तक इन सेंटर्स की जरूरतों से ही तय होगा. ये सेंटर न केवल इस क्षेत्र में दफ्तरों की मांग को बढ़ाते रहेंगे, बल्कि रियल एस्टेट के पूरे मार्केट को एक नए और आधुनिक स्तर पर ले जाने का काम करेंगे.
(लेखक ‘TRG Group’ के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं. YourStory का उनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है.)
Edited by Ravi Pareek


