कैंसर से जूझ रहे बच्चों के लिए फरिश्ता बने निहाल और श्यामा, बदली 17 लाख लोगों की जिंदगी
निहाल कविरत्ने और उनकी पत्नी श्यामा कविरत्ने ने 2006 में ‘सेंट जूड इंडिया चाइल्डकेयर सेंटर्स’ की शुरुआत की थी. अब तक 8,811 बच्चों को इसके केंद्रों में भर्ती किया जा चुका है. बीते 20 वर्षों में कुल 17,46,242 बच्चों तथा परिवारों को मदद मिली है.
कभी-कभी एक छोटी सी संवेदना हजारों जिंदगियों का भविष्य बदल देती है. मुंबई के एक अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर बैठे परिवारों को देखकर एक व्यक्ति के मन में उठे सवाल ने ऐसा ही बदलाव पैदा किया. वह सोच रहे थे कि आखिर इलाज के लिए दूरदराज के गांवों और कस्बों से शहरों में आने वाले कैंसर पीड़ित बच्चों और उनके परिवारों के पास रहने की सुरक्षित जगह क्यों नहीं है. यही सवाल आगे चलकर हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बन गया.
आज जब कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे बच्चों के सामने इलाज के साथ रहने, खाने और मानसिक सहारे जैसी चुनौतियां भी खड़ी होती हैं, तब सेंट जूड इंडिया चाइल्डकेयर सेंटर्स (St. Jude India Childcare Centre) उनके लिए एक घर की तरह खड़ा दिखाई देता है. यह सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए जीवनरेखा है जिनके पास इलाज जारी रखने के लिए संसाधन नहीं होते.
सेंट जूड इंडिया चाइल्डकेयर सेंटर्स की शुरुआत अप्रैल 2006 में निहाल कविरत्ने और उनकी पत्नी श्यामा कविरत्ने ने की थी. निहाल कविरत्ने वैश्विक कारोबारी जगत का जाना पहचाना नाम रहे हैं. उन्होंने यूनिलीवर में करीब चार दशक तक काम किया और कई महत्वपूर्ण नेतृत्व भूमिकाएं निभाईं. रिटायरमेंट के बाद जब वे भारत लौटे तो उन्होंने मुंबई के परेल स्थित टाटा मेमोरियल अस्पताल के बाहर बड़ी संख्या में मरीजों और उनके परिवारों को फुटपाथों पर रहते देखा.
जिज्ञासा होने पर उन्होंने इन परिवारों से बात की. पता चला कि इनमें से अधिकांश लोग ग्रामीण इलाकों से आए थे. कैंसर का इलाज लंबा चलता है और रहने का खर्च उठाना उनके लिए लगभग असंभव था. कई परिवार मजबूरी में इलाज बीच में छोड़ देते थे. यही वह क्षण था जिसने निहाल और श्यामा को कुछ बड़ा करने के लिए प्रेरित किया.
उन्होंने डॉक्टरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से चर्चा की और मुंबई में टाटा मेमोरियल अस्पताल के पास पहला केंद्र शुरू किया. शुरुआत केवल आठ परिवारों के साथ हुई थी. लेकिन यह मॉडल इतना प्रभावी साबित हुआ कि धीरे धीरे इसका विस्तार देश के कई शहरों तक हो गया.

सेंट जूड इंडिया चाइल्डकेयर सेंटर्स की शुरुआत अप्रैल 2006 में निहाल कविरत्ने और उनकी पत्नी श्यामा कविरत्ने ने की थी.
सेंट जूड्स का उद्देश्य केवल रहने की जगह उपलब्ध कराना नहीं था. संस्था ने शुरुआत से ही समग्र देखभाल पर जोर दिया. यहां बच्चों और उनके परिवारों को स्वच्छ और सुरक्षित आवास मिलता है. अस्पताल तक आने जाने की सुविधा दी जाती है. पौष्टिक भोजन और राशन उपलब्ध कराया जाता है. बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो, इसके लिए शिक्षा कार्यक्रम चलाए जाते हैं. साथ ही मनोवैज्ञानिक परामर्श भी दिया जाता है ताकि बच्चे और उनके माता पिता भावनात्मक रूप से मजबूत बने रहें.
कैंसर का इलाज केवल दवाओं से पूरा नहीं होता. कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले बच्चों के लिए स्वच्छ वातावरण और पोषण बेहद जरूरी होता है. इसी वजह से संस्था डॉक्टरों के साथ मिलकर बच्चों की पोषण संबंधी जरूरतों का ध्यान रखती है. परिवारों को हर सप्ताह राशन और पोषण सामग्री दी जाती है ताकि बच्चे स्वस्थ भोजन प्राप्त कर सकें.
संस्था बच्चों की शिक्षा पर भी विशेष ध्यान देती है. यहां पढ़ाई को गतिविधियों और खेल आधारित बनाया गया है. बच्चे प्रयोग करते हैं, पोस्टर बनाते हैं, समूह चर्चा में हिस्सा लेते हैं और रचनात्मक गतिविधियों के जरिए सीखते हैं. इससे इलाज के दौरान भी उनका मानसिक विकास जारी रहता है.
परामर्श सेवाएं भी इस मॉडल का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. कैंसर का नाम सुनते ही परिवार डर और अनिश्चितता से भर जाता है. ऐसे समय में प्रशिक्षित काउंसलर बच्चों और माता पिता को अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर देते हैं. इससे वे मानसिक रूप से मजबूत बनते हैं और इलाज की लंबी प्रक्रिया का सामना बेहतर तरीके से कर पाते हैं.
सेंट जूड्स का प्रभाव केवल सुविधाएं देने तक सीमित नहीं रहा. संस्था ने कैंसर उपचार के दौरान इलाज छोड़ने की समस्या को भी कम करने में मदद की. टाटा मेमोरियल अस्पताल के अनुमानों के अनुसार, जिन परिवारों को ऐसी सहायता मिली, उनमें इलाज छोड़ने की दर 30 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत से भी कम रह गई.
वेबसाइट पर दिए गए संस्था के आंकड़ों के अनुसार, 2006 से लेकर अब तक 8,811 बच्चों को इसके केंद्रों में भर्ती किया जा चुका है. बीते 20 वर्षों में कुल 17,46,242 बच्चों तथा परिवारों को सहायता प्रदान की जा चुकी है. आज संस्था के 68 केंद्र 13 शहरों में संचालित हो रहे हैं.
सेंट जूड्स की सोच इलाज समाप्त होने के बाद भी खत्म नहीं होती. इसी सोच के साथ वर्ष 2020 में सेंट जूड्स फॉर लाइफ (St. Judes for Life) कार्यक्रम शुरू किया गया. इसका उद्देश्य कैंसर से ठीक हो चुके बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य और करियर के क्षेत्र में आगे बढ़ने में मदद करना है.
द बेटर इंडिया के मुताबिक, महाराष्ट्र के जयेश दुसाने इसका उदाहरण हैं. कैंसर से जंग जीतने के बाद वे आज कंप्यूटर साइंस में बीटेक कर रहे हैं. संस्था ने उन्हें लैपटॉप उपलब्ध कराया, शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता दी और करियर मार्गदर्शन भी दिया. इसी तरह पश्चिम बंगाल के पीथम, जिन्होंने वर्ष 2016 में कैंसर का इलाज कराया था, आज कॉलेज में पढ़ाई कर रहे हैं और अन्य कैंसर सर्वाइवर्स की मदद करने का सपना देख रहे हैं.
सेंट जूड्स फॉर लाइफ की एक और अनोखी पहल कैंसर सर्वाइवर्स के लिए स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराना रही है. आमतौर पर बीमा कंपनियां कैंसर मरीजों को कवरेज देने से बचती हैं, लेकिन संस्था ने साझेदारी के जरिए बच्चों के लिए स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा की सुविधा सुनिश्चित की.
आज सेंट जूड्स देश के कई प्रमुख कैंसर अस्पतालों के साथ काम कर रहा है. इनमें टाटा मेमोरियल अस्पताल, एम्स नई दिल्ली, टाटा मेडिकल सेंटर कोलकाता, अपोलो स्पेशियलिटी कैंसर हॉस्पिटल चेन्नई और कई अन्य संस्थान शामिल हैं. संस्था अस्पताल और परिवार के बीच उस जरूरी कड़ी की भूमिका निभाती है जो अक्सर उपचार प्रणाली में गायब होती है.
निहाल कविरत्ने ने एक बार महसूस किया था कि कैंसर से लड़ रहे बच्चों को सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि सम्मान के साथ जीने का अवसर भी चाहिए. दो दशक बाद उनकी और श्यामा कविरत्ने की वही सोच हजारों बच्चों के जीवन में उम्मीद, सुरक्षा और नई शुरुआत लेकर आई है.
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि दुनिया बदलने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती. कभी-कभी किसी की पीड़ा को समझ लेने वाला एक संवेदनशील विचार ही हजारों जिंदगियों को रोशन कर देता है.



