“ये चलेगा नहीं!” मिर्जापुर की अपर्णा ने 12000 रु से बदली हजारों जिंदगियां
उत्तर प्रदेश की अपर्णा श्रीवास्तव ने मात्र 12,000 रु से शुरू की एक ऐसी यात्रा, जिसने मिर्जापुर की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया. Navchetna FPO और Amrity Dairy के जरिए उन्होंने किसानों, महिलाओं और युवाओं को आर्थिक व सामाजिक सशक्तिकरण का रास्ता दिखाया, जो अब चार राज्यों तक फैला है.
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले का नाम सुनते ही ज़्यादातर लोगों को गंगा किनारे बसे पहाड़ी इलाकों की याद आती है, जहाँ खेती और दिहाड़ी मजदूरी ही आजीविका के मुख्य साधन हैं. यहाँ के गांवों में महिलाएं अब भी समाज के पारंपरिक ढांचे में बंधी हैं. वे खेतों में दिनभर मेहनत करती हैं, लेकिन निर्णय लेने या आर्थिक भागीदारी में उनकी भूमिका बहुत सीमित रहती है.
ऐसे माहौल में अगर कोई कहे कि सिर्फ ₹12,000 से शुरू हुई एक पहल ने न केवल सैकड़ों महिलाओं की जिंदगी बदली, बल्कि चार राज्यों में फैलकर एक सशक्त ग्रामीण विकास मॉडल तैयार किया, तो शायद यह किसी प्रेरणादायक कहानी से कम नहीं लगे.
लेकिन यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत है. यह कहानी है अपर्णा श्रीवास्तव की. मिर्जापुर के एक छोटे से गांव से निकलकर उन्होंने यह साबित किया कि बदलाव के लिए बड़ी पूंजी या विदेशी फंड की नहीं, बल्कि मजबूत इरादों, सामुदायिक भरोसे और निरंतर प्रयास की जरूरत होती है.
‘छोटा-मोटा प्रोजेक्ट’ बना ग्रामीण विकास की मिसाल
साल था 2015. अपर्णा के पास न बड़ी टीम थी, न सरकारी सहायता. लेकिन उनका एक सपना था — अपने गांव की महिलाओं और किसानों को आत्मनिर्भर बनाना.
उन्होंने ₹12,000 की छोटी सी पूंजी से Navchetna FPO (Farmer Producer Organization) की नींव रखी. उद्देश्य था किसानों और स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (SHG) को जोड़कर ऐसा मंच बनाना, जो गांव की अर्थव्यवस्था को नया आकार दे सके.
हालांकि शुरुआत में लोगों ने इस विचार को गंभीरता से नहीं लिया. अपर्णा बताती हैं, “लोग सोचते थे कि ये भी कोई एनजीओ जैसा छोटा-मोटा प्रोजेक्ट होगा, जो कुछ महीनों में बंद हो जाएगा.”
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने गांव-गांव जाकर महिलाओं से बातचीत की, पारदर्शिता के साथ काम किया और अपने समर्पण से धीरे-धीरे भरोसा जीता.
जब महिलाएं लेने लगीं फैसले
अपर्णा की सोच साफ थी. उनका मानना था कि अगर महिलाएं और किसान एक साथ आएं, तो गांव में आर्थिक क्रांति आ सकती है. इसी सोच से जन्म हुआ Navchetna FPO का.
आज यह संगठन उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड में सक्रिय है. यह करीब 1,000 से अधिक किसानों — जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं — को उत्पादन, मूल्य निर्धारण और मार्केटिंग में मदद करता है.
इस पहल के ज़रिए महिलाएं अब सिर्फ खेत में श्रम करने वाली नहीं रहीं, बल्कि फैसले लेने वाली और मुनाफे में साझेदार बन चुकी हैं.

अपर्णा श्रीवास्तव ने Navchetna FPO और Amrity Dairy के जरिए किसानों, महिलाओं और युवाओं को आर्थिक व सामाजिक सशक्तिकरण का रास्ता दिखाया है.
महिलाओं का अपना डेयरी मॉडल
Navchetna FPO की सफलता के बाद अपर्णा ने दूसरा बड़ा कदम उठाया. उन्होंने Amrity Dairy की स्थापना की.
यह एक सहकारी डेयरी मॉडल है, जिसमें दूध देने वाली महिलाएं केवल आपूर्तिकर्ता नहीं, बल्कि व्यवसाय की सह-मालकिन हैं. वे उत्पाद की गुणवत्ता, मूल्य निर्धारण और मुनाफे के बंटवारे में बराबरी से भाग लेती हैं.
अपर्णा कहती हैं, “सशक्तिकरण का मतलब सिर्फ पैसा कमाना नहीं है. असली सशक्तिकरण तब होता है जब महिलाएं अपने फैसले खुद ले सकें.”
युवाओं और वंचित समूहों के लिए नई राह
अपर्णा की सोच सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं रही. उन्होंने Guiding Soul नाम की पहल शुरू की, जो ग्रामीण युवाओं के लिए करियर काउंसलिंग, डिजिटल साक्षरता और संवाद कौशल पर काम करती है.
इस कार्यक्रम के तहत गाँवों में ट्रेनिंग सेशन आयोजित किए जाते हैं, जहाँ युवाओं को आत्मनिर्भर बनने और रोजगार के नए अवसर खोजने में मदद मिलती है. कई युवाओं ने इससे प्रेरित होकर छोटे बिज़नेस और स्टार्टअप भी शुरू किए हैं.
इसमें LGBTQ+ समुदाय, शारीरिक रूप से भिन्न क्षमता वाले युवाओं और अन्य वंचित समूहों को भी शामिल किया जाता है, ताकि विकास सबका हो.
अपर्णा कहती हैं, “हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जहाँ किसी की पहचान, लिंग या पृष्ठभूमि उसकी क्षमता का पैमाना न बने. हर व्यक्ति को आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए.”
आज Guiding Soul केवल युवाओं को कौशल सिखाने का मंच नहीं रहा, बल्कि एक मेन्टॉरशिप नेटवर्क बन चुका है, जो ग्रामीण भारत के सामाजिक परिवर्तन का हिस्सा बन रहा है. यह पहल अब कई जिलों में सक्रिय है और धीरे-धीरे अन्य राज्यों तक भी विस्तार कर रही है.
अपर्णा का मानना है कि अगर गांवों के युवाओं को सही दिशा और आत्मविश्वास मिले, तो वे अपने गांव नहीं छोड़ेंगे, बल्कि उन्हें बदलेंगे.
बदलाव का स्थायी मॉडल
भारत में आज करीब 1.5 करोड़ महिला उद्यमी माइक्रो स्तर पर काम कर रही हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम ही लंबी अवधि में स्थायित्व हासिल कर पाती हैं.
अपर्णा श्रीवास्तव की पहल इस सोच को चुनौती देती है. उन्होंने दिखाया कि असली बाधा पूंजी की नहीं, बल्कि दृष्टिकोण और सामुदायिक सहयोग की होती है.
उनकी कंपनियाँ भले आकार में छोटी हों, लेकिन उनका असर गहरा है. उन्होंने साबित किया कि स्थानीय स्तर पर बना भरोसा किसी भी बड़े निवेश से ज्यादा ताकतवर हो सकता है.
एक गांव से उठी आवाज़, जो अब चार राज्यों में गूंज रही है
अपर्णा श्रीवास्तव की कहानी सिर्फ एक महिला उद्यमी की सफलता नहीं है. यह उस नए भारत की झलक है, जहाँ गांव की महिलाएं विकास की “निर्माता” बन रही हैं.
उन्होंने दिखाया कि बदलाव की शुरुआत एक छोटे कदम से भी हो सकती है, अगर उस कदम में भरोसा, मेहनत और दूसरों को साथ लेकर चलने की भावना हो.
मिर्जापुर की इस बेटी ने साबित कर दिया है कि जब कोई औरत कहती है, “मैं कोशिश करूंगी”, तो वह अकेले नहीं, पूरा समाज बदल देती है.



