बाहर की नौकरी ने सिखाया सबक, बाराबंकी के सर्वज्ञ ने शुरू किया टिफिन बिजनेस
बाराबंकी के सर्वज्ञ श्रीवास्तव ने आर्थिक मुश्किलों में घर की रसोई से टिफिन बिजनेस शुरू किया. भरोसेमंद और सादा भोजन उनकी पहचान बना. यूपी सरकार की CM YUVA Yojana से मिले 5 लाख रुपये के लोन ने काम को स्थिरता और आगे बढ़ने की दिशा दी.
सर्वज्ञ श्रीवास्तव ने अपना काम ऐसे समय में शुरू किया, जब उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. बड़े सपने देखने के बजाय उन्होंने एक छोटा लेकिन ज़रूरी लक्ष्य चुना. वे ऐसा खाना देना चाहते थे, जिस पर लोग रोज़ भरोसा कर सकें.
काम शुरू करने से पहले सर्वज्ञ जिले से बाहर नौकरी करते थे. वहीं उन्हें एक बड़ी परेशानी महसूस हुई. बाहर रहकर साफ और नियमित खाना मिलना आसान नहीं था. कभी खाना मिलता था, कभी नहीं. लंबे काम के बाद खुद खाना बनाना भी हर दिन संभव नहीं होता था. यही अनुभव उनके मन में बैठ गया.
जब वे वापस बाराबंकी लौटे, तो उन्होंने इसी समस्या का हल निकालने का फैसला किया.
शुरुआत घर की रसोई से हुई. उनकी मां ने टिफिन बनाना शुरू किया. पहला ग्राहक पहचान के जरिए आया. फिर दूसरा आया. धीरे धीरे लोगों को खाना पसंद आने लगा. मेन्यू जानबूझकर बहुत साधारण रखा गया. रोटी, दाल, चावल जैसे रोज़ के खाने पर ही ध्यान दिया गया.
सोच साफ थी. जो लोग घर से दूर रहते हैं, उन्हें साफ और घर जैसा खाना मिलना चाहिए.
खाने की तैयारी रोज़ एक तय समय पर होती थी. इससे स्वाद बना रहता था और सफाई पर भी पूरा ध्यान दिया जाता था. ग्राहक ज़्यादातर छात्र और नौकरीपेशा लोग थे, जो परिवार से दूर रहते थे. कुछ लोग टिफिन मंगवाते थे और कुछ खुद आकर खाना ले जाते थे.
धीरे धीरे नियमित ग्राहक बढ़ने लगे. रोज़ आने वाले ऑर्डर ही इस काम की असली ताकत बने. इससे घर में राशन और काम की योजना बनाना आसान हो गया.
काम बढ़ा, लेकिन पैसों की कमी बनी रही. बिना जमानत के लोन मिलना मुश्किल था. डिलीवरी भी सीमित साधनों से ही हो पा रही थी. हर बार बात वहीं आकर रुक जाती थी कि पैसे कहां से आएंगे.
इसी दौरान सर्वज्ञ को यूपी सरकार की ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान’ योजना (CM YUVA Yojana) के बारे में जानकारी मिली. उन्होंने लोन के लिए आवेदन किया. बैंक और स्थानीय स्तर पर प्रक्रिया पूरी की. इसके बाद उन्हें पांच लाख रुपये का लोन मिला.
इस मदद से रोज़मर्रा का दबाव कम हुआ. काम को संभालने की जगह मिली. डिलीवरी बेहतर हुई. क्षमता बढ़ी. उन्होंने पांच से छह स्थानीय लोगों को काम पर रखा. अब यह काम सिर्फ परिवार तक सीमित नहीं रहा.
जिम्मेदारियां बंट गईं. काम का समय तय हुआ. रोज़ की भागदौड़ कुछ कम हुई. सर्वज्ञ कहते हैं कि इस मदद ने उन्हें खर्च, योजना और जोखिम के बारे में सोचने का नजरिया भी दिया.
वे अपनी कहानी को कोई बड़ी सफलता नहीं मानते. उनके लिए यह लगातार चलने वाला काम है. मेहनत है. परिवार का साथ है. और उन लोगों का भरोसा है, जो रोज़ उनका खाना खाते हैं.
बाराबंकी जैसे जिले में, जहां कई छोटे खाने के काम शुरू होकर बंद हो जाते हैं, सर्वज्ञ आज भी उसी सोच पर टिके हैं. रोज़ वही खाना बनाना, जो लोगों को घर की याद दिलाए.
Edited by रविकांत पारीक



