कर्नल पृथीपाल सिंह गिल: तीनों सेनाओं में सेवा देने वाले भारत के इकलौता योद्धा
रिटायर्ड कर्नल पृथीपाल सिंह गिल की कहानी एक ऐसी शख़्सियत की कहानी है, जिसने ज़िंदगी भर देश को चुना. थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों में सेवा करने वाले भारत के इकलौते सैनिक का यह सफ़र साहस, सादगी और समर्पण से भरा है.
भारत की आज़ादी, उसकी सीमाएं और उसका आत्मसम्मान जिन लोगों की वजह से सुरक्षित रहा, उनमें कुछ नाम इतिहास से ऊपर उठ जाते हैं. ऐसे ही एक नाम थे रिटायर्ड कर्नल पृथीपाल सिंह गिल (Retd. Colonel Prithipal Singh Gill). उनका जीवन सिर्फ एक सैन्य करियर नहीं था, बल्कि यह देशभक्ति, साहस और कर्तव्य की जीवित मिसाल था. वे भारत के इकलौते ऐसे सैनिक थे, जिन्होंने थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों में सेवा दी. 100 वर्ष की उम्र में भी उनका जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा बना रहा.
उनकी कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि यह किसी पद, पुरस्कार या प्रचार की कहानी नहीं है. यह उस पीढ़ी की कहानी है जिसने चुपचाप देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया. बिना शिकायत, बिना शोर और बिना किसी अपेक्षा के. कर्नल गिल ने जिस दौर में सेवा दी, वह युद्धों, बदलावों और अनिश्चितताओं से भरा था. फिर भी उनका जीवन संतुलन, सादगी और साहस का प्रतीक बना रहा.
उनकी पूरी ज़िंदगी यह बताती है कि देशसेवा कोई एक फैसला नहीं, बल्कि हर दिन चुना गया रास्ता होती है. आसमान से समुद्र और फिर ज़मीन तक फैली उनकी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि जब इरादे मजबूत हों, तो सीमाएं मायने नहीं रखतीं.
परिवार को बिना बताए जॉइन की एयर फोर्स
वर्ष 1920 में पटियाला में जन्मे पृथीपाल सिंह गिल उस दौर में बड़े हुए, जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था. उनका परिवार सेना से जुड़ा था. अनुशासन और देशप्रेम उनके घर की हवा में घुला हुआ था. बचपन से ही उन्हें आसमान अपनी ओर खींचता था. यही आकर्षण उन्हें एक साहसिक कदम की ओर ले गया.
साल 1942 में, परिवार को बिना बताए, उन्होंने रॉयल इंडियन एयर फोर्स जॉइन कर ली. वह समय द्वितीय विश्व युद्ध का था. कराची में प्रशिक्षण लेकर उन्होंने बतौर पायलट उड़ान भरी. इस पद पर रहते हुए वे हॉवर्ड एयरक्राफ्ट उड़ाते थे. कर्नल गिल ने 1965 की जंग में भी हिस्सा लिया था. युवा उम्र में युद्ध का सामना करना आसान नहीं था. लेकिन पिता को बेटे की चिंता थी. उन्हें उड़ानों का जोखिम डराता था. पिता की इच्छा के आगे उन्होंने सिर झुकाया.
समुद्र की लहरों के बीच नौसेना की सेवा
1943 में उन्होंने रॉयल इंडियन नेवी जॉइन की. अगले पांच साल उन्होंने माइंसवीपिंग जहाजों पर बिताए. INS तीर जैसे जहाजों के साथ वह युद्ध के दौरान कार्गो वेसल्स की सुरक्षा में तैनात रहे.
नौसेना अधिकारी के तौर पर गिल ने स्कूल ऑफ आर्टिलरी, देवलाली में लॉन्ग गनरी स्टाफ का कोर्स भी पूरा किया.
समुद्र की लहरें, दुश्मन का खतरा और लगातार तनाव. यह सब उनके जीवन का हिस्सा बन गया. लेकिन शरीर ने साथ देना बंद कर दिया. फेफड़ों में पानी भरने की समस्या ने उन्हें बड़ा फैसला लेने पर मजबूर किया.
थल सेना में मिला जीवन का असली उद्देश्य
1951 में उन्होंने भारतीय थल सेना में कदम रखा. आर्टिलरी रेजिमेंट में गनर ऑफिसर के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनाई. 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध में सियालकोट सेक्टर में 71 मीडियम रेजिमेंट की कमान संभालना उनके करियर का अहम अध्याय रहा. बाद में मणिपुर में असम राइफल्स के सेक्टर कमांडर के रूप में भी उन्होंने सेवा दी.
सेवा निवृत्ति के बाद भी जीवन से भरपूर
1970 में कर्नल पद से रिटायर होने के बाद वह चंडीगढ़ में बस गए. खेती की. खेल खेले. टेनिस, स्क्वैश और बैडमिंटन उनके जीवन का हिस्सा बने रहे. वह हमेशा मुस्कुराते थे. जब उनसे लंबी उम्र का राज पूछा जाता, तो वह हंसकर कहते कि यह एक रहस्य है.
100 साल की उम्र में ली अंतिम सांस
वर्ष 2021 में वेटरंस डे पर उन्हें विशेष सम्मान मिला. उसी साल दिसंबर में, 100 वर्ष की उम्र में, उन्होंने शांतिपूर्वक इस दुनिया को अलविदा कहा. वे अपने पीछे न सिर्फ एक परिवार, बल्कि एक प्रेरणादायक विरासत छोड़ गए.
कर्नल पृथीपाल सिंह गिल का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची देशसेवा किसी एक वर्दी तक सीमित नहीं होती. जब इरादे मजबूत हों, तो जमीन, समुद्र और आसमान सभी देशभक्ति के साक्षी बन जाते हैं. उनका जीवन एक संदेश है कि कर्तव्य निभाया जाए तो वह इतिहास बन जाता है.



