एटा की शिल्प परंपरा: घुंघरू से मंदिर घंटियों तक
एटा के जलेसर में पीतल की घंटी निर्माण की परंपरा सामूहिक कारीगरी पर आधारित है। मंदिर घंटियाँ, घुंघरू और पशु घंटियाँ यहीं बनती हैं। ODOP योजना के अंतर्गत मिले ऋण और बाज़ार अवसरों से कारीगरों को उत्पादन बढ़ाने और नए ग्राहकों तक पहुँच बनाने में मदद मिल रही है।
Etah, उत्तर प्रदेश में धातु केवल आकार नहीं लेती, वह ध्वनि भी बनाती है। मंदिरों की घंटियाँ, नृत्य के घुंघरू, विद्यालयों की घंटियाँ और पशुओं के गले में बंधने वाली घंटियाँ—इन सभी की ध्वनि की शुरुआत Jalesar की कार्यशालाओं से होती है।
जलेसर की घंटी निर्माण परंपरा सामूहिक श्रम पर आधारित है। यहाँ काम चरणों में विभाजित होता है। पहले मिट्टी का कोर तैयार किया जाता है, फिर साँचे को दबाकर ढाला जाता है। भट्टी में पीतल गलाया जाता है और पिघली हुई धातु सावधानी से साँचे में डाली जाती है। ठंडा होने के बाद घंटी को निकाला जाता है और उसकी सतह को साफ व तराशा जाता है।
मोहम्मद नईव अंसारी, मोहल्ला किला के निवासी, इसी परंपरा का हिस्सा हैं। उनके पिता स्वर्गीय अब्दुल क़ादिर, जिन्हें मुन्ना भट्टी वाले के नाम से जाना जाता था, इस शिल्प से जुड़े थे। अंसारी ने 1998 में इस कार्य को व्यवस्थित रूप से अपनाया। उनके अनुसार, घंटी निर्माण किसी एक व्यक्ति का काम नहीं, बल्कि कई कारीगरों की संयुक्त प्रक्रिया है।
जलेसर में घुंघरू, मंदिर की बड़ी घंटियाँ, स्कूल की घंटियाँ, पशु घंटियाँ और सजावटी झूलती घंटियाँ बनाई जाती हैं। अंसारी का मानना है कि यहाँ की स्थानीय मिट्टी घंटियों की गूंज में विशेष योगदान देती है, विशेषकर धार्मिक उपयोग के लिए।
अंतिम चरण में घंटी के अंदर लटकन लगाया जाता है। अंसारी कहते हैं, “जब लटकन लगती है और आवाज़ निकलती है, तो दिल खुश हो जाता है।” यही क्षण गुणवत्ता की अंतिम परीक्षा भी होता है।
ODOP के माध्यम से ₹5 लाख के ऋण ने उत्पादन क्षमता बढ़ाने में सहायता की। सुरजकुंड मेला, दिल्ली हाट और कुंभ जैसे मंचों पर भागीदारी से नए ग्राहकों से सीधा संपर्क स्थापित हुआ।
जलेसर की घंटी परंपरा यह दिखाती है कि जब सामूहिक श्रम, कौशल और बाज़ार तक पहुँच एक साथ मिलते हैं, तो शिल्प केवल परंपरा नहीं, बल्कि स्थायी आजीविका बन जाता है।
Edited by Ravi Pareek


